बेगूसराय- अनोखा गांव, जहां भगवान संग पूजे जाते हैं महापुरुष:सुबह रघुपति राघव तो शाम को गूंजते हैं देशभक्ति गीत, दरोगा-सेना में भर्ती की मांगी जाती है मन्नत

बेगूसराय- अनोखा गांव, जहां भगवान संग पूजे जाते हैं महापुरुष:सुबह रघुपति राघव तो शाम को गूंजते हैं देशभक्ति गीत, दरोगा-सेना में भर्ती की मांगी जाती है मन्नत

हर साल 15 अगस्त और 26 जनवरी आते ही देशभर में देशभक्ति की बयार बहने लगती है। नेता, प्रशासनिक अधिकारी और जनप्रतिनिधि स्वतंत्रता सेनानियों की प्रतिमाओं पर फूल-मालाएं चढ़ाते हैं, मंच से लंबे-चौड़े भाषण दिए जाते हैं और फिर शाम ढलते ही शहीदों की कुर्बानियों को अगले एक साल के लिए भुला दिया जाता है। लेकिन बिहार के बेगूसराय जिले में एक ऐसा गांव भी है, जहां देशभक्ति किसी एक-दो दिन की मोहताज नहीं है। यहां पिछले 35 वर्षों से हर रोज सुबह और शाम, भगवान शिव-दुर्गा के साथ-साथ देश के वीर सपूतों की बाकायदा पूजा-आरती की जाती है। यह कहानी है बेगूसराय जिला मुख्यालय से करीब 15 किलोमीटर दूर स्थित परना गांव की। यहां के ग्रामीणों ने धर्म और राष्ट्रधर्म का ऐसा अनोखा संगम पेश कर रहा है, जो पूरे देश के लिए मिसाल है। परना गांव में बने सार्वजनिक मंदिर परिसर में रोज सुबह की शुरुआत रघुपति राघव राजा राम के पावन भजन से होती है और रात का अंत भी इसी धुन के साथ होता है। मंदिर में जैसे ही शंखनाद और वैदिक मंत्रोच्चार शुरू होता है, वैसे ही लाउडस्पीकर पर देशभक्ति के तराने भी गूंजने लगते हैं। गांव के बच्चे से लेकर 90 वर्ष के बुजुर्ग तक सभी में देशभक्ति का एक अजब जुनून देखने को मिलता है। केवल राष्ट्रीय पर्व ही नहीं, बल्कि आम दिनों में भी यहां के लोग सुबह-शाम महापुरुषों के आदर्शों पर चलने का संकल्प लेते हैं। छोटे शिवालय से दिनकर नगर बनने की कहानी राजो महतो बताते हैं कि परना और चांदपुरा की सीमा पर स्थित इस पोखर के मुहाने पर दशकों पहले सिर्फ एक छोटा सा शिवालय हुआ करता था। 1987 में ग्रामीणों ने मिलकर यहां मां दुर्गा का मंदिर बनवाया और भव्य दुर्गा पूजा की शुरुआत की। 1990 में गांव के लोगों और तत्कालीन मुखिया के मन में विचार आया कि जिन महापुरुषों की बदौलत आज हम स्वतंत्र भारत में सांस ले रहे हैं, उन्हें सिर्फ 15 अगस्त या 26 जनवरी को याद करना काफी नहीं है। तत्कालीन मुखिया शिवराम महतो के नेतृत्व में 1990 में ग्रामीणों ने फैसला किया कि भगवान के साथ-साथ आजादी के दीवानों को भी रोजाना पूजा जाएगा। 1991 में पूरे गांव ने सामूहिक रूप से चंदा इकट्ठा किया। उस दौर में करीब ढाई लाख रुपये से अधिक की लागत से पोखर के किनारे शहीद स्मारक स्थल का निर्माण कराया गया। इस अनोखे मंदिर परिसर में एक तरफ भगवान भोलेनाथ का शिवलिंग, माता दुर्गा, श्रीराम, सीता और बजरंगबली की प्रतिमाएं स्थापित हैं। वहीं ठीक बगल में शहीद स्मारक स्थल पर महात्मा गांधी, सरदार पटेल, वीर कुंवर सिंह, लक्ष्मीबाई, भगत सिंह, खुदीराम बोस, चंद्रशेखर आजाद, सुभाष चंद्र बोस, डॉ. भीमराव अंबेडकर, रामधारी सिंह दिनकर एवं स्थानीय स्वतंत्रता सेनानी की प्रतिमाएं सुशोभित हैं। सेना और पुलिस में भर्ती के लिए युवा मांगते हैं मन्नत मंदिर के मुख्य पुजारी शिवज्योति झा ने बताया कि पूर्व मुखिया शिवराम महतो का उद्देश्य था कि हम भगवती और महादेव की पूजा तो करते ही हैं, लेकिन जिन वीरों ने देश को अंग्रेजों की गुलामी से आजाद कराने के लिए अपनी जान दांव पर लगा दी, वे भी भगवान से कम नहीं हैं। भगवती की आराधना के साथ-साथ इन शहीदों की भी रोज पूजा होनी चाहिए ताकि आने वाली पीढ़ियां इनके त्याग को याद रख सकें। सिर्फ परना पंचायत के लोग ही नहीं, बल्कि आसपास के तमाम गांव चांदपुरा, नीमा, अझौर, वन्द्वार, सांख, रजौड़ा और पूरे बेगूसराय जिले से श्रद्धालु आते हैं। दूसरे जिलों से भी लोग दर्शन करने पहुंचते हैं। जो युवा दरोगा, भारतीय सेना या बिहार पुलिस में भर्ती होना चाहते हैं, वे यहां आकर भगवती और इन वीर शहीदों की प्रतिमाओं के सामने मन्नत मांगते हैं। शहीदों का आशीर्वाद लेकर जाने वाले कई युवाओं की मनोकामनाएं पूर्ण हुई हैं और वे आज देश की सेवा में तैनात हैं। देश के लिए सर्वस्व न्योछावर करने वाले शहीद देवताओं से बढ़कर परना के ग्रामीण सुरेश दास ने बताया कि महापुरुषों की पूजा का उद्देश्य है कि इन्होंने देश के लिए तो सब कुछ कुर्बान कर दिया है। ये देवता से कम नहीं हैं, ये तो देवता से बढ़े हुए हैं। हम लोग इनका भी पूजा करते हैं, इन्हें देवता समान मानते हैं। शहीदों के प्रति यह अगाध श्रद्धा केवल परना पंचायत तक सीमित नहीं है, बल्कि दूर-दराज के गांवों से भी लोग यहां आते हैं। महापुरुषों का भी फूल-माला से पूजन और स्नान होता है। उन्होंने बताया कि जिस प्रकार धर्म-ग्रंथों में देवी-देवताओं को उनके महान कर्मों और कठोर तपस्या के लिए सर्वोच्च स्थान दिया गया है, ठीक उसी प्रकार इन अमर बलिदानियों ने भी अपनी तपस्या और महान कर्म से देवत्व प्राप्त किया है। हम लोग यही पूजते हैं कि जैसे देवी-देवता तपस्या और कर्म करके इतने बड़े ऊंचे देवी-देवता बने हैं, तो महापुरुषों ने भी वही कर्म किया है। इन्होंने ऐसा महान कर्म किया कि हमारा देश गुलाम था, उसको अंग्रेजों से छुटकारा दिलवाए। अपनी जान की कुर्बानी दी। 1991 से अनवरत जारी है भक्ति का यह सिलसिला 1991 से शुरू हुआ यह भक्ति और राष्ट्रप्रेम का अनूठा सिलसिला आज 2026 में भी बिना रुके, बिना थमे बदस्तूर जारी है। परना गांव के लोगों ने यह दिखाया है कि शहीदों को याद रखने के लिए केवल भाषणों की जरूरत नहीं होती, बल्कि उन्हें अपने दैनिक जीवन और संस्कारों में शामिल करना पड़ता है। यह प्रांगण अहसास कराता है कि भारत की आत्मा आज भी अपने वीरों के सम्मान में उतनी ही श्रद्धा से झुकती है, जितनी भगवान के दरबार में। हर साल 15 अगस्त और 26 जनवरी आते ही देशभर में देशभक्ति की बयार बहने लगती है। नेता, प्रशासनिक अधिकारी और जनप्रतिनिधि स्वतंत्रता सेनानियों की प्रतिमाओं पर फूल-मालाएं चढ़ाते हैं, मंच से लंबे-चौड़े भाषण दिए जाते हैं और फिर शाम ढलते ही शहीदों की कुर्बानियों को अगले एक साल के लिए भुला दिया जाता है। लेकिन बिहार के बेगूसराय जिले में एक ऐसा गांव भी है, जहां देशभक्ति किसी एक-दो दिन की मोहताज नहीं है। यहां पिछले 35 वर्षों से हर रोज सुबह और शाम, भगवान शिव-दुर्गा के साथ-साथ देश के वीर सपूतों की बाकायदा पूजा-आरती की जाती है। यह कहानी है बेगूसराय जिला मुख्यालय से करीब 15 किलोमीटर दूर स्थित परना गांव की। यहां के ग्रामीणों ने धर्म और राष्ट्रधर्म का ऐसा अनोखा संगम पेश कर रहा है, जो पूरे देश के लिए मिसाल है। परना गांव में बने सार्वजनिक मंदिर परिसर में रोज सुबह की शुरुआत रघुपति राघव राजा राम के पावन भजन से होती है और रात का अंत भी इसी धुन के साथ होता है। मंदिर में जैसे ही शंखनाद और वैदिक मंत्रोच्चार शुरू होता है, वैसे ही लाउडस्पीकर पर देशभक्ति के तराने भी गूंजने लगते हैं। गांव के बच्चे से लेकर 90 वर्ष के बुजुर्ग तक सभी में देशभक्ति का एक अजब जुनून देखने को मिलता है। केवल राष्ट्रीय पर्व ही नहीं, बल्कि आम दिनों में भी यहां के लोग सुबह-शाम महापुरुषों के आदर्शों पर चलने का संकल्प लेते हैं। छोटे शिवालय से दिनकर नगर बनने की कहानी राजो महतो बताते हैं कि परना और चांदपुरा की सीमा पर स्थित इस पोखर के मुहाने पर दशकों पहले सिर्फ एक छोटा सा शिवालय हुआ करता था। 1987 में ग्रामीणों ने मिलकर यहां मां दुर्गा का मंदिर बनवाया और भव्य दुर्गा पूजा की शुरुआत की। 1990 में गांव के लोगों और तत्कालीन मुखिया के मन में विचार आया कि जिन महापुरुषों की बदौलत आज हम स्वतंत्र भारत में सांस ले रहे हैं, उन्हें सिर्फ 15 अगस्त या 26 जनवरी को याद करना काफी नहीं है। तत्कालीन मुखिया शिवराम महतो के नेतृत्व में 1990 में ग्रामीणों ने फैसला किया कि भगवान के साथ-साथ आजादी के दीवानों को भी रोजाना पूजा जाएगा। 1991 में पूरे गांव ने सामूहिक रूप से चंदा इकट्ठा किया। उस दौर में करीब ढाई लाख रुपये से अधिक की लागत से पोखर के किनारे शहीद स्मारक स्थल का निर्माण कराया गया। इस अनोखे मंदिर परिसर में एक तरफ भगवान भोलेनाथ का शिवलिंग, माता दुर्गा, श्रीराम, सीता और बजरंगबली की प्रतिमाएं स्थापित हैं। वहीं ठीक बगल में शहीद स्मारक स्थल पर महात्मा गांधी, सरदार पटेल, वीर कुंवर सिंह, लक्ष्मीबाई, भगत सिंह, खुदीराम बोस, चंद्रशेखर आजाद, सुभाष चंद्र बोस, डॉ. भीमराव अंबेडकर, रामधारी सिंह दिनकर एवं स्थानीय स्वतंत्रता सेनानी की प्रतिमाएं सुशोभित हैं। सेना और पुलिस में भर्ती के लिए युवा मांगते हैं मन्नत मंदिर के मुख्य पुजारी शिवज्योति झा ने बताया कि पूर्व मुखिया शिवराम महतो का उद्देश्य था कि हम भगवती और महादेव की पूजा तो करते ही हैं, लेकिन जिन वीरों ने देश को अंग्रेजों की गुलामी से आजाद कराने के लिए अपनी जान दांव पर लगा दी, वे भी भगवान से कम नहीं हैं। भगवती की आराधना के साथ-साथ इन शहीदों की भी रोज पूजा होनी चाहिए ताकि आने वाली पीढ़ियां इनके त्याग को याद रख सकें। सिर्फ परना पंचायत के लोग ही नहीं, बल्कि आसपास के तमाम गांव चांदपुरा, नीमा, अझौर, वन्द्वार, सांख, रजौड़ा और पूरे बेगूसराय जिले से श्रद्धालु आते हैं। दूसरे जिलों से भी लोग दर्शन करने पहुंचते हैं। जो युवा दरोगा, भारतीय सेना या बिहार पुलिस में भर्ती होना चाहते हैं, वे यहां आकर भगवती और इन वीर शहीदों की प्रतिमाओं के सामने मन्नत मांगते हैं। शहीदों का आशीर्वाद लेकर जाने वाले कई युवाओं की मनोकामनाएं पूर्ण हुई हैं और वे आज देश की सेवा में तैनात हैं। देश के लिए सर्वस्व न्योछावर करने वाले शहीद देवताओं से बढ़कर परना के ग्रामीण सुरेश दास ने बताया कि महापुरुषों की पूजा का उद्देश्य है कि इन्होंने देश के लिए तो सब कुछ कुर्बान कर दिया है। ये देवता से कम नहीं हैं, ये तो देवता से बढ़े हुए हैं। हम लोग इनका भी पूजा करते हैं, इन्हें देवता समान मानते हैं। शहीदों के प्रति यह अगाध श्रद्धा केवल परना पंचायत तक सीमित नहीं है, बल्कि दूर-दराज के गांवों से भी लोग यहां आते हैं। महापुरुषों का भी फूल-माला से पूजन और स्नान होता है। उन्होंने बताया कि जिस प्रकार धर्म-ग्रंथों में देवी-देवताओं को उनके महान कर्मों और कठोर तपस्या के लिए सर्वोच्च स्थान दिया गया है, ठीक उसी प्रकार इन अमर बलिदानियों ने भी अपनी तपस्या और महान कर्म से देवत्व प्राप्त किया है। हम लोग यही पूजते हैं कि जैसे देवी-देवता तपस्या और कर्म करके इतने बड़े ऊंचे देवी-देवता बने हैं, तो महापुरुषों ने भी वही कर्म किया है। इन्होंने ऐसा महान कर्म किया कि हमारा देश गुलाम था, उसको अंग्रेजों से छुटकारा दिलवाए। अपनी जान की कुर्बानी दी। 1991 से अनवरत जारी है भक्ति का यह सिलसिला 1991 से शुरू हुआ यह भक्ति और राष्ट्रप्रेम का अनूठा सिलसिला आज 2026 में भी बिना रुके, बिना थमे बदस्तूर जारी है। परना गांव के लोगों ने यह दिखाया है कि शहीदों को याद रखने के लिए केवल भाषणों की जरूरत नहीं होती, बल्कि उन्हें अपने दैनिक जीवन और संस्कारों में शामिल करना पड़ता है। यह प्रांगण अहसास कराता है कि भारत की आत्मा आज भी अपने वीरों के सम्मान में उतनी ही श्रद्धा से झुकती है, जितनी भगवान के दरबार में।  

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