शिवसेना यूबीटी नेता आदित्य ठाकरे की मुश्किलें बढ़ सकती हैं, क्योंकि दिशा सालियान मौत मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने CBI को FIR दर्ज कर जांच अपने हाथ में लेने का आदेश दे दिया है। हालांकि, अदालत ने साफ किया है कि उसने आदित्य ठाकरे या किसी अन्य व्यक्ति के खिलाफ कोई प्रतिकूल टिप्पणी या निष्कर्ष नहीं दिया है। अब यह पूरी तरह CBI की जांच और जुटाए जाने वाले साक्ष्यों पर निर्भर करेगा कि किसी व्यक्ति के खिलाफ संदेह के पर्याप्त आधार बनते हैं या नहीं।
हम आपको बता दें कि अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की पूर्व मैनेजर दिशा सालियान की रहस्यमय मौत के करीब छह साल बाद बॉम्बे हाईकोर्ट ने मुंबई पुलिस की जांच पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए मामले की CBI जांच का आदेश दिया है। न्यायमूर्ति सारंग कोतवाल और न्यायमूर्ति रंजीतसिंह राजा भोंसले की खंडपीठ ने मुंबई पुलिस को मामले से जुड़े सभी दस्तावेज और रिकॉर्ड तत्काल CBI को सौंपने का निर्देश दिया है। साथ ही जांच किसी अनुभवी और वरिष्ठ अधिकारी से कराने को कहा गया है।
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44 पन्नों के फैसले में हाईकोर्ट ने मुंबई पुलिस की जांच में “गंभीर विसंगतियों” का उल्लेख करते हुए कहा कि जांच “जवाब देने से ज्यादा सवाल खड़े करती है।” अदालत ने यह भी हैरानी जताई कि करीब छह वर्षों तक जांच चलती रही, लेकिन FIR तक दर्ज नहीं की गई। कोर्ट ने कहा कि पुलिस को संज्ञेय अपराध की जांच का पर्याप्त अवसर मिला, लेकिन उसने न तो FIR दर्ज की और न ही अपेक्षित तरीके से जांच आगे बढ़ाई।
हम आपको याद दिला दें कि दिशा सालियान 8 जून 2020 को मुंबई के मलाड इलाके में एक आवासीय इमारत से गिरने के बाद मृत पाई गई थीं। मुंबई पुलिस ने इसे पहले आकस्मिक मृत्यु का मामला (ADR) दर्ज किया और बाद में जांच के आधार पर आत्महत्या बताया। लेकिन दिशा के पिता सतीश सालियान ने पुलिस की जांच पर सवाल उठाते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने अपनी बेटी के साथ सामूहिक दुष्कर्म और हत्या का आरोप लगाया तथा प्रभावशाली लोगों को बचाने के लिए राजनीतिक स्तर पर साजिश और पर्दादारी का आरोप भी लगाया।
सतीश सालियान की याचिका में शिवसेना (UBT) नेता और विधायक आदित्य ठाकरे के खिलाफ आरोपों की जांच की मांग भी की गई थी। हालांकि, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी भी व्यक्ति को केवल अदालत के समक्ष लगाए गए आरोपों के आधार पर आरोपी नहीं माना जा सकता। जांच अधिकारी को साक्ष्यों के आधार पर ही यह तय करना होगा कि किसी के खिलाफ “उचित संदेह” के पर्याप्त आधार हैं या नहीं।
हाईकोर्ट ने घटनास्थल की जांच, यानी स्पॉट पंचनामा में देरी पर भी सवाल उठाए। अदालत ने घटनास्थल पर खून नहीं मिलने और चोटों के स्वरूप को लेकर भी संदेह जताया। कोर्ट ने टिप्पणी की कि इतनी ऊंचाई से गिरने की स्थिति में केवल ठोड़ी पर एक चोट और चेहरे की कोई हड्डी न टूटना स्वीकार करना कठिन है। अभियोजन ने दलील दी थी कि बारिश के कारण खून के निशान धुल गए होंगे, लेकिन अदालत ने नोट किया कि जिस बारिश का हवाला दिया गया, वह घटना के कई घंटे बाद हुई थी।
कपड़ों को लेकर भी अदालत ने विरोधाभास दर्ज किया। पंचनामा और पोस्टमार्टम रिपोर्ट में शव को बिना कपड़ों के बताया गया, जबकि अस्पताल और शवगृह की तस्वीरों में दिशा के शरीर पर कपड़े दिखाई देने की बात सामने आई। अदालत ने इन तथ्यों पर कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया, लेकिन कहा कि इनमें “तर्कसंगत संदेह की पर्याप्त गुंजाइश” है।
अब CBI सतीश सालियान का बयान दर्ज कर FIR करेगी और मामले की नए सिरे से जांच शुरू करेगी। यदि जांच में कोई आपराधिक मामला नहीं बनता, तो CBI को सक्षम अदालत में उपयुक्त समरी रिपोर्ट दाखिल करनी होगी, जिसे सतीश सालियान चुनौती भी दे सकेंगे। उधर, छह साल से न्याय की लड़ाई लड़ रहे सतीश सालियान ने फैसले पर राहत जताई, लेकिन कहा कि बेटी को खोने के बाद जश्न मनाने का कोई कारण नहीं है। उनका दर्द साफ था, “मैं छह साल से इसका इंतजार कर रहा था। मैं खुश नहीं हूं, मैंने अपनी बेटी खो दी है। आज सिर्फ राहत मिली है।”
हम आपको यह भी बता दें कि आदित्य ठाकरे ने भी मामले में हस्तक्षेप की मांग करते हुए सतीश सालियान की याचिका को “झूठी, निराधार और प्रेरित” बताया था। लेकिन अब CBI जांच के आदेश के साथ यह मामला एक नए और बेहद संवेदनशील दौर में प्रवेश कर चुका है। जांच की दिशा और उसके निष्कर्ष ही तय करेंगे कि छह साल पुराने इस रहस्य की परतों के पीछे आखिर क्या सच छिपा है।
दूसरी ओर, दिशा सालियान मामले की CBI जांच का राजनीतिक असर भी शिवसेना (UBT) पर पड़ सकता है। अगर जांच के दौरान आदित्य ठाकरे से जुड़े आरोपों की पड़ताल आगे बढ़ती है, तो पार्टी को कानूनी मोर्चे के साथ-साथ राजनीतिक और छवि संबंधी दबाव का भी सामना करना पड़ सकता है। हालांकि हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि आदित्य ठाकरे के खिलाफ कोई निष्कर्ष नहीं दिया गया है और किसी व्यक्ति को केवल आरोपों के आधार पर आरोपी नहीं माना जा सकता। लेकिन चूंकि शिवसेना (UBT) पहले से ही संगठनात्मक अस्थिरता से जूझ रही है, ऐसे में अदालत का आज का फैसला पार्टी की मुश्किलें और बढ़ा सकता है। हम आपको याद दिला दें कि जून 2026 में पार्टी के छह सांसदों के शिंदे खेमे की ओर जाने को लेकर बड़ा राजनीतिक संकट पैदा हुआ था, जबकि अब कुछ मीडिया रिपोर्टों में कई विधायकों के भी एकनाथ शिंदे के संपर्क में होने और संभावित दलबदल की अटकलें तेज हैं। यदि सांसदों के बाद विधायकों का भी एक बड़ा समूह टूटता है, तो उद्धव ठाकरे की पार्टी के लिए यह 2022 के विभाजन के बाद सबसे गंभीर संगठनात्मक संकट साबित हो सकता है। माना जा रहा है कि आदित्य ठाकरे के इर्द-गिर्द CBI जांच की राजनीतिक बहस पार्टी पर दबाव और बढ़ा सकती है, क्योंकि विपक्षी प्रतिद्वंद्वी इसे आक्रामक राजनीतिक मुद्दे के रूप में इस्तेमाल कर सकते हैं।

