NCDRC Order On LIC Policy: अगर आपके पास LIC या किसी दूसरी कंपनी की जीवन बीमा पॉलिसी है और आपने उसके बदले बैंक से लोन लिया है, तो यह मामला आपके लिए समझना जरूरी है। आमतौर पर लोगों को लगता है कि पॉलिसी उनकी है, इसलिए बैंक या बीमा कंपनी उनकी मर्जी के बिना उसके साथ कोई बड़ा फैसला नहीं ले सकती। लेकिन अगर आपने लोन के बदले अपनी पॉलिसी बैंक के नाम असाइन कर दी है, तो स्थिति बदल सकती है। ऐसे में बैंक को पॉलिसी पर कुछ अधिकार मिल जाते हैं और लोन बकाया रहने पर बैंक के निर्देश पर पॉलिसी सरेंडर भी हो सकती है।
हरियाणा के मामले में हुआ क्या था?
लाइव मिंट की रिपोर्ट के मुताबिक, हरियाणा के सोनीपत जिले के खरखौदा निवासी अमर सिंह ने LIC की एक जीवन बीमा पॉलिसी खरीदी थी। उन्होंने 28 दिसंबर 2001 को यह पॉलिसी ली थी। पॉलिसी की बीमा राशि 5 लाख रुपये थी और यह 8 दिसंबर 2026 को मैच्योर होनी थी। कुछ साल बाद अमर सिंह को पैसों की जरूरत पड़ी। इसलिए उन्होंने अपनी LIC पॉलिसी को गारंटी के तौर पर 6 दिसंबर 2007 को IDBI बैंक के नाम असाइन कर दी और 79,000 रुपये की क्रेडिट लिमिट ले ली।
बिना अनुमति के पॉलिसी सरेंडर हो गई
रिपोर्ट के अनुसार, अमर सिंह अपनी पॉलिसी का प्रीमियम भरते रहे। लेकिन लोन का भुगतान नहीं होने पर बैंक की ओर से पॉलिसी सरेंडर करने की कार्रवाई की गई। LIC ने 5 अक्टूबर 2011 को पॉलिसी सरेंडर कर दी। उस समय पॉलिसी की सरेंडर वैल्यू 2,26,325 रुपये निकली और LIC ने यह रकम IDBI बैंक को भेज दी। अमर सिंह ने इसका विरोध करते हुए कहा कि उन्होंने पॉलिसी सरेंडर करने की अनुमति नहीं दी थी और पॉलिसी को दोबारा चालू करने की मांग की।
उपभोक्ता आयोग ने दिया फैसला
मामला सोनीपत के जिला उपभोक्ता आयोग में पहुंचा। फरवरी 2015 में जिला आयोग ने अमर सिंह के पक्ष में फैसला दिया। आयोग ने LIC को पॉलिसी बहाल करने का निर्देश दिया। साथ ही बैंक को 2,26,325 रुपये LIC को वापस करने के लिए कहा गया। लेकिन इसके बाद LIC इस फैसले के खिलाफ हरियाणा राज्य उपभोक्ता आयोग पहुंच गई। सितंबर 2016 में राज्य आयोग ने जिला आयोग का LIC के खिलाफ दिया गया फैसला रद्द कर दिया। राज्य आयोग का कहना था कि जब पॉलिसी बैंक के नाम असाइन हो चुकी थी, तब बैंक को पॉलिसी पर अधिकार मिल गए थे। इसलिए बैंक के निर्देश पर कार्रवाई करने से पहले LIC के लिए अमर सिंह को अलग से नोटिस देना जरूरी नहीं था। इसके बाद अमर सिंह ने NCDRC का दरवाजा खटखटाया।
NCDRC ने LIC को गलत नहीं माना
राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (NCDRC) ने पूरे मामले पर विचार करने के बाद कहा कि LIC ने बैंक के निर्देश और पॉलिसी के वैध असाइनमेंट के आधार पर कार्रवाई की थी। आयोग ने माना कि पॉलिसी बैंक के नाम असाइन की गई थी और लोन का भुगतान नहीं हुआ था। ऐसे में बैंक ने पॉलिसी सरेंडर कराई। LIC ने सरेंडर वैल्यू की गणना की और रकम बैंक को भेज दी। इसलिए NCDRC ने LIC की ओर से सेवा में किसी तरह की कमी नहीं मानी।
2.26 लाख रुपये का क्या हुआ?
मामले में एक और दिलचस्प बात सामने आई। IDBI बैंक ने NCDRC को बताया कि LIC से मिली 2,26,325 रुपये की रकम उसके सस्पेंस अकाउंट में पड़ी रही। अमर सिंह बैंक में अपने खाते बंद कर चुके थे, इसलिए चेक की रकम नहीं निकल सकी। इसके बाद NCDRC ने बैंक को निर्देश दिया कि वह एक महीने के भीतर 2,26,325 रुपये और उस पर जमा हुआ ब्याज अमर सिंह को दे। अगर बैंक तय समय में भुगतान नहीं करता है, तो उसे बकाया रकम पर 6 फीसदी सालाना ब्याज देना होगा।
आम पॉलिसीधारक के लिए इस मामले का सबसे बड़ा सबक
टैक्स एवं निवेश सलाहकार बलवंत जैन ने बताया कि इस पूरे मामले से एक बात समझ आती है। अगर आप अपनी LIC या किसी अन्य जीवन बीमा पॉलिसी के बदले बैंक से लोन लेते हैं, तो सिर्फ यह सोचकर निश्चिंत नहीं होना चाहिए कि पॉलिसी आपके नाम पर है और उस पर आपका पूरा नियंत्रण बना रहेगा। पॉलिसी को बैंक के नाम असाइन करने के बाद स्थिति बदल सकती है। अगर लोन का भुगतान नहीं होता है, तो बैंक, कानून और असाइनमेंट की शर्तों के अनुसार पॉलिसी से जुड़े अपने अधिकारों का इस्तेमाल कर सकता है। इसलिए पॉलिसी पर लोन लेते समय असाइनमेंट से जुड़ी शर्तों को अच्छी तरह समझना जरूरी है।

