मरुस्थल में अंगूर… कल्पना भी नहीं कर सकते। लेकिन डीडवाना-कुचामन जिले के सूपका के धर्मपाल खालिया और चौधरी परिवार ने इसे हकीकत बना दिया है। ये लोग बारिश में बाजरा, मूंग–मोठ आदि की पारंपरिक खेती कर रहे हैं। कारण पानी की कमी। यहां की शुष्क जलवायु में भी धर्मपाल ने अंगूर की खेती के बारे में सोचा। चार साल पहले डीडवाना स्थित नर्सरी से अंगूर के पौधे लेकर आए और घर के परिसर में चार बेल लगाई। तापमान नियंत्रण के लिए जूट की बोरियों से छाया की। अब मेहनत रंग ला रही है। पहली बार फल उत्पादन शुरू हो गया है। धर्मपाल बताते हैं कि पहली बार पचास हजार की इनकम हुई है। यह इनकम बड़ी नहीं है लेकिन अंगूर की पौध पनपाने में सफल होना बड़ी बात है। हमने चार बेल ही लगाई थी। अब बड़ा बगीचा बनाएंगे। अंगूर के साथ साथ कुछ पौधे नींबू, चीकू, अनार व अमरूद के भी लगाए हैं। उनसे भी फल मिलने शुरू हो गए हैं। बागवानी के लिए कुछ जानकारी इंटरनेट से जुटाई। उन्होंने बताया कि अंगूर की बेल 40 डिग्री तक के तापमान में लग जाती है। बड़ी होने पर 45 डिग्री पारा भी सहन कर लेती है। यह शुष्क जलवायु में अच्छी तरह से उग जाती है। सुपका डीडवाना क्षेत्र में पानी की कमी है और खारे पानी की समस्या भी है। ऐसे में अंगूर की बेल एक विकल्प के तौर पर उगाने का प्रयास किया था। अंगूर को ज्यादा पानी की जरूरत नहीं है लेकिन इसके लिए विशेष देखभाल की जरूरत होती है। वे कई प्रगतिशील किसानों से मिले। उनके अनुभवों के आधार पर मिट्टी को विशेष रूप से तैयार किया। बकरी की मींगणी को चार महीने तक खड्ढे में भिगोकर रखा। फिर इसमें मिट्टी मिलाकर पौधे रोपे। आम तौर पर मई से जुलाई के बीच इसकी बेल लगाना उपयुक्त है। बेल को नियमित रूप से पानी और खाद देना जरूरी है लेकिन ज्यादा पानी की जरूरत नहीं है। फल को पकने में लगभग 100-120 दिन लगते हैं। अप्रैल से जून तक इसकी फसल आती है। इस दौरान कीट और रोग से बचाना भी चुनौती होता है। मगर गोबर की खाद या कंपोस्ट के साथ नियमित देखभाल से यह समस्या कम आई। कुछ छिड़काव जरूर करना पड़ा। छोटे स्तर पर देखभाल के लिए अलग से किसी व्यक्ति को रखने की जरूरत नहीं पड़ी। इसकी ऊंचाई दस से पंद्रह फीट तक पहुंचती है। दूसरी फसलों के बीच बेल लगाकर किसान अच्छा फायदा ले सकते हैं। बाजार में इस अंगूर का भाव 60 से 70 रुपए किलो के हिसाब से मिल जाता है। डीडवाना में सब्जी दुकानदार पहले ही ऑर्डर दे देते हैं। एक स्वस्थ बेल से एक क्विंटल तक अंगूर मिल जाते हैं। पूरी तरह पकने पर ही गुच्छे तोड़ते हैं। फल पकाने में किसी तरह की दवाइयों का इस्तेमाल नहीं किया। एक बेल अगले बीस से पच्चीस साल तक फल देती रहेगी।


