पटना- बड़े अस्पतालों में रियल-टाइम बेड सिस्टम उपलब्ध नहीं:मरीजों को ‘गोल्डन आवर’ में नहीं मिलता इलाज, बेटा बोला- 3 दिन से स्ट्रेचर पर पापा; पढ़ें केस स्टडीज

पटना- बड़े अस्पतालों में रियल-टाइम बेड सिस्टम उपलब्ध नहीं:मरीजों को ‘गोल्डन आवर’ में नहीं मिलता इलाज, बेटा बोला- 3 दिन से स्ट्रेचर पर पापा; पढ़ें केस स्टडीज

बिहार में स्वास्थ्य सेवाओं को हाईटेक बनाने के दावों के बावजूद, राजधानी के प्रमुख सरकारी अस्पताल पीएमसीएच, आईजीआईएमएस और एम्स पटना में अब तक रियल-टाइम बेड ट्रैकिंग सिस्टम उपलब्ध नहीं है। इस बुनियादी सुविधा के अभाव का सीधा असर गंभीर मरीजों के इलाज पर पड़ रहा है, जहां हर मिनट की देरी जानलेवा साबित हो सकती है। राजधानी के अस्पतालों में प्रतिदिन हजारों मरीज इलाज के लिए पहुंचते हैं। बेड की उपलब्धता की सटीक जानकारी न होने के कारण मरीजों और उनके परिजनों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है। उन्हें एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल भटकना पड़ता है, जिससे इलाज में काफी देरी होती है। मरीजों को लगाने पड़ते कई अस्पतालों के चक्कर यह स्थिति खासकर आईसीयू और वेंटिलेटर की आवश्यकता वाले मरीजों के लिए ज्यादा गंभीर है। कई बार मरीजों को दो से तीन अस्पतालों के चक्कर लगाने पड़ते हैं, जिससे उनकी हालत लगातार बिगड़ती जाती है और नाजुक समय में उनकी जान पर बन आती है। चिकित्सा आपातकाल में ‘गोल्डन आवर’ यानी शुरुआती एक घंटा सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। इस अवधि में सही इलाज मिलने पर मरीज की जान बचाई जा सकती है। हालांकि, रियल-टाइम बेड जानकारी के अभाव में यह कीमती समय अस्पताल खोजने में ही व्यर्थ हो जाता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि यदि मरीजों को समय पर सही अस्पताल और बेड मिल जाए, तो कई गंभीर मामलों में होने वाली मौतों को टाला जा सकता है। वर्तमान व्यवस्था में यह संभव नहीं हो पा रहा है, जिससे स्वास्थ्य दावों की जमीनी हकीकत उजागर होती है। रेफरल और एम्बुलेंस सिस्टम भी बेअसर बेड की सटीक जानकारी न होने से रेफरल सिस्टम भी लगभग फेल हो चुका है। छोटे अस्पतालों से मरीजों को बड़े अस्पतालों में रेफर तो कर दिया जाता है, लेकिन वहां बेड उपलब्ध है या नहीं इसकी कोई पुष्टि नहीं होती। एम्बुलेंस कर्मियों को भी यह जानकारी नहीं होती कि किस अस्पताल में ICU या वेंटिलेटर उपलब्ध है। ऐसे में वे मरीज को एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल ले जाने को मजबूर होते हैं, जिससे समय और संसाधनों दोनों की बर्बादी होती है। केस स्टडी: जब सूचना के अभाव में जिंदगी दांव पर लग जाती है 1. तीन दिनों से स्ट्रेचर पर मरीज नवादा के 65 वर्षीय नवल किशोर शर्मा, जिन्हें 2012 में राष्ट्रपति सम्मान मिला था, पिछले तीन दिनों से अस्पताल में स्ट्रेचर पर पड़े हैं। लिवर की गंभीर बीमारी से जूझ रहे नवल किशोर को उम्मीद थी कि उन्हें समय पर इलाज मिलेगा, लेकिन बेड के अभाव में उनका इलाज शुरू ही नहीं हो पाया। उनके बेटे त्रिपुरारी शर्मा बताते हैं कि डॉक्टरों ने साफ कह दिया“बेड नहीं है।” 2. 350 किलोमीटर का सफर, फिर भी इलाज नहीं झारखंड के गोड्डा जिले से अमित अपनी मां को लेकर 350 किलोमीटर दूर पटना पहुंचे। उनकी मां कैंसर से पीड़ित हैं और ऑक्सीजन सपोर्ट पर थीं। लेकिन अस्पताल पहुंचने के बाद उन्हें 4 घंटे तक एम्बुलेंस में ही इंतजार करना पड़ा, क्योंकि कोई बेड उपलब्ध नहीं था। आखिरकार उन्हें वापस लौटना पड़ा। 3. ‘पैरवी’ के बिना नहीं मिलता बेड? बेगूसराय के संजय पोद्दार का आरोप है कि अस्पतालों में बिना ‘पैरवी’ के बेड मिलना मुश्किल है। उनकी मां हार्ट पेशेंट हैं, लेकिन उन्हें भी इलाज के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। 4. 18 घंटे से इंतजार, फिर भी इलाज नहीं किशोरी लाल शाह पिछले 18 घंटों से स्ट्रेचर पर लेटे हैं। पैरालिसिस के शिकार इस मरीज को अब तक न तो बेड मिला है और न ही किसी डॉक्टर ने ठीक से जांच की है। परिवार के लोग सिर्फ इस उम्मीद में बैठे हैं कि जल्द कोई बेड खाली होगा। कोविड काल में शुरू हुई पहल, टिकी नहीं व्यवस्था बिहार में रियल-टाइम बेड ट्रैकिंग सिस्टम की शुरुआत कोविड-19 महामारी के दौरान 2020 में हुई थी। उस समय हेल्पलाइन और कंट्रोल रूम के जरिए बेड की जानकारी जुटाई जाती थी। 2021 में ऑनलाइन डैशबोर्ड लॉन्च करने का दावा भी किया गया, जिसमें ICU और वेंटिलेटर बेड की जानकारी देने की योजना थी। हालांकि, यह सिस्टम पूरी तरह अस्पतालों के मैनुअल अपडेट पर निर्भर था। कई अस्पताल समय पर डेटा अपडेट नहीं करते थे, जिससे डैशबोर्ड पर दिख रही जानकारी और वास्तविक स्थिति में बड़ा अंतर होता था। परिणामस्वरूप, यह व्यवस्था भरोसेमंद नहीं बन सकी। कोविड के बाद 2022–23 में यह सिस्टम लगभग ठप हो गया और अस्पताल फिर पुराने तरीके पर लौट आए। 2024–25 में डिजिटल हेल्थ सिस्टम को लेकर नई घोषणाएं जरूर हुईं, लेकिन रियल-टाइम बेड ट्रैकिंग अब भी लागू नहीं हो सकी। IGIMS का पक्ष आंतरिक सिस्टम है, लेकिन राज्य स्तर पर कमी IGIMS के प्रवक्ता-सह-उप निदेशक का कहना है कि संस्थान में बेड मैनेजमेंट के लिए आंतरिक डिजिटल सिस्टम मौजूद है। ICU और अन्य क्रिटिकल बेड की निगरानी लगातार की जाती है। हालांकि, उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि राज्य स्तर पर एकीकृत रियल-टाइम डैशबोर्ड नहीं होने के कारण अस्पतालों के बीच समन्वय में दिक्कत आती है। यदि सभी अस्पताल एक प्लेटफॉर्म से जुड़ जाएं, तो मरीजों को काफी राहत मिल सकती है। विशेषज्ञों की राय- एकीकृत सिस्टम ही समाधान स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि समस्या का समाधान केवल एक केंद्रीकृत, रियल-टाइम बेड ट्रैकिंग सिस्टम से ही संभव है। इस सिस्टम के जरिए:-
* सभी सरकारी और निजी अस्पतालों को जोड़ा जा सकता है
* ICU, वेंटिलेटर और जनरल बेड की लाइव जानकारी मिल सकती है
* एम्बुलेंस और रेफरल सिस्टम को बेहतर बनाया जा सकता है
* मरीजों को सही समय पर सही अस्पताल मिल सकता है विशेषज्ञों के अनुसार, यह तकनीक कोई नई या जटिल नहीं है—कई राज्यों में यह सफलतापूर्वक लागू भी है। जरूरत सिर्फ इसे गंभीरता से लागू करने और नियमित मॉनिटरिंग की है। सवालों के घेरे में ‘हाईटेक’ दावे सरकार की ओर से स्वास्थ्य सेवाओं के डिजिटलीकरण को लेकर बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर रियल-टाइम बेड मॉनिटरिंग जैसी बुनियादी सुविधा का अभाव इन दावों पर सवाल खड़े करता है। जब राज्य के सबसे बड़े अस्पतालों में ही यह व्यवस्था लागू नहीं हो पाई है, तो छोटे जिलों और ग्रामीण क्षेत्रों की स्थिति का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। क्या आगे बदलेगी तस्वीर? बिहार में स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए कई योजनाएं कागजों पर मौजूद हैं, लेकिन उनका प्रभाव तभी दिखेगा जब उन्हें सही तरीके से लागू किया जाए। रियल-टाइम बेड ट्रैकिंग सिस्टम केवल एक तकनीकी सुविधा नहीं, बल्कि जीवन बचाने वाला उपकरण बन सकता है। जब तक मरीजों को अस्पतालों के चक्कर लगाने पड़ते रहेंगे और ‘गोल्डन आवर’ बेड की तलाश में गुजरता रहेगा, तब तक स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल उठते रहेंगे। पटना के बड़े अस्पतालों की यह स्थिति सिर्फ एक शहर की समस्या नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की खामी को उजागर करती है। अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो ऐसे कई मामले सामने आते रहेंगे जहां इलाज की कमी नहीं, बल्कि व्यवस्था की कमी जान ले लेती है। बिहार में स्वास्थ्य सेवाओं को हाईटेक बनाने के दावों के बावजूद, राजधानी के प्रमुख सरकारी अस्पताल पीएमसीएच, आईजीआईएमएस और एम्स पटना में अब तक रियल-टाइम बेड ट्रैकिंग सिस्टम उपलब्ध नहीं है। इस बुनियादी सुविधा के अभाव का सीधा असर गंभीर मरीजों के इलाज पर पड़ रहा है, जहां हर मिनट की देरी जानलेवा साबित हो सकती है। राजधानी के अस्पतालों में प्रतिदिन हजारों मरीज इलाज के लिए पहुंचते हैं। बेड की उपलब्धता की सटीक जानकारी न होने के कारण मरीजों और उनके परिजनों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है। उन्हें एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल भटकना पड़ता है, जिससे इलाज में काफी देरी होती है। मरीजों को लगाने पड़ते कई अस्पतालों के चक्कर यह स्थिति खासकर आईसीयू और वेंटिलेटर की आवश्यकता वाले मरीजों के लिए ज्यादा गंभीर है। कई बार मरीजों को दो से तीन अस्पतालों के चक्कर लगाने पड़ते हैं, जिससे उनकी हालत लगातार बिगड़ती जाती है और नाजुक समय में उनकी जान पर बन आती है। चिकित्सा आपातकाल में ‘गोल्डन आवर’ यानी शुरुआती एक घंटा सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। इस अवधि में सही इलाज मिलने पर मरीज की जान बचाई जा सकती है। हालांकि, रियल-टाइम बेड जानकारी के अभाव में यह कीमती समय अस्पताल खोजने में ही व्यर्थ हो जाता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि यदि मरीजों को समय पर सही अस्पताल और बेड मिल जाए, तो कई गंभीर मामलों में होने वाली मौतों को टाला जा सकता है। वर्तमान व्यवस्था में यह संभव नहीं हो पा रहा है, जिससे स्वास्थ्य दावों की जमीनी हकीकत उजागर होती है। रेफरल और एम्बुलेंस सिस्टम भी बेअसर बेड की सटीक जानकारी न होने से रेफरल सिस्टम भी लगभग फेल हो चुका है। छोटे अस्पतालों से मरीजों को बड़े अस्पतालों में रेफर तो कर दिया जाता है, लेकिन वहां बेड उपलब्ध है या नहीं इसकी कोई पुष्टि नहीं होती। एम्बुलेंस कर्मियों को भी यह जानकारी नहीं होती कि किस अस्पताल में ICU या वेंटिलेटर उपलब्ध है। ऐसे में वे मरीज को एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल ले जाने को मजबूर होते हैं, जिससे समय और संसाधनों दोनों की बर्बादी होती है। केस स्टडी: जब सूचना के अभाव में जिंदगी दांव पर लग जाती है 1. तीन दिनों से स्ट्रेचर पर मरीज नवादा के 65 वर्षीय नवल किशोर शर्मा, जिन्हें 2012 में राष्ट्रपति सम्मान मिला था, पिछले तीन दिनों से अस्पताल में स्ट्रेचर पर पड़े हैं। लिवर की गंभीर बीमारी से जूझ रहे नवल किशोर को उम्मीद थी कि उन्हें समय पर इलाज मिलेगा, लेकिन बेड के अभाव में उनका इलाज शुरू ही नहीं हो पाया। उनके बेटे त्रिपुरारी शर्मा बताते हैं कि डॉक्टरों ने साफ कह दिया“बेड नहीं है।” 2. 350 किलोमीटर का सफर, फिर भी इलाज नहीं झारखंड के गोड्डा जिले से अमित अपनी मां को लेकर 350 किलोमीटर दूर पटना पहुंचे। उनकी मां कैंसर से पीड़ित हैं और ऑक्सीजन सपोर्ट पर थीं। लेकिन अस्पताल पहुंचने के बाद उन्हें 4 घंटे तक एम्बुलेंस में ही इंतजार करना पड़ा, क्योंकि कोई बेड उपलब्ध नहीं था। आखिरकार उन्हें वापस लौटना पड़ा। 3. ‘पैरवी’ के बिना नहीं मिलता बेड? बेगूसराय के संजय पोद्दार का आरोप है कि अस्पतालों में बिना ‘पैरवी’ के बेड मिलना मुश्किल है। उनकी मां हार्ट पेशेंट हैं, लेकिन उन्हें भी इलाज के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। 4. 18 घंटे से इंतजार, फिर भी इलाज नहीं किशोरी लाल शाह पिछले 18 घंटों से स्ट्रेचर पर लेटे हैं। पैरालिसिस के शिकार इस मरीज को अब तक न तो बेड मिला है और न ही किसी डॉक्टर ने ठीक से जांच की है। परिवार के लोग सिर्फ इस उम्मीद में बैठे हैं कि जल्द कोई बेड खाली होगा। कोविड काल में शुरू हुई पहल, टिकी नहीं व्यवस्था बिहार में रियल-टाइम बेड ट्रैकिंग सिस्टम की शुरुआत कोविड-19 महामारी के दौरान 2020 में हुई थी। उस समय हेल्पलाइन और कंट्रोल रूम के जरिए बेड की जानकारी जुटाई जाती थी। 2021 में ऑनलाइन डैशबोर्ड लॉन्च करने का दावा भी किया गया, जिसमें ICU और वेंटिलेटर बेड की जानकारी देने की योजना थी। हालांकि, यह सिस्टम पूरी तरह अस्पतालों के मैनुअल अपडेट पर निर्भर था। कई अस्पताल समय पर डेटा अपडेट नहीं करते थे, जिससे डैशबोर्ड पर दिख रही जानकारी और वास्तविक स्थिति में बड़ा अंतर होता था। परिणामस्वरूप, यह व्यवस्था भरोसेमंद नहीं बन सकी। कोविड के बाद 2022–23 में यह सिस्टम लगभग ठप हो गया और अस्पताल फिर पुराने तरीके पर लौट आए। 2024–25 में डिजिटल हेल्थ सिस्टम को लेकर नई घोषणाएं जरूर हुईं, लेकिन रियल-टाइम बेड ट्रैकिंग अब भी लागू नहीं हो सकी। IGIMS का पक्ष आंतरिक सिस्टम है, लेकिन राज्य स्तर पर कमी IGIMS के प्रवक्ता-सह-उप निदेशक का कहना है कि संस्थान में बेड मैनेजमेंट के लिए आंतरिक डिजिटल सिस्टम मौजूद है। ICU और अन्य क्रिटिकल बेड की निगरानी लगातार की जाती है। हालांकि, उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि राज्य स्तर पर एकीकृत रियल-टाइम डैशबोर्ड नहीं होने के कारण अस्पतालों के बीच समन्वय में दिक्कत आती है। यदि सभी अस्पताल एक प्लेटफॉर्म से जुड़ जाएं, तो मरीजों को काफी राहत मिल सकती है। विशेषज्ञों की राय- एकीकृत सिस्टम ही समाधान स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि समस्या का समाधान केवल एक केंद्रीकृत, रियल-टाइम बेड ट्रैकिंग सिस्टम से ही संभव है। इस सिस्टम के जरिए:-
* सभी सरकारी और निजी अस्पतालों को जोड़ा जा सकता है
* ICU, वेंटिलेटर और जनरल बेड की लाइव जानकारी मिल सकती है
* एम्बुलेंस और रेफरल सिस्टम को बेहतर बनाया जा सकता है
* मरीजों को सही समय पर सही अस्पताल मिल सकता है विशेषज्ञों के अनुसार, यह तकनीक कोई नई या जटिल नहीं है—कई राज्यों में यह सफलतापूर्वक लागू भी है। जरूरत सिर्फ इसे गंभीरता से लागू करने और नियमित मॉनिटरिंग की है। सवालों के घेरे में ‘हाईटेक’ दावे सरकार की ओर से स्वास्थ्य सेवाओं के डिजिटलीकरण को लेकर बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर रियल-टाइम बेड मॉनिटरिंग जैसी बुनियादी सुविधा का अभाव इन दावों पर सवाल खड़े करता है। जब राज्य के सबसे बड़े अस्पतालों में ही यह व्यवस्था लागू नहीं हो पाई है, तो छोटे जिलों और ग्रामीण क्षेत्रों की स्थिति का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। क्या आगे बदलेगी तस्वीर? बिहार में स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए कई योजनाएं कागजों पर मौजूद हैं, लेकिन उनका प्रभाव तभी दिखेगा जब उन्हें सही तरीके से लागू किया जाए। रियल-टाइम बेड ट्रैकिंग सिस्टम केवल एक तकनीकी सुविधा नहीं, बल्कि जीवन बचाने वाला उपकरण बन सकता है। जब तक मरीजों को अस्पतालों के चक्कर लगाने पड़ते रहेंगे और ‘गोल्डन आवर’ बेड की तलाश में गुजरता रहेगा, तब तक स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल उठते रहेंगे। पटना के बड़े अस्पतालों की यह स्थिति सिर्फ एक शहर की समस्या नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की खामी को उजागर करती है। अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो ऐसे कई मामले सामने आते रहेंगे जहां इलाज की कमी नहीं, बल्कि व्यवस्था की कमी जान ले लेती है।  

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