Nepal Flash Flood Update : काठमांडू। नेपाल और तिब्बत के इलाकों में पिछले सप्ताह आई भीषण और विनाशकारी फ्लैश फ्लड को लेकर वैज्ञानिकों की प्रारंभिक रिपोर्ट में बड़ा खुलासा हुआ है। नेपाल एनवायरनमेंट सोसायटी (NES) द्वारा कराए गए अध्ययन के अनुसार, यह बाढ़ किसी ग्लेशियर झील के फटने (GLOF) से नहीं, बल्कि ‘आइस-रॉक एवलांच’ यानी बर्फ और विशाल चट्टानों के एक साथ स्खलन (ग्लेशियर मास वेस्टिंग) के कारण आई थी।
रविवार को जारी इस रिपोर्ट में सैटेलाइट से मिली तस्वीरों का हवाला देते हुए बताया गया है कि शुरुआत में जिसे ग्लेशियर झील का फटना माना जा रहा था, उसके कोई सबूत नहीं मिले हैं।
7 मिनट में 22 किलोमीटर बही तबाही
डॉ. बिनोद बनिया के नेतृत्व में डॉ. नितेश खड़का, डॉ. अमृत प्रसाद शर्मा, विष्णु महर्जन और डॉ. जयराम कार्की की टीम द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट के अनुसार, 26 अगस्त को स्थानीय समयानुसार सुबह 8:37 बजे लांगटांग-लिरुंग चोटी के उत्तरी हिस्से से बर्फ और चट्टानों का विशाल हिस्सा गिरना शुरू हुआ। समुद्र तल से 5,200 मीटर की ऊंचाई से शुरू हुआ यह मलबा 2,270 मीटर की तीखी ढलान से नीचे गिरते हुए 2,930 मीटर की ऊंचाई पर स्थित ल्हेन्डे नदी में जा गिरा।
पहाड़ खिसकने से आए इस भारी मलबे के कारण 5.2 तीव्रता का भूकंपीय झटका दर्ज किया गया। यह मलबा महज 7 मिनट के भीतर करीब 22 किलोमीटर का सफर तय कर अश्वगंधा तक पहुंच गया। इस दौरान इसकी औसत रफ्तार 167 किलोमीटर प्रति घंटा आंकी गई। मलबे के बहाव के कारण ल्हेन्डे, भोटेकोशी और त्रिशूली नदियों में भयानक सैलाब आ गया, जिससे नदियों का प्राकृतिक मार्ग बदल गया और दो अस्थायी झीलें बन गईं, जिन पर निगरानी रखी जा रही है।
सैटेलाइट तस्वीरों में GLOF का कोई सबूत नहीं
वैज्ञानिकों ने ‘गाओफेन-1’, ‘सेंटिनल’, ‘प्लैनेटस्कोप’ और ‘लैंडसेट’ जैसे सैटेलाइट्स की तस्वीरों के विश्लेषण के आधार पर बताया कि तिब्बत क्षेत्र में ऊपर तीन ग्लेशियर झीलें मौजूद जरूर हैं, लेकिन उनके फटने के कोई संकेत नहीं मिले हैं। इसके अलावा, घटना के दिन किसी बड़ी ‘क्लाउड बर्स्ट’ (बादल फटने) की घटना को भी खारिज किया है, क्योंकि तबाही से ठीक पहले रसुवागढ़ी और स्याप्रुबेसी नदियों में जलस्तर सामान्य से कम दर्ज किया गया था। जलस्तर का कम होना इस बात का संकेत था कि ल्हेन्डे नदी में ऊपर की तरफ मलबा जमा होने से पानी अस्थायी रूप से रुक गया था।
सैटेलाइट तस्वीरों में बर्फ और बर्फ की चादर में कमी तथा नीचे की जमीन के अधिक हिस्से के उजागर होने जैसे बदलाव भी दिखाई दिए। वैज्ञानिकों के मुताबिक ग्लेशियर का बड़ा हिस्सा चट्टानों के साथ टूटकर ल्हेंडे नदी के बेसिन में गिरा, जिसने फ्लैश फ्लड को जन्म दिया।
क्या होता है ‘मास वेस्टिंग’?
भू-वैज्ञानिकों के अनुसार, GLOF (ग्लेशियर लेक बर्स्ट) में जमे हुए पानी का अचानक तेजी से रिसाव होता है। वहीं ‘मास वेस्टिंग’ गुरुत्वाकर्षण के कारण बर्फ, मिट्टी और विशाल चट्टानों के धीरे-धीरे या अचानक नीचे की ओर खिसकने की प्रक्रिया है। जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालयी क्षेत्रों में ‘मास वेस्टिंग’ की घटनाएं बढ़ रही हैं, जिससे भविष्य में ऐसी अचानक आने वाली बाढ़ का खतरा और अधिक बढ़ सकता है।

