आदिवासी समुदाय ने जैन दावे का किया विरोध:पारसनाथ पहाड़ पर संथाल आदिवासियों के प्रथागत अधिकार को कमजोर करने की कोशिश बर्दाश्त नहीं

आदिवासी समुदाय ने जैन दावे का किया विरोध:पारसनाथ पहाड़ पर संथाल आदिवासियों के प्रथागत अधिकार को कमजोर करने की कोशिश बर्दाश्त नहीं

गिरिडीह में मारांग बुरू पारसनाथ पहाड़ पर जैन समुदाय के दावे को लेकर आदिवासी समुदाय का विरोध तेज हो गया है। सोमवार को मारांग बुरू बचाओ संघर्ष मोर्चा ने न्यू परिसदन, गिरिडीह में प्रेस वार्ता कर विश्व जैन संगठन के अध्यक्ष संजय जैन की ओर से पारसनाथ पहाड़ को लेकर किए जा रहे दावे का कड़ा विरोध किया। मोर्चा के सदस्यों ने स्पष्ट कहा कि पारसनाथ पहाड़ संथाल आदिवासियों का मारांग बुरू है और यह उनके लिए सदियों से आस्था का केंद्र रहा है। वक्ताओं के अनुसार, संथाल आदिवासी समुदाय पीढ़ियों से यहां पूजा-अर्चना करता आ रहा है। उन्होंने कहा कि मारांग बुरू पारसनाथ क्षेत्र में 24 से अधिक टोले हैं, जहां आज भी माझी (प्रधान) की पारंपरिक व्यवस्था कायम है। मोर्चा ने कहा- न्यायालय ने भी प्रथागत अधिकारों को दी है मान्यता प्रेस वार्ता में आदिवासी नेताओं ने कहा कि न्यायालय ने संथाल आदिवासियों के प्रथागत और पैतृक अधिकारों को मान्यता दी है। ऐसे में केंद्र या राज्य सरकार की ओर से किसी एक समुदाय के पक्ष में विशेष व्यवस्था को लेकर एकतरफा आदेश जारी करना उचित नहीं होगा। वक्ताओं ने संविधान के अनुच्छेद 14 और 25 का हवाला देते हुए आदिवासी समुदाय के धार्मिक और पारंपरिक अधिकारों की रक्षा की मांग की। उनका कहना था कि पारसनाथ क्षेत्र केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं, बल्कि संथाल आदिवासियों की परंपरा, संस्कृति और पीढ़ियों से चली आ रही धार्मिक व्यवस्था से जुड़ा हुआ है। इसलिए किसी भी निर्णय में आदिवासी समुदाय के पारंपरिक अधिकारों और उनकी धार्मिक भावनाओं को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। सरकारी दस्तावेजों और ऐतिहासिक संदर्भों का दिया हवाला मोर्चा के सदस्यों ने दावा किया कि सरकारी दस्तावेजों और ऐतिहासिक संदर्भों में भी मारांग बुरू का उल्लेख मिलता है। आदिवासी समुदाय ने आरोप लगाया कि जैन समुदाय अपने धार्मिक दावे को मजबूत करने के लिए संथाल आदिवासियों के पारंपरिक अधिकारों को कमजोर करने का प्रयास कर रहा है। वक्ताओं ने कहा कि संपूर्ण मारांग बुरू पारसनाथ क्षेत्र में आदिवासियों की पारंपरिक व्यवस्था आज भी मौजूद है। उन्होंने दोहराया कि पारसनाथ पर्वत का मारांग बुरू संथाल आदिवासी समुदाय का है और हमेशा रहेगा। मोर्चा ने कहा कि धार्मिक एवं प्रथागत अधिकारों से जुड़े इस मामले में किसी भी प्रकार का एकतरफा निर्णय क्षेत्र में तनाव की स्थिति पैदा कर सकता है। सरकार से एकतरफा आदेश निरस्त करने की मांग, आंदोलन की चेतावनी मोर्चा ने केंद्र और राज्य सरकार से जैन समुदाय के पक्ष में जारी किसी भी एकतरफा आदेश की समीक्षा कर उसे तत्काल निरस्त करने की मांग की। साथ ही न्यायालय के आदेशों और सरकारी दस्तावेजों के आधार पर मारांग बुरू पारसनाथ को आदिवासियों का प्राचीन धार्मिक स्थल घोषित करने तथा उनके प्रथागत एवं पारंपरिक अधिकारों का संरक्षण सुनिश्चित करने की मांग की गई। वक्ताओं ने चेतावनी दी कि यदि सरकार ने इस मामले में सकारात्मक पहल नहीं की, तो आदिवासी समुदाय अपने अधिकारों की रक्षा के लिए व्यापक आंदोलन करने को बाध्य होगा। प्रेस वार्ता में मोर्चा के अध्यक्ष महावीर मुर्मू, सचिव विष्णु किस्कू, प्रवक्ता सुधीर बास्के, सुरेश हेमराम, मदन हेमराम, सुशांत प्रसाद सोरेन, दिलीप मुर्मू समेत अन्य लोग मौजूद थे। गिरिडीह में मारांग बुरू पारसनाथ पहाड़ पर जैन समुदाय के दावे को लेकर आदिवासी समुदाय का विरोध तेज हो गया है। सोमवार को मारांग बुरू बचाओ संघर्ष मोर्चा ने न्यू परिसदन, गिरिडीह में प्रेस वार्ता कर विश्व जैन संगठन के अध्यक्ष संजय जैन की ओर से पारसनाथ पहाड़ को लेकर किए जा रहे दावे का कड़ा विरोध किया। मोर्चा के सदस्यों ने स्पष्ट कहा कि पारसनाथ पहाड़ संथाल आदिवासियों का मारांग बुरू है और यह उनके लिए सदियों से आस्था का केंद्र रहा है। वक्ताओं के अनुसार, संथाल आदिवासी समुदाय पीढ़ियों से यहां पूजा-अर्चना करता आ रहा है। उन्होंने कहा कि मारांग बुरू पारसनाथ क्षेत्र में 24 से अधिक टोले हैं, जहां आज भी माझी (प्रधान) की पारंपरिक व्यवस्था कायम है। मोर्चा ने कहा- न्यायालय ने भी प्रथागत अधिकारों को दी है मान्यता प्रेस वार्ता में आदिवासी नेताओं ने कहा कि न्यायालय ने संथाल आदिवासियों के प्रथागत और पैतृक अधिकारों को मान्यता दी है। ऐसे में केंद्र या राज्य सरकार की ओर से किसी एक समुदाय के पक्ष में विशेष व्यवस्था को लेकर एकतरफा आदेश जारी करना उचित नहीं होगा। वक्ताओं ने संविधान के अनुच्छेद 14 और 25 का हवाला देते हुए आदिवासी समुदाय के धार्मिक और पारंपरिक अधिकारों की रक्षा की मांग की। उनका कहना था कि पारसनाथ क्षेत्र केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं, बल्कि संथाल आदिवासियों की परंपरा, संस्कृति और पीढ़ियों से चली आ रही धार्मिक व्यवस्था से जुड़ा हुआ है। इसलिए किसी भी निर्णय में आदिवासी समुदाय के पारंपरिक अधिकारों और उनकी धार्मिक भावनाओं को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। सरकारी दस्तावेजों और ऐतिहासिक संदर्भों का दिया हवाला मोर्चा के सदस्यों ने दावा किया कि सरकारी दस्तावेजों और ऐतिहासिक संदर्भों में भी मारांग बुरू का उल्लेख मिलता है। आदिवासी समुदाय ने आरोप लगाया कि जैन समुदाय अपने धार्मिक दावे को मजबूत करने के लिए संथाल आदिवासियों के पारंपरिक अधिकारों को कमजोर करने का प्रयास कर रहा है। वक्ताओं ने कहा कि संपूर्ण मारांग बुरू पारसनाथ क्षेत्र में आदिवासियों की पारंपरिक व्यवस्था आज भी मौजूद है। उन्होंने दोहराया कि पारसनाथ पर्वत का मारांग बुरू संथाल आदिवासी समुदाय का है और हमेशा रहेगा। मोर्चा ने कहा कि धार्मिक एवं प्रथागत अधिकारों से जुड़े इस मामले में किसी भी प्रकार का एकतरफा निर्णय क्षेत्र में तनाव की स्थिति पैदा कर सकता है। सरकार से एकतरफा आदेश निरस्त करने की मांग, आंदोलन की चेतावनी मोर्चा ने केंद्र और राज्य सरकार से जैन समुदाय के पक्ष में जारी किसी भी एकतरफा आदेश की समीक्षा कर उसे तत्काल निरस्त करने की मांग की। साथ ही न्यायालय के आदेशों और सरकारी दस्तावेजों के आधार पर मारांग बुरू पारसनाथ को आदिवासियों का प्राचीन धार्मिक स्थल घोषित करने तथा उनके प्रथागत एवं पारंपरिक अधिकारों का संरक्षण सुनिश्चित करने की मांग की गई। वक्ताओं ने चेतावनी दी कि यदि सरकार ने इस मामले में सकारात्मक पहल नहीं की, तो आदिवासी समुदाय अपने अधिकारों की रक्षा के लिए व्यापक आंदोलन करने को बाध्य होगा। प्रेस वार्ता में मोर्चा के अध्यक्ष महावीर मुर्मू, सचिव विष्णु किस्कू, प्रवक्ता सुधीर बास्के, सुरेश हेमराम, मदन हेमराम, सुशांत प्रसाद सोरेन, दिलीप मुर्मू समेत अन्य लोग मौजूद थे।  

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