Health Alert: गर्मी के मौसम में बच्चों के हाथों में कोल्ड ड्रिंक और फ्लेवर्ड सॉफ्ट ड्रिंक की बोतलें आम नजर आती हैं, लेकिन यही मीठे पेय अब बच्चों की सेहत के लिए बड़ा खतरा बनते जा रहे हैं। रायपुर के सरकारी और निजी अस्पतालों में कम उम्र के बच्चों और किशोरों में टाइप-2 डायबिटीज के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। डॉक्टरों का कहना है कि अत्यधिक शुगर वाले सॉफ्ट ड्रिंक, जंक फूड, मोबाइल-टीवी की लत और शारीरिक गतिविधियों की कमी बच्चों को कम उम्र में ही गंभीर बीमारियों की ओर धकेल रही है।
Health Alert: सॉफ्ट ड्रिंक का मीठा जहर निशाने पर बचपन
कॉफी, चाय और सॉफ्ट ड्रिंक का बढ़ता सेवन अब बच्चों और किशोरों की सेहत पर भारी पड़ने लगा है। डॉक्टरों के अनुसार ज्यादा शुगर और जंक फूड के कारण बच्चों में न केवल मोटापा और पेट के आसपास चर्बी बढ़ रही है, बल्कि टाइप-2 डायबिटीज और फैटी लिवर जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा भी तेजी से बढ़ रहा है। राजधानी के सरकारी और निजी अस्पतालों में ऐसे मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। आंबेडकर अस्पताल समेत निजी अस्पतालों के पीडियाट्रिक और जनरल मेडिसिन विभाग में अब बड़ी संख्या में बच्चे और किशोर डायबिटीज की समस्या लेकर पहुंच रहे हैं।
ओपीडी में प्रतिदिन 200 से 250 तक मरीज
डॉक्टरों का कहना है कि पहले जहां ऐसे मरीज गिनती के होते थे, वहीं अब ओपीडी में प्रतिदिन 200 से 250 तक मरीज पहुंच रहे हैं। इनमें 12 से 13 साल तक के बच्चे भी शामिल हैं, जबकि कई मामलों में इससे कम उम्र के बच्चों में भी टाइप-2 डायबिटीज के लक्षण पाए जा रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार आजकल बच्चे दिनभर में कई बार चाय, कॉफी और सॉफ्ट ड्रिंक का सेवन कर रहे हैं। इससे उनके शरीर में रोजाना करीब 200 ग्राम या उससे अधिक शक्कर पहुंच रही है, जो सामान्य जरूरत से कई गुना ज्यादा है। ज्यादा शुगर सीधे डायबिटीज का कारण नहीं बनती, लेकिन इससे शरीर में अनावश्यक कैलोरी बढ़ती है, जो मोटापे को जन्म देती है और यही मोटापा आगे चलकर टाइप-2 डायबिटीज का बड़ा कारण बनता है।
मोटापा, पेट पर चर्बी और फैटी लिवर के मामलों में तेजी
राजधानी में पान ठेलों से लेकर परचून दुकानों तक सॉफ्ट ड्रिंक आसानी से उपलब्ध है। डॉक्टरों का कहना है कि पिछले 10 वर्षों में बच्चों में मोटापा, पेट पर चर्बी और फैटी लिवर के मामलों में तेजी से वृद्धि हुई है। यह स्थिति बेहद चिंताजनक है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार एक व्यक्ति को प्रतिदिन 40 ग्राम या उससे कम शक्कर का सेवन करना चाहिए, जबकि आजकल कई बच्चे 150 से 200 ग्राम तक शक्कर ले रहे हैं। वहीं अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन के अनुसार रोजाना अधिकतम 25 ग्राम शक्कर ही स्वास्थ्य के लिए सुरक्षित मानी जाती है।
10 से 16 साल के बच्चों में असर
विशेषज्ञों के मुताबिक पहले टाइप-2 डायबिटीज को केवल वयस्कों की बीमारी माना जाता था, लेकिन अब 10 से 16 साल के बच्चों में भी इसके लक्षण तेजी से सामने आ रहे हैं। अस्पतालों में मोटापा, हाई ब्लड शुगर, थकान और लगातार प्यास लगने जैसी शिकायतों के साथ बच्चों की संख्या बढ़ी है। डॉक्टर बताते हैं कि एक सामान्य सॉफ्ट ड्रिंक की बोतल में कई चम्मच तक चीनी होती है। लगातार ऐसे पेय पीने से शरीर में इंसुलिन का संतुलन बिगड़ने लगता है। यही आगे चलकर डायबिटीज, मोटापा और हृदय संबंधी बीमारियों का कारण बनता है। बच्चों में फिजिकल एक्टिविटी कम होना भी स्थिति को और गंभीर बना रहा है।
जीवनशैली भी बन रही बड़ी वजह
डॉक्टरों के मुताबिक खराब खानपान के साथ-साथ शारीरिक गतिविधियों में कमी, मोबाइल फोन का अधिक इस्तेमाल और एक्सरसाइज से दूरी भी बच्चों और युवाओं में डायबिटीज का खतरा बढ़ा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि समय रहते खानपान और जीवनशैली में सुधार कर इस बीमारी से बचा जा सकता है।
नेहरू मेडिकल कॉलेज के एचओडी ने कहा
एचओडी पीडियाट्रिक्स नेहरू मेडिकल कॉलेज डॉ. ओंकार खंडवाल ने कहा ज्यादा शुगर लेना न केवल बच्चों के लिए, बल्कि बड़ों के लिए भी स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। बच्चों में बढ़ता टाइप-2 डायबिटीज चिंता का बड़ा कारण बनता जा रहा है। बेहतर है कि पैरेंट्स बच्चों को ज्यादा मीठा व सॉफ्ट ड्रिंक से दूर रखें। इससे डायबिटीज नहीं होगा। फैटी लिवर व मोटापा भी ज्यादा शुगर की देन है।
नेहरू मेडिकल कॉलेज प्रभारी एचओडी ने कहा
प्रभारी एचओडी मेडिसिन नेहरू मेडिकल कॉलेज डॉ. योगेंद्र मल्होत्रा जंक फूड व ज्यादा साफ्ट ड्रिंक लेने से किशोरों व युवाओं में डायबिटीज का रिस्क बढ़ता ही जा रहा है। ओपीडी में ऐसे कई किशोर व युवा आते हैं, जिनके ब्लड में शुगर लेवल काफी बढ़ा हुआ रहता है। ऐसे लोगों को मीठी चीजों से दूर रहने कहा जा रहा है। यही नहीं एक्सरसाइज पर ध्यान देने, मोबाइल फोन से दूर रहने व खानपान में सुधार करने कहा जा रहा है।
डॉक्टरों ने दी ये सलाह
बच्चों को रोजाना सॉफ्ट ड्रिंक देने से बचें
घर का ताजा भोजन और फल ज्यादा दें
मोबाइल और टीवी स्क्रीन टाइम सीमित करें
नियमित खेलकूद और एक्सरसाइज जरूरी बनाएं
बच्चों का समय-समय पर हेल्थ चेकअप कराएं


