Patrika Explainer: ईरान में रणनीतिक संकट, चीन का बढ़ता कद; क्या कमजोर पड़ रही है डोनाल्ड ट्रंप की वैश्विक पकड़?

Patrika Explainer: ईरान में रणनीतिक संकट, चीन का बढ़ता कद; क्या कमजोर पड़ रही है डोनाल्ड ट्रंप की वैश्विक पकड़?

Donald Trump China Visit: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात करने वाले हैं। वे स्थानीय समयानुसार मंगलवार को अमेरिका से चीन के लिए रवाना हो गए हैं। ऐसे में ट्रंप की चीन यात्रा उनके ऐतिहासिक कार्यकाल के एक शिखर आयोजन के रूप में देखी जा रही है। एक ओर जहां बीजिंग का भव्य राजकीय स्वागत उन्हें एक सम्मानित वैश्विक राजनेता के रूप में चित्रित करेगा, वहीं दूसरी ओर ईरान के साथ जारी संघर्ष और उनके कुछ विवादास्पद निर्णयों ने उनकी सत्ता और अमेरिकी प्रभुत्व पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

यह शिखर सम्मेलन रिचर्ड निक्सन के दौर के बाद सबसे अनोखा माना जा रहा है। दशकों से अमेरिका-चीन संबंधों का आधार स्थिरता रहा है, लेकिन ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका खुद दुनिया के लिए अस्थिरता का केंद्र बनकर उभरा है। उन्होंने मुक्त व्यापार, पारंपरिक गठबंधन और अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की उन बुनियादों को कमजोर किया है, जिन्होंने कभी वाशिंगटन को सर्वोच्च शक्ति बनाया था। ट्रंप इसे अमेरिकी संप्रभुता और शक्ति का प्रदर्शन मानते हैं, जबकि आलोचकों का कहना है कि यह ‘आत्म-विनाश’ जैसा कदम है, जिसका लाभ चीन उठा सकता है।

ईरान युद्ध का साया और कमजोर होती पकड़

ईरान के साथ जारी संघर्ष स्पष्ट जीत हासिल करने में डोनाल्ड ट्रंप की विफलता ने अमेरिकी ताकत की सीमाओं को उजागर कर दिया है। ईरान द्वारा बातचीत के प्रस्तावों को ठुकराए जाने और युद्ध के कारण वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ते नकारात्मक असर ने ट्रंप की छवि को प्रभावित किया है। ईरान के सर्वोच्च नेता के सलाहकार अली अकबर विलायती ने सीधे शब्दों में ट्रंप को ताना मारते हुए कहा है कि वह ईरान की शांति का लाभ उठाकर बीजिंग में विजयी प्रवेश करने का सपना न देखें।

चीन के लिए अवसर और ट्रंप की मजबूरियां

विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान संकट चीन के लिए एक ‘वाइल्ड कार्ड’ की तरह है। जहां एक ओर चीन को ऊर्जा आपूर्ति बाधित होने की चिंता है, वहीं दूसरी ओर वह ट्रंप की इस कमजोरी का फायदा व्यापार और ताइवान जैसे संवेदनशील मुद्दों पर रियायतें लेने के लिए कर सकता है। पूर्व अधिकारियों का कहना है कि एक प्रमुख पावर समिट में जाने के लिए ये स्थितियां बिल्कुल भी अनुकूल नहीं हैं। चीन को अपनी अर्थव्यवस्था और सैन्य विस्तार के लिए स्थिरता की आवश्यकता है, लेकिन ट्रंप की अनिश्चितता ने दक्षिण-पूर्व एशिया में अमेरिका के सहयोगियों, जैसे थाईलैंड को भी अपनी विदेश नीति पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है।

दो राष्ट्राध्यक्षों का तालमेल और विरोधाभास

दिलचस्प बात यह है कि ट्रंप और शी जिनपिंग में कई समानताएं हैं। दोनों ही अपनी शक्ति के प्रदर्शन में आक्रामक हैं और मौजूदा वैश्विक व्यवस्था के प्रति उदासीन रहते हैं। डोनाल्ड ट्रंप का मानना है कि शी जिनपिंग के साथ उनके बेहतरीन संबंध चीन से रियायतें दिलवा सकते हैं। हालांकि, जानकारों का कहना है कि चीन शायद ही ईरान पर ऐसा कोई दबाव बनाएगा जिससे अमेरिका को सीधा लाभ हो। बीजिंग के लिए अमेरिका का मध्य-पूर्व में उलझे रहना और एशिया से अपना ध्यान हटाना सामरिक रूप से फायदेमंद है।

चीन के समक्ष ट्रंप की परीक्षा

चीन और अमेरिका के शीर्ष स्तर के नेताओं की मुलाकात का परिणाम जो भी हो, लेकिन यह ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के एक विरोधाभास को स्पष्ट करता है। जिस वैश्विक प्रभुत्व को वह बीजिंग में प्रदर्शित करना चाहते हैं, उसी पर उनके अपने फैसलों की छाया पड़ रही है। यह दौरा इस बात की परीक्षा होगा कि क्या ट्रंप की तत्काल निर्णय लेने की शैली चीन जैसे गंभीर प्रतिद्वंद्वी के सामने काम आएगी, या फिर बीजिंग उनकी मजबूरियों का फायदा उठाकर अपनी पकड़ और मजबूत करेगा।

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