Enriched Uranium Transfer: अमेरिका और ईरान के बीच चल रही परमाणु वार्ताओं के चलते तनाव एक बार फिर चरम पर पहुंच गया है। अमेरिकी प्रशासन ने जारी बातचीत के दौरान ईरान के सामने 5 बेहद सख्त शर्तें रख दी हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, वॉशिंगटन ने इन वार्ताओं के हिस्से के रूप में ईरान से साफ तौर पर मांग की है कि वह अपना 400 किलोग्राम संवर्धित यूरेनियम अमेरिका के हवाले कर दे।
ट्रंप ने ठुकराया प्रस्ताव, हर्जाना देने से भी किया इनकार
ईरान मीडिया के मुताबिक, अमेरिका ने पूर्व में लगाए गए प्रतिबंधों और नीतियों के कारण ईरान को हुए वित्तीय नुकसान की भरपाई यानि मुआवजा देने से पूरी तरह इनकार कर दिया है। इसके साथ ही, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में ईरान की ओर से दिए गए 14 सूत्रीय शांति प्रस्ताव को भी खारिज कर दिया है। अमेरिका की एक शर्त यह भी है कि ईरान के परमाणु संयंत्रों में से केवल एक ही चालू स्थिति में रहना चाहिए।
जब्त संपत्ति लौटाने पर भी पाबंदी
इसके अलावा, अमेरिका ने विदेशों में फ्रीज की गई ईरान की संपत्ति में से महज 25 फीसदी हिस्सा भी जारी करने से मना कर दिया है। रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका ने कई मोर्चों पर चल रहे संघर्षों को खत्म करने की शर्त को सीधे तौर पर इन परमाणु वार्ताओं के पूरा होने से जोड़ दिया है। मीडिया रिपोर्ट्स का दावा है कि अगर ईरान इन सभी शर्तों को मान भी लेता है, तब भी अमेरिका और इजरायल की ओर से सैन्य आक्रामकता का खतरा पूरी तरह टलेगा नहीं।
ईरान ने लगाया कूटनीति के दुरुपयोग का आरोप
इस बीच, ईरानी मीडिया ने अमेरिकी रुख की आलोचना करते हुए कहा है कि वॉशिंगटन बिना कोई वास्तविक छूट दिए, ईरान से वे रियायतें हासिल करना चाहता है जो वह युद्ध के मैदान में नहीं पा सका। ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बकाई ने अमेरिका पर कूटनीति का इस्तेमाल अपने सैन्य उद्देश्यों को छिपाने के लिए करने का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि अमेरिका और इजरायल वैश्विक ऊर्जा बाजारों में स्थिरता का झूठा दावा कर रहे हैं, जबकि असल में वे ही इस अस्थिरता के जिम्मेदार हैं। ईरान की सेना ने भी चेतावनी दी है कि यदि दोबारा कोई हवाई हमला हुआ, तो उसका और भी करारा जवाब दिया जाएगा।
मिडिल ईस्ट में गहराया भू-राजनीतिक संकट और व्यापारिक रूट पर खतरा
विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका द्वारा रखी गई इन बेहद सख्त शर्तों के बाद दोनों देशों के बीच कूटनीतिक खाई और चौड़ी हो गई है, जिससे पूरे मिडिल ईस्ट में एक बार फिर युद्ध के बादल मंडराने लगे हैं। दरअसल, इस पूरे विवाद की जड़ें इस साल 28 फरवरी को हुए अमेरिका और इजरायल के संयुक्त सैन्य हमलों से जुड़ी हैं, जिसके जवाब में ईरान ने जवाबी कार्रवाई करते हुए ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ जैसे संवेदनशील समुद्री व्यापारिक मार्ग पर जहाजों की आवाजाही को बाधित कर दिया था। चूंकि वैश्विक तेल आपूर्ति का एक बहुत बड़ा हिस्सा इसी जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है, इसलिए यहां उपजा जरा सा भी तनाव दुनिया भर में कच्चे तेल की कीमतों को आसमान पर पहुंचा सकता है। हालांकि, अप्रैल महीने में पाकिस्तान की मध्यस्थता के बाद दोनों देशों के बीच एक अस्थायी युद्धविराम पर सहमति तो बनी थी, लेकिन स्थाई शांति समझौते को लेकर बातचीत किसी तार्किक नतीजे पर नहीं पहुंच सकी। अब अमेरिका के इस रुख के बाद ईरान के संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाघर कलीबाफ ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि डोनल्ड ट्रंप ने उनके शांति प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया, तो इसका भारी हर्जाना अमेरिकी करदाताओं को भुगतना पड़ सकता है, जो आने वाले दिनों में सीधे सैन्य टकराव का संकेत है।
परमाणु अप्रसार की आड़ में सामरिक दबाव की रणनीति
दूसरी ओर, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिका की इस रणनीति को ईरान के परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह पंगु बनाने की एक सोची-समझी योजना के रूप में देखा जा रहा है। ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बकाई ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ (X) पर पश्चिमी देशों के इस दांव को एक “घिनौनी और पुरानी चाल” करार दिया है, जिसके तहत पहले खुद संकट पैदा किया जाता है और फिर ‘शांति की बहाली’ का मुखौटा पहनकर दूसरे देशों पर मनमाने फैसले थोपे जाते हैं। तेहरान का आरोप है कि अमेरिका परमाणु अप्रसार की आड़ में केवल इजरायल के सामरिक हितों की रक्षा कर रहा है। फिलहाल, इस गतिरोध के बीच ईरान के विदेश मंत्री ने जल्द ही पाकिस्तान सहित पड़ोसी देशों का एक अहम दौरा करने की पुष्टि की है, जिससे साफ है कि ईरान इस अमेरिकी और इजरायली दबाव के खिलाफ एक नया क्षेत्रीय मोर्चा तैयार करने की कोशिश में जुट गया है।


