नयी दिल्ली, तीन सितंबर दिल्ली की एक अदालत ने बृहस्पतिवार को दिल्ली जल बोर्ड (डीजेबी) से जुड़े भ्रष्टाचार के मामले में आम आदमी पार्टी (आप) के नेता एवं पूर्व मंत्री सत्येंद्र जैन की जमानत अर्जी स्वीकार कर ली। अदालत ने कहा कि उसके सामने जो सबूत पेश किये गये हैं, वे प्रथम दृष्टया इतने पर्याप्त नहीं है कि आरोपी को राहत नहीं दिया जाए। दिल्ली सरकार के भ्रष्टाचार निरोधक शाखा (एसीबी) को फटकार लगाते हुए अदालत ने कहा कि ‘जांच के आखिरी दौर में, बिना किसी ठोस वजह और हालात में बिना किसी बदलाव के अचानक गिरफ्तारी करने से यह आलोचना हो सकती है कि यह मनमाना कदम है।’
विशेष न्यायाधीश दिग विनय सिंह ने कहा कि सुनवाई से पहले की हिरासत को सज़ा के एक कठोर रूप में नहीं बदला जा सकता।
न्यायाधीश सिंह इस मामले में नियमित जमानत के अनुरोध संबंधी जैन की अर्जी पर सुनवाई कर रहे थे। जैन को 19 अगस्त को 14 दिनों के लिए न्यायिक हिरासत में भेजा गया था। अदालत ने कहा, ‘‘आरोप मुख्य रूप से अन्य सह-आरोपियों के खिलाफ हैं।
यह आरोप है कि आवेदक, जो उस समय मंत्री थे, ने साजिश रची और अवैध लेन-देन में मदद की।’’
अदालत ने कहा कि इस मामले में, अगर रिकॉर्ड पर मौजूद बयानों और दूसरे सबूतों को भी ध्यान में रखा जाए, तो भी सुनवाई के दौरान ही जैन की मिलीभगत साबित करनी होगी और दोषी पाए जाने पर उन्हें सज़ा हो सकती है। अदालत ने कहा,‘‘अब तक जो सबूत मिले हैं, वे आवेदक की जमानत नामंजूर करने के लिए शुरुआती तौर पर काफी नहीं हैं। मामले की आगे की जांच, पूछताछ और सुनवाई के लिए उनके उपलब्ध होने पर कोई शक नहीं है।
यह पहले ही माना जा चुका है कि उनके भागने का कोई खतरा नहीं है और सबूतों से छेड़छाड़ करने या गवाहों को प्रभावित करने/डराने-धमकाने की भी कोई संभावना नहीं है। वह अब मंत्री या विधायक नहीं हैं।’’
अदालत ने कहा, ‘‘इन सभी तथ्यों और हालात, जिसमें हिरासत की अवधि भी शामिल है, को ध्यान में रखते हुए याचिकाकर्ता को ज़मानत दी जानी चाहिए।’’
अपने 28 पृष्ठों के आदेश में, अदालत ने पूर्व मंत्री को राहत देने के कई और कारण भी बताए, जैसे कि मई 2024 में प्राथमिकी दर्ज किये जाने और अगस्त 2026 में जैन की गिरफ़्तारी के बीच 27 महीनों की ‘बिना किसी वजह के और असाधारण देरी।’
यह मामला ‘यूरोटेक एनवायर्नमेंटल प्राइवेट लिमिटेड को दिए गए एक ठेके से जुड़ा है। यह ठेका उस वक्त दिया गया था जब जैन दिल्ली के जल मंत्री थे।
एसीबी ने आरोप लगाया था कि निविदा की शर्तों में फेरबदल की गई थी तथा निविदा प्रक्रिया को जानबूझकर प्रोद्योगिकी केंद्रित किया गया था, ताकि यूरोटेक एनवायर्नमेंटल को फायदा पहुंचाया जा सके।

