बिहार के सबसे बड़े सरकारी अस्पतालों में शामिल पटना मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल (PMCH) डॉक्टरों और मेडिकल शिक्षकों की भारी कमी से जूझ रहा है। अस्पताल में स्वीकृत 589 फैकल्टी पदों में से 203 पद खाली हैं। फैकल्टी की कमी मरीजों के इलाज के साथ-साथ MBBS और PG छात्रों की पढ़ाई और क्लिनिकल ट्रेनिंग पर भी पड़ रहा है। इसका असर फैकल्टी की कमी मेडिसिन, सर्जरी, रेडियोलॉजी, बर्न, चेस्ट, स्किन और एनेस्थीसिया जैसे महत्वपूर्ण विभागों में ज्यादा है। PMCH में प्रतिदिन 3 हजार से अधिक मरीज ओपीडी और इमरजेंसी में पहुंचते हैं। इनमें करीब 2 हजार से 2200 मरीज उन विभागों में इलाज के लिए आते हैं, जहां फैकल्टी की कमी अधिक है। वरिष्ठ चिकित्सकों की कमी के कारण जटिल मरीजों के इलाज, वार्ड राउंड, इमरजेंसी सुपरविजन और पीजी छात्रों की क्लिनिकल ट्रेनिंग पर अतिरिक्त दबाव बढ़ रहा है। 589 फैकल्टी पदों में से केवल 386 पर ही डॉक्टर कार्यरत उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, PMCH में कुल 589 फैकल्टी पदों में से केवल 386 पर ही डॉक्टर कार्यरत हैं, जबकि 203 पद रिक्त हैं। प्रोफेसर के 96 में से 38, एसोसिएट प्रोफेसर के 175 में से 101 और असिस्टेंट प्रोफेसर के 318 में से 247 पद खाली हैं। असिस्टेंट प्रोफेसर स्तर पर सबसे अधिक कमी है, जहां लगभग 78% पद रिक्त हैं। फैकल्टी के अलावा, ट्यूटर/डिमॉन्स्ट्रेटर और सीनियर रेजिडेंट के भी 229 स्वीकृत पदों में से 110 पद रिक्त हैं। नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) के मानकों के अनुरूप फैकल्टी की कमी से मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता और स्वास्थ्य सेवाओं पर व्यापक प्रभाव पड़ रहा है। मेडिसिन विभाग में 40 में सिर्फ 9 शिक्षक PMCH का मेडिसिन विभाग सबसे ज्यादा मरीजों का दबाव झेलने वाले विभागों में शामिल है। यहां प्रतिदिन करीब 400 से 500 मरीज ओपीडी में पहुंचते हैं। इसके बावजूद विभाग में स्वीकृत 40 फैकल्टी पदों के मुकाबले सिर्फ 9 शिक्षक कार्यरत हैं। यहां 9 स्वीकृत प्रोफेसर पदों के मुकाबले केवल 3 प्रोफेसर कार्यरत हैं। इसी तरह 12 एसोसिएट प्रोफेसर के पदों में से सिर्फ 1 कार्यरत हैं। वहीं, 19 असिस्टेंट प्रोफेसर के पदों में से केवल 5 ही कार्यरत हैं। यह दर्शाता है कि विभाग में वरिष्ठ और जूनियर दोनों स्तरों पर बड़ी संख्या में पद खाली हैं। ऐसे में मेडिसिन विभाग में वरिष्ठ डॉक्टरों की कमी का सीधा असर वार्ड राउंड, जटिल मरीजों के इलाज, ओपीडी, इमरजेंसी सुपरविजन और पीजी छात्रों के प्रशिक्षण पर पड़ने की आशंका है।
60 बेड का बर्न वार्ड, सिर्फ एक एसोसिएट प्रोफेसर PMCH के बर्न विभाग की स्थिति भी बेहद गंभीर है। अस्पताल में 60 बेड का बर्न वार्ड है, जहां राज्य भर से गंभीर रूप से झुलसे मरीज इलाज के लिए पहुंचते हैं। बताया गया है कि विभाग में महज एक एसोसिएट प्रोफेसर कार्यरत हैं। इसी तरह एक वरिष्ठ शिक्षक पर मरीजों के इलाज के साथ 8 पीजी डॉक्टरों की ट्रेनिंग की जिम्मेदारी भी है। बर्न मरीजों के इलाज में लगातार निगरानी, जटिल क्लिनिकल निर्णय और समय पर हस्तक्षेप की जरूरत होती है। ऐसे में एक ही वरिष्ठ शिक्षक पर इतनी बड़ी जिम्मेदारी होने से मरीजों की देखभाल और पीजी प्रशिक्षण दोनों पर दबाव बढ़ना स्वाभाविक है। सर्जरी में 5 प्रोफेसर की जगह सिर्फ 2 सर्जरी विभाग भी फैकल्टी संकट से जूझ रहा है। यहां 5 प्रोफेसर पद स्वीकृत हैं, लेकिन केवल 2 प्रोफेसर कार्यरत हैं। जटिल ऑपरेशन और गंभीर मरीजों की बड़ी संख्या को देखते हुए वरिष्ठ सर्जनों की कमी चिंता का विषय है। इसी तरह स्किन विभाग में प्रोफेसर का पद खाली बताया गया है। रेडियोलॉजी, चेस्ट एवं रेस्पिरेटरी मेडिसिन, एनेस्थीसिया, ईएनटी, पैथोलॉजी और माइक्रोबायोलॉजी समेत कई विभागों में भी स्वीकृत पदों की तुलना में फैकल्टी कम है। प्रोफेसर स्तर पर करीब 40% पद खाली PMCH में 96 प्रोफेसर पद स्वीकृत हैं। इनमें 58 कार्यरत हैं और 38 पद खाली हैं। यानी प्रोफेसर स्तर पर करीब 40% पद रिक्त हैं। मेडिसिन के अलावा एनेस्थीसिया, ऑर्थोपेडिक्स, ईएनटी, पैथोलॉजी, माइक्रोबायोलॉजी, बायोकेमिस्ट्री, कम्युनिटी मेडिसिन और फिजियोलॉजी जैसे विभागों में भी अलग-अलग स्तर पर फैकल्टी की कमी बताई गई है। 229 सीनियर रेजिडेंट/ट्यूटर में 110 पद खाली PMCH में ट्यूटर, डिमॉन्स्ट्रेटर और सीनियर रेजिडेंट के पदों की स्थिति भी बेहतर नहीं है। कुल 229 स्वीकृत पदों में 119 ही कार्यरत हैं, जबकि 110 पद खाली हैं। इसका सीधा असर ओपीडी, वार्ड, इमरजेंसी और पीजी छात्रों की क्लिनिकल ट्रेनिंग पर पड़ रहा है। वरिष्ठ डॉक्टरों की कमी के बीच सीनियर रेजिडेंट और पीजी डॉक्टरों पर काम का अतिरिक्त दबाव बढ़ रहा है। किसी एक डॉक्टर के छुट्टी पर जाने से बढ़ सकता है संकट कई विभागों में पहले से ही गिने-चुने वरिष्ठ डॉक्टर काम कर रहे हैं। ऐसे में किसी डॉक्टर के अवकाश, स्थानांतरण या अन्य कारण से अनुपस्थित रहने पर विभाग की व्यवस्था प्रभावित होने का खतरा बढ़ जाता है। फैकल्टी की कमी का असर सिर्फ क्लास और पीजी प्रशिक्षण तक सीमित नहीं है। वरिष्ठ चिकित्सक ही जटिल मरीजों के उपचार में निर्णय लेते हैं, ऑपरेशन की निगरानी करते हैं, वार्ड राउंड करते हैं और जूनियर डॉक्टरों को मार्गदर्शन देते हैं। इसलिए वरिष्ठ शिक्षकों की कमी का असर अस्पताल की क्लिनिकल सेवाओं पर भी पड़ सकता है। 250 PG सीटों की मान्यता पर मंडरा सकता है खतरा PMCH में 250 एमबीबीएस और 250 पीजी सीटों पर छात्रों को प्रशिक्षण दिया जाता है। मेडिकल कॉलेजों में पीजी शिक्षा के लिए पर्याप्त फैकल्टी और क्लिनिकल संसाधन जरूरी हैं। मेडिकल शिक्षा से जुड़े विशेषज्ञों के अनुसार, यदि लंबे समय तक फैकल्टी की कमी बनी रहती है तो राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) के निरीक्षण में कॉलेज को कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। इसका असर पीजी सीटों की मान्यता, सीटों की संख्या और नए पाठ्यक्रमों के विस्तार पर पड़ सकता है। हालांकि, केवल वर्तमान रिक्तियों के आधार पर यह कहना कि पीजी सीटों की मान्यता तत्काल खत्म हो जाएगी, उचित नहीं होगा। इसके लिए NMC के निरीक्षण और निर्धारित मानकों के अनुपालन की स्थिति भी देखी जाएगी। लेकिन लगातार बनी हुई बड़ी रिक्तियां निश्चित तौर पर संस्थान के लिए चिंता का विषय हैं। रोज 3 हजार से ज्यादा मरीज, लेकिन वरिष्ठ डॉक्टरों की कमी PMCH में प्रतिदिन 3 हजार से अधिक मरीज ओपीडी और इमरजेंसी में पहुंचते हैं। इनमें बड़ी संख्या गंभीर और रेफर किए गए मरीजों की होती है। मेडिसिन, सर्जरी, बर्न, चेस्ट और रेडियोलॉजी जैसे विभागों पर सबसे ज्यादा दबाव रहता है। ऐसे में मरीजों की संख्या और उपलब्ध वरिष्ठ डॉक्टरों के बीच बढ़ता अंतर अस्पताल प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। जटिल मामलों में समय पर विशेषज्ञ राय, इमरजेंसी सुपरविजन और पीजी डॉक्टरों की निगरानी सबसे महत्वपूर्ण होती है। एक्सपर्ट व्यू: फैकल्टी की कमी मरीजों की सुरक्षा का भी मुद्दा मेडिकल कॉलेज में फैकल्टी की कमी को केवल शैक्षणिक समस्या नहीं माना जा सकता। वरिष्ठ प्रोफेसरों और एसोसिएट प्रोफेसरों की मौजूदगी जटिल मरीजों के इलाज, ऑपरेशन की निगरानी, क्लिनिकल निर्णय, पीजी छात्रों के प्रशिक्षण और शोध के लिए जरूरी होती है। यदि लंबे समय तक रिक्तियां बनी रहती हैं तो इसका असर मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता के साथ अस्पताल की सेवाओं पर भी पड़ सकता है। खासकर बर्न, मेडिसिन, सर्जरी और इमरजेंसी जैसे विभागों में वरिष्ठ विशेषज्ञों की पर्याप्त उपलब्धता मरीजों की सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण है। स्वास्थ्य विभाग को भेजी गई रिक्त पदों की जानकारी PMCH प्रशासन का कहना है कि पठन-पाठन और मरीजों की सेवाएं प्रभावित न हों, इसके लिए उपलब्ध संसाधनों और फैकल्टी के साथ व्यवस्था संचालित की जा रही है। जहां शिक्षकों की कमी है, वहां आवश्यकतानुसार कार्य का समायोजन किया गया है। प्रशासन के अनुसार रिक्त पदों की जानकारी स्वास्थ्य विभाग को भेज दी गई है और शीघ्र नियुक्ति के लिए पत्राचार किया गया है। नए चिकित्सकों की तैनाती होने के साथ संबंधित विभागों में स्थिति और बेहतर होने की उम्मीद है। मेडिकल शिक्षा और पीजी सीटों की मान्यता पर भी खतरा PMCH जैसे राज्य के प्रमुख रेफरल अस्पताल में फैकल्टी के 203 पदों का खाली होना सिर्फ मेडिकल शिक्षा के लिए चुनौती नहीं है। इसका सीधा संबंध मरीजों की देखभाल, विशेषज्ञ निगरानी और पीजी डॉक्टरों के प्रशिक्षण से भी है। खासकर मेडिसिन और बर्न जैसे विभागों में स्थिति तत्काल सुधार की मांग करती है। विशेषों का मानना है कि समय पर नियुक्तियां नहीं हुईं तो अस्पताल की सेवाओं के साथ मेडिकल शिक्षा और पीजी सीटों की मान्यता पर भी दबाव बढ़ सकता है। बिहार के सबसे बड़े सरकारी अस्पतालों में शामिल पटना मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल (PMCH) डॉक्टरों और मेडिकल शिक्षकों की भारी कमी से जूझ रहा है। अस्पताल में स्वीकृत 589 फैकल्टी पदों में से 203 पद खाली हैं। फैकल्टी की कमी मरीजों के इलाज के साथ-साथ MBBS और PG छात्रों की पढ़ाई और क्लिनिकल ट्रेनिंग पर भी पड़ रहा है। इसका असर फैकल्टी की कमी मेडिसिन, सर्जरी, रेडियोलॉजी, बर्न, चेस्ट, स्किन और एनेस्थीसिया जैसे महत्वपूर्ण विभागों में ज्यादा है। PMCH में प्रतिदिन 3 हजार से अधिक मरीज ओपीडी और इमरजेंसी में पहुंचते हैं। इनमें करीब 2 हजार से 2200 मरीज उन विभागों में इलाज के लिए आते हैं, जहां फैकल्टी की कमी अधिक है। वरिष्ठ चिकित्सकों की कमी के कारण जटिल मरीजों के इलाज, वार्ड राउंड, इमरजेंसी सुपरविजन और पीजी छात्रों की क्लिनिकल ट्रेनिंग पर अतिरिक्त दबाव बढ़ रहा है। 589 फैकल्टी पदों में से केवल 386 पर ही डॉक्टर कार्यरत उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, PMCH में कुल 589 फैकल्टी पदों में से केवल 386 पर ही डॉक्टर कार्यरत हैं, जबकि 203 पद रिक्त हैं। प्रोफेसर के 96 में से 38, एसोसिएट प्रोफेसर के 175 में से 101 और असिस्टेंट प्रोफेसर के 318 में से 247 पद खाली हैं। असिस्टेंट प्रोफेसर स्तर पर सबसे अधिक कमी है, जहां लगभग 78% पद रिक्त हैं। फैकल्टी के अलावा, ट्यूटर/डिमॉन्स्ट्रेटर और सीनियर रेजिडेंट के भी 229 स्वीकृत पदों में से 110 पद रिक्त हैं। नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) के मानकों के अनुरूप फैकल्टी की कमी से मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता और स्वास्थ्य सेवाओं पर व्यापक प्रभाव पड़ रहा है। मेडिसिन विभाग में 40 में सिर्फ 9 शिक्षक PMCH का मेडिसिन विभाग सबसे ज्यादा मरीजों का दबाव झेलने वाले विभागों में शामिल है। यहां प्रतिदिन करीब 400 से 500 मरीज ओपीडी में पहुंचते हैं। इसके बावजूद विभाग में स्वीकृत 40 फैकल्टी पदों के मुकाबले सिर्फ 9 शिक्षक कार्यरत हैं। यहां 9 स्वीकृत प्रोफेसर पदों के मुकाबले केवल 3 प्रोफेसर कार्यरत हैं। इसी तरह 12 एसोसिएट प्रोफेसर के पदों में से सिर्फ 1 कार्यरत हैं। वहीं, 19 असिस्टेंट प्रोफेसर के पदों में से केवल 5 ही कार्यरत हैं। यह दर्शाता है कि विभाग में वरिष्ठ और जूनियर दोनों स्तरों पर बड़ी संख्या में पद खाली हैं। ऐसे में मेडिसिन विभाग में वरिष्ठ डॉक्टरों की कमी का सीधा असर वार्ड राउंड, जटिल मरीजों के इलाज, ओपीडी, इमरजेंसी सुपरविजन और पीजी छात्रों के प्रशिक्षण पर पड़ने की आशंका है।
60 बेड का बर्न वार्ड, सिर्फ एक एसोसिएट प्रोफेसर PMCH के बर्न विभाग की स्थिति भी बेहद गंभीर है। अस्पताल में 60 बेड का बर्न वार्ड है, जहां राज्य भर से गंभीर रूप से झुलसे मरीज इलाज के लिए पहुंचते हैं। बताया गया है कि विभाग में महज एक एसोसिएट प्रोफेसर कार्यरत हैं। इसी तरह एक वरिष्ठ शिक्षक पर मरीजों के इलाज के साथ 8 पीजी डॉक्टरों की ट्रेनिंग की जिम्मेदारी भी है। बर्न मरीजों के इलाज में लगातार निगरानी, जटिल क्लिनिकल निर्णय और समय पर हस्तक्षेप की जरूरत होती है। ऐसे में एक ही वरिष्ठ शिक्षक पर इतनी बड़ी जिम्मेदारी होने से मरीजों की देखभाल और पीजी प्रशिक्षण दोनों पर दबाव बढ़ना स्वाभाविक है। सर्जरी में 5 प्रोफेसर की जगह सिर्फ 2 सर्जरी विभाग भी फैकल्टी संकट से जूझ रहा है। यहां 5 प्रोफेसर पद स्वीकृत हैं, लेकिन केवल 2 प्रोफेसर कार्यरत हैं। जटिल ऑपरेशन और गंभीर मरीजों की बड़ी संख्या को देखते हुए वरिष्ठ सर्जनों की कमी चिंता का विषय है। इसी तरह स्किन विभाग में प्रोफेसर का पद खाली बताया गया है। रेडियोलॉजी, चेस्ट एवं रेस्पिरेटरी मेडिसिन, एनेस्थीसिया, ईएनटी, पैथोलॉजी और माइक्रोबायोलॉजी समेत कई विभागों में भी स्वीकृत पदों की तुलना में फैकल्टी कम है। प्रोफेसर स्तर पर करीब 40% पद खाली PMCH में 96 प्रोफेसर पद स्वीकृत हैं। इनमें 58 कार्यरत हैं और 38 पद खाली हैं। यानी प्रोफेसर स्तर पर करीब 40% पद रिक्त हैं। मेडिसिन के अलावा एनेस्थीसिया, ऑर्थोपेडिक्स, ईएनटी, पैथोलॉजी, माइक्रोबायोलॉजी, बायोकेमिस्ट्री, कम्युनिटी मेडिसिन और फिजियोलॉजी जैसे विभागों में भी अलग-अलग स्तर पर फैकल्टी की कमी बताई गई है। 229 सीनियर रेजिडेंट/ट्यूटर में 110 पद खाली PMCH में ट्यूटर, डिमॉन्स्ट्रेटर और सीनियर रेजिडेंट के पदों की स्थिति भी बेहतर नहीं है। कुल 229 स्वीकृत पदों में 119 ही कार्यरत हैं, जबकि 110 पद खाली हैं। इसका सीधा असर ओपीडी, वार्ड, इमरजेंसी और पीजी छात्रों की क्लिनिकल ट्रेनिंग पर पड़ रहा है। वरिष्ठ डॉक्टरों की कमी के बीच सीनियर रेजिडेंट और पीजी डॉक्टरों पर काम का अतिरिक्त दबाव बढ़ रहा है। किसी एक डॉक्टर के छुट्टी पर जाने से बढ़ सकता है संकट कई विभागों में पहले से ही गिने-चुने वरिष्ठ डॉक्टर काम कर रहे हैं। ऐसे में किसी डॉक्टर के अवकाश, स्थानांतरण या अन्य कारण से अनुपस्थित रहने पर विभाग की व्यवस्था प्रभावित होने का खतरा बढ़ जाता है। फैकल्टी की कमी का असर सिर्फ क्लास और पीजी प्रशिक्षण तक सीमित नहीं है। वरिष्ठ चिकित्सक ही जटिल मरीजों के उपचार में निर्णय लेते हैं, ऑपरेशन की निगरानी करते हैं, वार्ड राउंड करते हैं और जूनियर डॉक्टरों को मार्गदर्शन देते हैं। इसलिए वरिष्ठ शिक्षकों की कमी का असर अस्पताल की क्लिनिकल सेवाओं पर भी पड़ सकता है। 250 PG सीटों की मान्यता पर मंडरा सकता है खतरा PMCH में 250 एमबीबीएस और 250 पीजी सीटों पर छात्रों को प्रशिक्षण दिया जाता है। मेडिकल कॉलेजों में पीजी शिक्षा के लिए पर्याप्त फैकल्टी और क्लिनिकल संसाधन जरूरी हैं। मेडिकल शिक्षा से जुड़े विशेषज्ञों के अनुसार, यदि लंबे समय तक फैकल्टी की कमी बनी रहती है तो राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) के निरीक्षण में कॉलेज को कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। इसका असर पीजी सीटों की मान्यता, सीटों की संख्या और नए पाठ्यक्रमों के विस्तार पर पड़ सकता है। हालांकि, केवल वर्तमान रिक्तियों के आधार पर यह कहना कि पीजी सीटों की मान्यता तत्काल खत्म हो जाएगी, उचित नहीं होगा। इसके लिए NMC के निरीक्षण और निर्धारित मानकों के अनुपालन की स्थिति भी देखी जाएगी। लेकिन लगातार बनी हुई बड़ी रिक्तियां निश्चित तौर पर संस्थान के लिए चिंता का विषय हैं। रोज 3 हजार से ज्यादा मरीज, लेकिन वरिष्ठ डॉक्टरों की कमी PMCH में प्रतिदिन 3 हजार से अधिक मरीज ओपीडी और इमरजेंसी में पहुंचते हैं। इनमें बड़ी संख्या गंभीर और रेफर किए गए मरीजों की होती है। मेडिसिन, सर्जरी, बर्न, चेस्ट और रेडियोलॉजी जैसे विभागों पर सबसे ज्यादा दबाव रहता है। ऐसे में मरीजों की संख्या और उपलब्ध वरिष्ठ डॉक्टरों के बीच बढ़ता अंतर अस्पताल प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। जटिल मामलों में समय पर विशेषज्ञ राय, इमरजेंसी सुपरविजन और पीजी डॉक्टरों की निगरानी सबसे महत्वपूर्ण होती है। एक्सपर्ट व्यू: फैकल्टी की कमी मरीजों की सुरक्षा का भी मुद्दा मेडिकल कॉलेज में फैकल्टी की कमी को केवल शैक्षणिक समस्या नहीं माना जा सकता। वरिष्ठ प्रोफेसरों और एसोसिएट प्रोफेसरों की मौजूदगी जटिल मरीजों के इलाज, ऑपरेशन की निगरानी, क्लिनिकल निर्णय, पीजी छात्रों के प्रशिक्षण और शोध के लिए जरूरी होती है। यदि लंबे समय तक रिक्तियां बनी रहती हैं तो इसका असर मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता के साथ अस्पताल की सेवाओं पर भी पड़ सकता है। खासकर बर्न, मेडिसिन, सर्जरी और इमरजेंसी जैसे विभागों में वरिष्ठ विशेषज्ञों की पर्याप्त उपलब्धता मरीजों की सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण है। स्वास्थ्य विभाग को भेजी गई रिक्त पदों की जानकारी PMCH प्रशासन का कहना है कि पठन-पाठन और मरीजों की सेवाएं प्रभावित न हों, इसके लिए उपलब्ध संसाधनों और फैकल्टी के साथ व्यवस्था संचालित की जा रही है। जहां शिक्षकों की कमी है, वहां आवश्यकतानुसार कार्य का समायोजन किया गया है। प्रशासन के अनुसार रिक्त पदों की जानकारी स्वास्थ्य विभाग को भेज दी गई है और शीघ्र नियुक्ति के लिए पत्राचार किया गया है। नए चिकित्सकों की तैनाती होने के साथ संबंधित विभागों में स्थिति और बेहतर होने की उम्मीद है। मेडिकल शिक्षा और पीजी सीटों की मान्यता पर भी खतरा PMCH जैसे राज्य के प्रमुख रेफरल अस्पताल में फैकल्टी के 203 पदों का खाली होना सिर्फ मेडिकल शिक्षा के लिए चुनौती नहीं है। इसका सीधा संबंध मरीजों की देखभाल, विशेषज्ञ निगरानी और पीजी डॉक्टरों के प्रशिक्षण से भी है। खासकर मेडिसिन और बर्न जैसे विभागों में स्थिति तत्काल सुधार की मांग करती है। विशेषों का मानना है कि समय पर नियुक्तियां नहीं हुईं तो अस्पताल की सेवाओं के साथ मेडिकल शिक्षा और पीजी सीटों की मान्यता पर भी दबाव बढ़ सकता है।

