ऐतिहासिक नालंदा विश्वविद्यालय के राउंडटेबल कॉन्फ्रेंस हॉल में 21वीं सदी के बदलते परिदृश्य में पुरातत्व की भूमिका और आधुनिक विज्ञान के अनुप्रयोग पर केंद्रित एक दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का शुभारंभ हुआ। ’21वीं सदी में पुरातत्व: वैज्ञानिक पुनर्निर्माण के लिए बायोआर्कियोलॉजी का अनुप्रयोग’ विषय पर आयोजित इस महत्वपूर्ण संगोष्ठी में देश भर के ख्यातिप्राप्त पुरातत्वविदों, वैज्ञानिकों और मानवशास्त्रियों का जमावड़ा लगा। कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य पुरातत्व, नृविज्ञान, आनुवंशिकी और आधुनिक विज्ञान के अंतःविषय दृष्टिकोणों को एक साझा मंच पर लाना है, ताकि प्राचीन मानव बस्तियों, उनके जीवन स्तर, खान-पान, स्वास्थ्य और आनुवंशिक विकास का सटीक वैज्ञानिक अध्ययन किया जा सके। ‘आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों से इतिहास की कड़ियां जोड़ना प्रासंगिक’ कार्यशाला का उद्घाटन नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर सचिन चतुर्वेदी और विदेश मंत्रालय के पूर्व सचिव जयदीप मजूमदार की गरिमामयी उपस्थिति में हुआ। अपने अध्यक्षीय संबोधन में प्रोफेसर सचिन चतुर्वेदी ने कहा कि नालंदा प्राचीन काल से ही ज्ञान और अनुसंधान का वैश्विक केंद्र रहा है और आज आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों के माध्यम से इतिहास की कड़ियों को जोड़ना अत्यंत प्रासंगिक हो गया है। पूर्व सचिव जयदीप मजूमदार ने इस तरह के अंतःविषयक शोध को अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक कूटनीति और ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण बताया। ‘प्राचीन इतिहास के कई अनसुलझे रहस्य वैज्ञानिक प्रमाणों के साथ उजागर होते हैं’ संगोष्ठी में एनएमएचसी/सीसीएमबी के प्रसिद्ध पुरातत्वविद् प्रोफेसर वसंत शिंदे और एंथ्रोपोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के प्रोफेसर बी. वी. शर्मा ने मुख्य व्याख्यान प्रस्तुत करते हुए जैव-पुरातत्व की व्यावहारिक उपयोगिता पर विस्तार से प्रकाश डाला। विद्वानों ने स्पष्ट किया कि पारंपरिक पुरातात्विक उत्खनन के साथ जब डीएनए विश्लेषण, आइसोटोप परीक्षण और कंकाल अवशेषों का आणविक अध्ययन जोड़ा जाता है, तब प्राचीन इतिहास के कई अनसुलझे रहस्य वैज्ञानिक प्रमाणों के साथ उजागर होते हैं। कार्यशाला के विभिन्न तकनीकी सत्रों में काशी हिंदू विश्वविद्यालय के आनुवंशिकी विशेषज्ञ प्रोफेसर ज्ञानेश्वर चौबे, विश्व-भारती की डॉ. अभिषिक्ता घोष रॉय, ब्रिक-सीडीएफडी के डॉ. प्रज्वल प्रताप सिंह, एंथ्रोपोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के डॉ. मंजुलिका गौतम एवं डॉ. निंगोमबम सोमोरजीत सिंह सहित नालंदा विश्वविद्यालय के प्रोफेसर गोदाबरीश मिश्र और डॉ. एलोरा त्रिबेदी ने अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए। सभी वक्ताओं ने सर्वसम्मति से प्राचीन इतिहास के वैज्ञानिक पुनर्निर्माण और भारतीय उपमहाद्वीप के प्राचीन समाज को सही परिप्रेक्ष्य में समझने के लिए आधुनिक वैज्ञानिक विधियों के निरंतर प्रयोग पर जोर दिया। ऐतिहासिक नालंदा विश्वविद्यालय के राउंडटेबल कॉन्फ्रेंस हॉल में 21वीं सदी के बदलते परिदृश्य में पुरातत्व की भूमिका और आधुनिक विज्ञान के अनुप्रयोग पर केंद्रित एक दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का शुभारंभ हुआ। ’21वीं सदी में पुरातत्व: वैज्ञानिक पुनर्निर्माण के लिए बायोआर्कियोलॉजी का अनुप्रयोग’ विषय पर आयोजित इस महत्वपूर्ण संगोष्ठी में देश भर के ख्यातिप्राप्त पुरातत्वविदों, वैज्ञानिकों और मानवशास्त्रियों का जमावड़ा लगा। कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य पुरातत्व, नृविज्ञान, आनुवंशिकी और आधुनिक विज्ञान के अंतःविषय दृष्टिकोणों को एक साझा मंच पर लाना है, ताकि प्राचीन मानव बस्तियों, उनके जीवन स्तर, खान-पान, स्वास्थ्य और आनुवंशिक विकास का सटीक वैज्ञानिक अध्ययन किया जा सके। ‘आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों से इतिहास की कड़ियां जोड़ना प्रासंगिक’ कार्यशाला का उद्घाटन नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर सचिन चतुर्वेदी और विदेश मंत्रालय के पूर्व सचिव जयदीप मजूमदार की गरिमामयी उपस्थिति में हुआ। अपने अध्यक्षीय संबोधन में प्रोफेसर सचिन चतुर्वेदी ने कहा कि नालंदा प्राचीन काल से ही ज्ञान और अनुसंधान का वैश्विक केंद्र रहा है और आज आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों के माध्यम से इतिहास की कड़ियों को जोड़ना अत्यंत प्रासंगिक हो गया है। पूर्व सचिव जयदीप मजूमदार ने इस तरह के अंतःविषयक शोध को अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक कूटनीति और ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण बताया। ‘प्राचीन इतिहास के कई अनसुलझे रहस्य वैज्ञानिक प्रमाणों के साथ उजागर होते हैं’ संगोष्ठी में एनएमएचसी/सीसीएमबी के प्रसिद्ध पुरातत्वविद् प्रोफेसर वसंत शिंदे और एंथ्रोपोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के प्रोफेसर बी. वी. शर्मा ने मुख्य व्याख्यान प्रस्तुत करते हुए जैव-पुरातत्व की व्यावहारिक उपयोगिता पर विस्तार से प्रकाश डाला। विद्वानों ने स्पष्ट किया कि पारंपरिक पुरातात्विक उत्खनन के साथ जब डीएनए विश्लेषण, आइसोटोप परीक्षण और कंकाल अवशेषों का आणविक अध्ययन जोड़ा जाता है, तब प्राचीन इतिहास के कई अनसुलझे रहस्य वैज्ञानिक प्रमाणों के साथ उजागर होते हैं। कार्यशाला के विभिन्न तकनीकी सत्रों में काशी हिंदू विश्वविद्यालय के आनुवंशिकी विशेषज्ञ प्रोफेसर ज्ञानेश्वर चौबे, विश्व-भारती की डॉ. अभिषिक्ता घोष रॉय, ब्रिक-सीडीएफडी के डॉ. प्रज्वल प्रताप सिंह, एंथ्रोपोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के डॉ. मंजुलिका गौतम एवं डॉ. निंगोमबम सोमोरजीत सिंह सहित नालंदा विश्वविद्यालय के प्रोफेसर गोदाबरीश मिश्र और डॉ. एलोरा त्रिबेदी ने अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए। सभी वक्ताओं ने सर्वसम्मति से प्राचीन इतिहास के वैज्ञानिक पुनर्निर्माण और भारतीय उपमहाद्वीप के प्राचीन समाज को सही परिप्रेक्ष्य में समझने के लिए आधुनिक वैज्ञानिक विधियों के निरंतर प्रयोग पर जोर दिया।

