पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के बीच देश में खाद और बायो फर्टिलाइजर की कमी का अंदेशा गहरा गया है। इस वैश्विक संकट का सीधा असर बिहार के खरीफ सीजन पर पड़ना तय है, जहां इस बार 10 लाख मीट्रिक टन खाद की जरूरत के मुकाबले महज 3 लाख मीट्रिक टन ही उपलब्धता है। इस 7 लाख मीट्रिक टन की भारी किल्लत को पूरा करने का जिम्मा कृषि विभाग के कंधों पर है। दूसरी ओर रसायनिक खाद पर निर्भरता कम करने के लिए साल 2013 में जैविक प्रोत्साहन योजना के तहत सूबे में 26 व्यावसायिक वर्मी कम्पोस्ट इकाइयां स्थापित की गई थीं, जिनमें से अधिकतर मार्केटिंग सपोर्ट न मिलने और साल 2018 में योजना बंद होने के कारण दम तोड़ चुकी हैं। सरकारी उपेक्षा के कारण बिहार के किसान खाद के लिए तरस रहे हैं, जबकि यहां की बची हुई सक्रिय इकाइयां अपना जैविक खाद दूसरे राज्यों में निर्यात करने को मजबूर हैं। सारण की इकाई बंद, नालंदा और चंपारण दूसरे राज्यों के भरोसे सरकार ने 2015 में 50 प्रतिशत अनुदान पर नालंदा, पूर्वी चंपारण और सारण में तीन जैव उर्वरक इकाइयां शुरू करवाई थीं। पूर्वी चंपारण के हरसिद्धी बायोटेक इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के नागार्जुन कुशवाहा ने बताया कि वे साल 2015 से हर साल लगभग 300 मीट्रिक टन जैव उर्वरक, वर्मी कम्पोस्ट और आर्गेनिक मैन्योर का उत्पादन कर रहे हैं। वहीं, नालंदा के क्षितिज बायोटेक के निदेशक सुनील कुमार बताते हैं कि बिहार सरकार द्वारा उत्पाद नहीं खरीदने के कारण अब पूर्वी चंपारण और नालंदा की इकाइयां दूसरे राज्यों में मार्केटिंग कर रही हैं। बिहार में तैयार होने वाले पीएसबी, एजोटोबेक्टर, राइजोबियम, ट्राइकोडर्मा और एजोस्पाइलम जैसे जैव उर्वरक का लाभ पड़ोसी राज्यों को मिल रहा है। सरकारी उदासीनता के कारण सारण की इकाई बंद हो गई है। जैविक कॉरिडोर में बनता है पक्का वर्मी बेड : जैविक कॉरिडोर योजना के तहत 13 जिलों में 20 हजार एकड़ में जैविक खेती कराई जा रही है। इसके तहत एक फार्मर प्रोड्यूसर कंपनियों को 25 एकड़ जमीन पर जैविक खेती करने के लिए 11500 रुपए दिए जाते हैं। साल 2024-25 में पक्का वर्मी बेड 6 हजार 594 बनाया गया और 2025-26 में 76 हजार 643 वर्मी बेड बनाया गया है। बिहार में व्यावसायिक वर्मी कंपोस्ट ईकाई साल 2012 में शुरू हुई थी। साल 2018 में योजना स्वीकृत नहीं होने से बंद हो गई। अब दोबारा योजना की शुरुआत की जा रही है। किसानों को जैविक कॉरिडोर योजना में पक्का वर्मी बेड बनाकर दिया जा रहा है। – ब्रज किशोर, संयुक्त निदेशक, रसायन पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के बीच देश में खाद और बायो फर्टिलाइजर की कमी का अंदेशा गहरा गया है। इस वैश्विक संकट का सीधा असर बिहार के खरीफ सीजन पर पड़ना तय है, जहां इस बार 10 लाख मीट्रिक टन खाद की जरूरत के मुकाबले महज 3 लाख मीट्रिक टन ही उपलब्धता है। इस 7 लाख मीट्रिक टन की भारी किल्लत को पूरा करने का जिम्मा कृषि विभाग के कंधों पर है। दूसरी ओर रसायनिक खाद पर निर्भरता कम करने के लिए साल 2013 में जैविक प्रोत्साहन योजना के तहत सूबे में 26 व्यावसायिक वर्मी कम्पोस्ट इकाइयां स्थापित की गई थीं, जिनमें से अधिकतर मार्केटिंग सपोर्ट न मिलने और साल 2018 में योजना बंद होने के कारण दम तोड़ चुकी हैं। सरकारी उपेक्षा के कारण बिहार के किसान खाद के लिए तरस रहे हैं, जबकि यहां की बची हुई सक्रिय इकाइयां अपना जैविक खाद दूसरे राज्यों में निर्यात करने को मजबूर हैं। सारण की इकाई बंद, नालंदा और चंपारण दूसरे राज्यों के भरोसे सरकार ने 2015 में 50 प्रतिशत अनुदान पर नालंदा, पूर्वी चंपारण और सारण में तीन जैव उर्वरक इकाइयां शुरू करवाई थीं। पूर्वी चंपारण के हरसिद्धी बायोटेक इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के नागार्जुन कुशवाहा ने बताया कि वे साल 2015 से हर साल लगभग 300 मीट्रिक टन जैव उर्वरक, वर्मी कम्पोस्ट और आर्गेनिक मैन्योर का उत्पादन कर रहे हैं। वहीं, नालंदा के क्षितिज बायोटेक के निदेशक सुनील कुमार बताते हैं कि बिहार सरकार द्वारा उत्पाद नहीं खरीदने के कारण अब पूर्वी चंपारण और नालंदा की इकाइयां दूसरे राज्यों में मार्केटिंग कर रही हैं। बिहार में तैयार होने वाले पीएसबी, एजोटोबेक्टर, राइजोबियम, ट्राइकोडर्मा और एजोस्पाइलम जैसे जैव उर्वरक का लाभ पड़ोसी राज्यों को मिल रहा है। सरकारी उदासीनता के कारण सारण की इकाई बंद हो गई है। जैविक कॉरिडोर में बनता है पक्का वर्मी बेड : जैविक कॉरिडोर योजना के तहत 13 जिलों में 20 हजार एकड़ में जैविक खेती कराई जा रही है। इसके तहत एक फार्मर प्रोड्यूसर कंपनियों को 25 एकड़ जमीन पर जैविक खेती करने के लिए 11500 रुपए दिए जाते हैं। साल 2024-25 में पक्का वर्मी बेड 6 हजार 594 बनाया गया और 2025-26 में 76 हजार 643 वर्मी बेड बनाया गया है। बिहार में व्यावसायिक वर्मी कंपोस्ट ईकाई साल 2012 में शुरू हुई थी। साल 2018 में योजना स्वीकृत नहीं होने से बंद हो गई। अब दोबारा योजना की शुरुआत की जा रही है। किसानों को जैविक कॉरिडोर योजना में पक्का वर्मी बेड बनाकर दिया जा रहा है। – ब्रज किशोर, संयुक्त निदेशक, रसायन


