अमेरिकी आर्मी का प्लेन तनाव के बावजूद रूस में लैंड:कौन सवार अभी रहस्य? ट्रम्प का एयरफोर्स वन ऑपरेट करने वाले मिलिट्री बेस से उड़ान भरी

अमेरिकी आर्मी का प्लेन तनाव के बावजूद रूस में लैंड:कौन सवार अभी रहस्य? ट्रम्प का एयरफोर्स वन ऑपरेट करने वाले मिलिट्री बेस से उड़ान भरी

अमेरिका और रूस के बीच तनाव के बीच अमेरिकी वायुसेना का एक बड़ा सैन्य विमान मंगलवार को अचानक मॉस्को में उतर गया। C-17A ग्लोबमास्टर III की यह लैंडिंग इसलिए असामान्य मानी जा रही है क्योंकि रूस की राजधानी में अमेरिकी सैन्य विमान का पहुंचना आम बात नहीं है। यह विमान वॉशिंगटन डीसी के पास मौजूद जॉइंट बेस एंड्रयूज से रीगा पहुंचा था। यह वही अमेरिकी सैन्य अड्डा है जहां राष्ट्रपति के विमानों का बेड़ा रहता है, जिसमें एयर फोर्स वन भी शामिल है। इसके बाद यही C-17 रीगा से उड़कर रूस की राजधानी पहुंचा। सबसे ज्यादा सवाल इस बात को लेकर उठ रहे हैं कि आखिर विमान में कौन था और उसे मॉस्को क्यों भेजा गया? रीगा से मॉस्को पहुंचा अमेरिकी सैन्य विमान फ्लाइट-ट्रैकिंग मॉनिटर के मुताबिक, विमान ने मॉस्को के समय के अनुसार सुबह करीब 8:50 बजे लातविया की राजधानी रीगा से उड़ान भरी और लगभग 74 मिनट बाद मॉस्को पहुंच गया। इस उड़ान की एक और खास बात यह रही कि विमान रूस के हवाई क्षेत्र से होकर मॉस्को पहुंचा। किसी अमेरिकी सैन्य विमान को इस रास्ते से उड़ान भरने के लिए रूसी अधिकारियों की मंजूरी जरूरी होती है। प्लेन के मिशन पर अब भी सस्पेंस रिकॉर्ड के मुताबिक, यही विमान 23 अगस्त को जॉइंट बेस एंड्रयूज से रीगा पहुंचा था। लेकिन अमेरिका और रूस दोनों ने अब तक यह नहीं बताया है कि इसे मॉस्को क्यों भेजा गया। विमान में कौन था और उसके अंदर क्या सामान था, इसकी जानकारी भी सामने नहीं आई है। असामान्य लैंडिंग के बाद विमान पर नजर रखने वाले लोगों और सोशल मीडिया यूजर्स के बीच कई तरह के कयास लगाए जाने लगे। कुछ लोगों ने इसे कैदियों की अदला-बदली, यूक्रेन युद्ध को लेकर किसी गुप्त बातचीत या अमेरिकी दूतावास से जुड़े काम से जोड़कर देखा। हालांकि, इनमें से किसी भी दावे की पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए फिलहाल यह साफ नहीं है कि अमेरिकी C-17 को मॉस्को भेजने के पीछे असली वजह क्या थी। प्लेन में क्या था, अभी पता नहीं मॉस्को जाने वाला यह विमान RCH4555 नाम से उड़ रहा था। सार्वजनिक फ्लाइट डेटा से इसकी आवाजाही का पता चलता है, लेकिन विमान में मौजूद लोगों या सामान की जानकारी नहीं मिलती। यही वजह है कि रूस और अमेरिका के बीच तनाव के इस दौर में इस उड़ान ने इतना ध्यान खींचा है। फिलहाल कैदियों की अदला-बदली, रूस-अमेरिका के बीच किसी खास बातचीत या अमेरिकी दूतावास से जुड़े काम जैसी बातें सिर्फ अंदाजे हैं। जब तक अमेरिका या रूस की तरफ से आधिकारिक जानकारी नहीं आती, विमान के मॉस्को पहुंचने की असली वजह सामने नहीं आएगी। अमेरिकी वायुसेना इसका इस्तेमाल कहां करती है? C-17 का काम सिर्फ सैनिकों और सैन्य उपकरणों को पहुंचाना नहीं है। अमेरिकी वायुसेना इसका इस्तेमाल सैनिकों और सामान की आवाजाही, हवा से सामान गिराने, घायल लोगों को निकालने और जरूरत के समय राहत पहुंचाने के लिए भी करती है। यह कोई लड़ाकू विमान या बॉम्बर नहीं है। इसका मुख्य काम भारी सामान और सैन्य उपकरणों को तेजी से एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाना है। C-17 ग्लोबमास्टर: टैंक से सैनिकों तक ले जाने में सक्षम C-17A ग्लोबमास्टर III अमेरिकी वायुसेना का भारी सैन्य परिवहन विमान है। इसका इस्तेमाल सैनिकों, सैन्य गाड़ियों और भारी सामान को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने के लिए किया जाता है। बोइंग ने बनाए इस विमान की सामान्य उड़ान गति करीब 834 किलोमीटर प्रति घंटा है। इतना बड़ा विमान होने के बावजूद C-17 करीब 3,500 फीट लंबी रनवे से भी उड़ान भर सकता है और उतर सकता है। इसकी एक खासियत यह भी है कि यह अपनी ताकत से पीछे की ओर चल सकता है। भारत के पास भी 11 C-17 ग्लोबमास्टर भारत के पास C-17 ग्लोबमास्टर के 11 विमान हैं। भारत ने 2011 में अमेरिका से 10 C-17 ग्लोबमास्टर III खरीदने का करीब 4.1 अरब डॉलर का सौदा किया था। पहला विमान जून 2013 में भारत पहुंचा और बाकी 10 विमानों की डिलीवरी 2014 तक पूरी हो गई। इसके बाद भारत को 2019 में 11वां C-17 मिला। खास बात यह है कि यह विमान पहले से बना हुआ था और बोइंग के पास बिना किसी खरीदार के रखा था। भारत ने इसे अपनी जरूरत के मुताबिक तैयार करवाकर हासिल किया। भारत के सभी 11 C-17 ग्लोबमास्टर भारतीय वायुसेना की 81 स्क्वाड्रन ‘स्काई लॉर्ड्स’ का हिस्सा हैं। इस यूनिट का बेस हिंडन एयरबेस में है। यमन से लेकर लद्दाख तक दिखा चुका है ताकत यमन, 2015: युद्ध के बीच C-17 ने 2,096 लोगों को भारत पहुंचाने में मदद की। सूडान, 2023: गृहयुद्ध के बीच करीब 24 घंटे चले रेस्क्यू मिशन में इसका इस्तेमाल हुआ। एक मिशन में 192 लोगों को निकाला गया। चीन सीमा के पास: 2018 में C-17 ने अरुणाचल प्रदेश की टूटिंग एयरस्ट्रिप पर लैंड किया। यह जगह चीन की सीमा से करीब 30 किलोमीटर दूर है। विमान वहां करीब 18 टन सामान लेकर पहुंचा था। लद्दाख: ऊंचाई वाले इलाकों में सैनिकों और भारी सैन्य सामान को तेजी से पहुंचाने में C-17 की अहम भूमिका रही है।

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