बोरास गोलीकांड, जब आंदोलनकारियों पर बरसाई गोलियां:भोपाल के इतिहास में 14 जनवरी सिर्फ एक तारीख नहीं, दो रक्तरंजित अध्यायों की गवाह

बोरास गोलीकांड, जब आंदोलनकारियों पर बरसाई गोलियां:भोपाल के इतिहास में 14 जनवरी सिर्फ एक तारीख नहीं, दो रक्तरंजित अध्यायों की गवाह

सच्ची बात, बेधड़क। दैनिक भास्कर भोपाल संस्करण के 68 वर्ष पूरे होने पर हम 11 दिन तक हर सुबह भोपाल की नई कहानी, अनदेखे पहलू की एक विशेष शृंखला लेकर आए हैं। हम आपको भोपाल के सबसे बड़े बदलावों, शहर को जीवन देने वाली धरोहरों पर विशेषज्ञों के मंथन, पुराने दस्तावेजों और दुर्लभ अभिलेखों की पड़ताल से निकले अनकहे सच, तथ्यों पर आधारित एक्सक्लूसिव खुलासों और दुर्लभ तस्वीरों के संग्रह से रूबरू कराएंगे। पढ़िए आज की कहानी… भोपाल के इतिहास में 14 जनवरी सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि दो रक्तरंजित अध्यायों की गवाह है। पहला अध्याय 14 जनवरी 1858 को लिखा गया, जब सीहोर में ‘सिपाही बहादुर सरकार’ को कुचलने के लिए अंग्रेजों ने 356 क्रांतिकारियों को गोलियों से भून दिया। दूसरा अध्याय ठीक 91 साल बाद, 14 जनवरी 1949 को लिखा गया, जब नर्मदा किनारे बसे बोरास गांव में तिरंगा फहराने निकले लोगों पर नवाबी पुलिस ने फायरिंग कर दी। उस समय तक भोपाल भारत संघ से जुड़ चुका था, लेकिन नवाबशाही कायम थी। लोकप्रिय सरकार से जनता का भरोसा उठ चुका था और पूरे प्रदेश में पूर्ण विलय की मांग तेज होती जा रही थी। गांव-गांव तिरंगा यात्राएं निकल रही थीं। मकर संक्रांति के दिन बोरास में भी बड़ी संख्या में लोग तिरंगा फहराने के लिए एकत्र हुए। नवाबी प्रशासन पहले से सतर्क था। आंदोलन के कई प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार किया जा चुका था। सभा स्थल को पुलिस ने चारों ओर से घेर रखा था और लोगों की लाठियां तक जमा करा ली थीं। इसके बावजूद युवाओं का एक जत्था ‘वंदे मातरम्’ के नारों के साथ तिरंगा लेकर आगे बढ़ा। तनाव बढ़ा तो प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़प हो गई। भीड़ ने पुलिस चौकी पर कब्जा करने और सिपाहियों से राइफलें छीनने की कोशिश की। इसके बाद थानेदार जाफर अली के आदेश पर पुलिस ने निहत्थी भीड़ पर अंधाधुंध गोलियां चला दीं। इस गोलीबारी में 4 आंदोलनकारी शहीद हो गए। कुछ स्रोतों में शहीदों की संख्या तीन बताई गई है। इस घटना को ‘भोपाल का जलियांवाला बाग’ कहा गया। यहीं से नवाब पर दबाव बढ़ा बोरास गोलीकांड के बाद पूरे भोपाल में जनाक्रोश फैल गया। नवाबी शासन पर दबाव कई गुना बढ़ गया। जनता और प्रशासन के बीच टकराव इतना गहरा गया कि लोकप्रिय सरकार भी पूरी तरह अप्रभावी साबित हुई। मामला दिल्ली तक पहुंचा और भारत में विलय का दबाव बढ़ गया। (स्रोत : मध्यप्रदेश सरकार के स्वराज संस्थान संचालनालय से प्रकाशित पुस्तक ‘भोपाल रियासत का इतिहास 1722 से 1949 तक’।) (कल पार्ट 8 में पढ़िए नई कहानी)

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