संपादकीय: निर्यात, निवेश व उपभोग के पहियों को गति दें

संपादकीय: निर्यात, निवेश व उपभोग के पहियों को गति दें

अमरीका-ईरान युद्ध और वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच दुनिया में बहुत-से देशों की अर्थव्यवस्था कई तरह के दबावों से गुजर रही है। ऐसे दौर में भारतीय अर्थव्यवस्था ने वित्तीय वर्ष २०२६-२७ की पहली तिमाही में मजबूती दिखाई है। अप्रेल-जून में देश की जीडीपी 7.8 प्रतिशत की दर से बढ़ी है, जो भारतीय रिजर्व बैंक के अनुमान से बेहतर रही है। साफ है कि देश में आर्थिक गतिविधियों की रफ्तार बनी हुई है। इस मजबूती की तस्वीर केवल जीडीपी के आंकड़े से नहीं बनती। डिजिटल अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन चुका यूपीआइ भी लगातार विस्तार कर रहा है। लेन-देन में बढ़ोतरी बताती है कि उपभोग और आर्थिक गतिविधियां जमीनी स्तर पर सक्रिय हैं। जीएसटी संग्रह का 14.8 प्रतिशत बढ़कर दो लाख करोड़ रुपए तक पहुंचना कारोबार और खपत में मजबूती का संकेत है।

इन आंकड़ों को साथ रखकर देखें तो यह निश्चित रूप से बड़ी उपलब्धि है। लेकिन अच्छे आंकड़ों से उत्साहित होकर जोखिमों को नजरअंदाज करना ठीक नहीं होगा। अर्थव्यवस्था के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में इस समय कच्चे तेल की कीमतें शामिल हैं। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने का असर आयात बिल, चालू खाते और महंगाई पर पड़ सकता है। तेल की कीमतों में तेजी घरेलू उद्योगों की लागत बढ़ाने के साथ लोगों की जेब पर भी दबाव डाल सकती है। दूसरी चिंता मानसून को लेकर है। बारिश का असमान वितरण कृषि क्षेत्र के लिए चुनौती बन सकता है। भारत में ग्रामीण मांग, खाद्य कीमतों और रोजगार पर खेती का सीधा प्रभाव पड़ता है। यदि वर्षा का असंतुलन फसल उत्पादन को प्रभावित करता है तो इसका असर खाद्य महंगाई से लेकर ग्रामीण उपभोग तक दिखाई दे सकता है।

ऐसे समय में नीति निर्माताओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती विकास की इस गति को टिकाऊ बनाना है। निजी निवेश को गति देना, बुनियादी ढांचे पर खर्च जारी रखना और रोजगार पैदा करने वाले क्षेत्रों को प्रोत्साहन देना जरूरी है। घरेलू उपभोग को मजबूत बनाए रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। निर्यात के नए बाजार तलाशने होंगे, ताकि वैश्विक मांग में कमजोरी का असर भारतीय उद्योगों पर न हो। भारत का विशाल घरेलू बाजार है। वैश्विक संकट के दौर में यही ताकत देश के लिए सुरक्षा कवच बन सकती है। इसके लिए आय और रोजगार में निरंतर वृद्धि जरूरी है। विपक्षी दल रोजगार के आंकड़ों को लेकर लगातार सवाल उठाते रहे हैं, इसलिए सरकार को इन आंकड़ों को भी अधिक पारदर्शी ढंग से सामने रखना चाहिए।मजबूत जीडीपी का मतलब केवल उत्पादन बढऩा नहीं है, बल्कि यह भी जरूरी है कि विकास का लाभ समाज के व्यापक वर्ग तक पहुंचे। भारत को निवेश, उपभोग और निर्यात तीनों पहियों को एक साथ गति देनी होगी। तभी भारतीय अर्थव्यवस्था अपनी विकास यात्रा को जारी रख पाएगी।

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