यूरोप की सबसे बड़ी वाहन निर्माता कंपनी फॉक्सवैगन को लेकर लंबे समय से चल रही अनिश्चितता के बीच गुरुवार देर रात एक बड़ा फैसला सामने आया है। कंपनी के सुपरवाइजरी बोर्ड ने व्यापक पुनर्गठन योजना पर सहमति बना ली है। इस समझौते के बाद कंपनी के शेयरों में तेज उछाल देखा गया और वे करीब 11 सप्ताह के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गए। हालांकि, इस बदलाव की सबसे बड़ी कीमत कर्मचारियों को चुकानी पड़ सकती है।
मौजूद जानकारी के अनुसार, फॉक्सवैगन के 89 साल के इतिहास में यह सबसे बड़ा पुनर्गठन समझौता है। इसके तहत कंपनी में पहले से तय कर्मचारियों की कटौती के अलावा 50 हजार और नौकरियां कम करने की योजना है। इससे कुल प्रस्तावित रोजगार कटौती का आंकड़ा करीब एक लाख तक पहुंच गया है। जर्मनी के चार कारखानों के भविष्य को लेकर अभी अंतिम फैसला नहीं हुआ है।
गौरतलब है कि फॉक्सवैगन ऐसे समय में यह कदम उठा रही है, जब यूरोप का वाहन उद्योग कई मोर्चों पर दबाव झेल रहा है। अमेरिका में आयात शुल्क बढ़ने से कारोबार प्रभावित हुआ है, जबकि चीन जैसे कभी बेहद लाभदायक बाजार में कंपनी की बिक्री कमजोर हुई है। दूसरी ओर एशियाई वाहन निर्माता यूरोप के ठहरे हुए बाजार में लगातार अपनी मौजूदगी बढ़ा रहे हैं। इन परिस्थितियों का सीधा असर कंपनी के मुनाफे पर पड़ा है।
कंपनी का परिचालन लाभ मार्जिन इस वर्ष की पहली छमाही में घटकर 3.8 प्रतिशत रह गया, जबकि 2022 में यह पिछले दशक का सबसे ऊंचा स्तर 7.9 प्रतिशत था। ऐसे में लागत कम करना और उत्पादन क्षमता को बाजार की जरूरत के अनुसार ढालना प्रबंधन की प्राथमिकता बन गया है।
समझौते की खबर सामने आने के बाद फॉक्सवैगन के शेयरों में 5.9 प्रतिशत तक की बढ़त दर्ज की गई। कारोबार के दौरान शेयर 18 जून के बाद के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गए। इससे पहले कंपनी के शेयर लंबे समय तक दबाव में थे और जुलाई 2010 के बाद के सबसे निचले स्तर तक गिर चुके थे।
निवेशकों ने समझौते को कंपनी के लिए राहत की खबर माना है। फॉक्सवैगन के शेयरधारक डेका इन्वेस्टमेंट के इंगो श्पाइख ने इसे महत्वपूर्ण सफलता बताया, लेकिन साथ ही कहा कि असली चुनौती अब इस योजना को जमीन पर लागू करने की है। यूनियन इन्वेस्टमेंट के मोरित्स क्रोनेनबर्गर ने भी कहा कि अब प्रबंधन के सामने परिणाम देने की जिम्मेदारी पूरी तरह आ गई है।
बता दें कि फॉक्सवैगन की जटिल हिस्सेदारी व्यवस्था इस पूरे मामले को और संवेदनशील बनाती है। कंपनी में शक्तिशाली श्रमिक संगठन और जर्मनी के लोअर सैक्सोनी राज्य की महत्वपूर्ण भूमिका है। राज्य के पास कंपनी के मतदान अधिकारों का 20 प्रतिशत हिस्सा है। प्रबंधन और श्रमिक प्रतिनिधियों के बीच मतभेद बढ़ने पर कंपनी में असाधारण शेयरधारक बैठक बुलाने तक की संभावना सामने आई थी, जिससे एक बड़े आंतरिक टकराव का खतरा पैदा हो गया था।
हालांकि, नई योजना में यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि कितनी नौकरियां कहां और कब खत्म की जाएंगी। कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी ओलिवर ब्लूम पहले संकेत दे चुके हैं कि प्रस्तावित बचत का लगभग आधा हिस्सा जर्मनी से आना चाहिए। इसका मतलब स्थानीय स्तर पर करीब 25 हजार नौकरियों में कटौती हो सकती है।
जर्मनी में चार कारखानों एमडेन, हनोवर, ज्विकाउ और नेकारजुल्म के भविष्य पर भी नजर है। अगले दशक में वहां मौजूदा उत्पादन बंद होने के बाद कंपनी नए विकल्प तलाशेगी। इनमें कारखानों का दूसरे इस्तेमाल के लिए रूपांतरण या नए मालिकों को सौंपना भी शामिल हो सकता है।
लोअर सैक्सोनी के मुख्यमंत्री ओलाफ लीस ने कहा है कि इन कारखानों को बंद करना अभी तय नहीं है और प्रबंधन से वैकल्पिक रास्ते तलाशने को कहा गया है। उनका कहना है कि यदि उत्पादन क्षमता घटानी ही पड़े तो इसका मतलब यह नहीं होना चाहिए कि पूरी कटौती जर्मनी में ही की जाए।
फॉक्सवैगन के सामने चुनौती केवल खर्च घटाने की नहीं है। चीन में बाजार हिस्सेदारी का नुकसान, यूरोपीय बाजार में बढ़ती प्रतिस्पर्धा, कच्चे माल की लागत और बदलती तकनीक भी कंपनी के लिए बड़ी चिंता हैं। ऐसे में नया समझौता संकट से बाहर निकलने की शुरुआत जरूर माना जा रहा है, लेकिन फॉक्सवैगन के लिए आगे का रास्ता अभी भी काफी कठिन है और उसकी सफलता इस योजना को प्रभावी ढंग से लागू करने पर निर्भर है।

