मुथु राज से रिथिका बनने तक का संघर्ष… भावुक कर देगी भारत की पहली ट्रांसजेंडर अंपायर की कहानी

मुथु राज से रिथिका बनने तक का संघर्ष… भावुक कर देगी भारत की पहली ट्रांसजेंडर अंपायर की कहानी

साल 2019 में मोहाली में एक आईपीएल मैच देखते हुए रिथिका का जीवन बदल गया। उस समय वे 25 साल की थीं और उनका नाम मुथु राज था। अंपायरों को मैदान पर काम करते देखकर उनके मन में खयाल आया कि उन्हें भी यही करना है। 

Rithika, Tamil Nadu’s first transgender umpire: पिछले साल सितंबर में एक प्राइमरी एजुकेशनल संस्थान के गेट पर एक सिक्योरिटी गार्ड ने रिथिका श्री को अंदर नहीं जाने दिया। वे वहां क्रिकेट मैच की अंपायरिंग करने आई थीं। अपना जेंडर ट्रांसफॉर्मेशन पूरा करने के बाद यह रिथिका का पहला आधिकारिक मैच था।

रिथिका बताती हैं, “सिक्योरिटी गार्ड ने मुझे गेट पर ही रोक लिया। पहले तो उन्होंने मुझे भगा दिया। लेकिन उस दिन मेरे अंदर कुछ जाग उठा। मैंने उनसे साफ कहा ‘मैं मैच में अंपायरिंग करने आई हूं।’ किसी तरह मैं अंदर घुस तो गई, लेकिन ग्राउंड तक पहुंचते-पहुंचते दूसरे सिक्योरिटी गार्ड आ गए और फिर रोक लिया।” कुछ फोन कॉल्स के बाद आखिरकार ऊपर से हरी झंडी मिली। लेकिन तब तक रिथिका के मन में तूफान मच चुका था।

वे आगे कहती हैं, “उस सुबह मैं अपने आप को रोक नहीं पाई। मेरे लिए ये बहुत बड़ा मोमेंट था। भीख मांगने या सेक्सुअल अब्यूज झेलने की जगह, मैं तो बस एक सम्मानजनक जिंदगी शुरू करना चाहती थी। लेकिन फिर वही रिजेक्शन मिला। मैंने उस दिन खुलकर बोला, आखिर ट्रांसजेंडर इंसान सामान्य जिंदगी क्यों नहीं जी सकता? उसे बराबरी का हक क्यों नहीं मिलता? जो अपमान हुआ, वह बर्दाश्त नहीं हो रहा था।”

आखिरकार रिथिका गेट पार कर मैदान तक पहुंची और उन्होंने उस मैच में अंपायरिंग की। 31 वर्षीय रिथिका श्री तमिलनाडु की पहली रजिस्टर्ड ट्रांसजेंडर क्रिकेट अंपायर हैं।

कहां से शुरू हुआ अंपायर बनाने का सपना ?

साल 2019 में मोहाली में एक आईपीएल मैच देखते हुए रिथिका का जीवन बदल गया। उस समय वे 25 साल की थीं और उनका नाम मुथु राज था। अंपायरों को मैदान पर काम करते देखकर उनके मन में खयाल आया कि उन्हें भी यही करना है। 2020 में लॉकडाउन की वजह से उनकी आईटी जॉब चली गई। वे सलेम चली गईं। उस समय वे पुरुष रूप में ही जी रही थीं। सलेम डिस्ट्रिक्ट क्रिकेट एसोसिएशन (SDCA) ने उन्हें अच्छा सहयोग दिया। सीनियर अंपायर शांतिपूषण और पार्थसारथी ने न सिर्फ उन्हें अंपायरिंग की ट्रेनिंग दी, बल्कि वे पहले लोग थे जिनसे रिथिका ने अपने अंदर चल रहे जेंडर बदलाव के बारे में खुलकर बात की।

उन्होंने सलेम और नामक्कल में 300 से अधिक मैचों में अंपायरिंग की। हर मैच उनके रिकॉर्ड में दर्ज हुआ। इसके बाद उन्होंने जेंडर ट्रांसफॉर्मेशन का इलाज शुरू किया और एक साल तक मैचों से दूर रहीं। जब वे वापस लौटीं तो नई समस्या सामने आई। मैच ऑफिशियल्स में केवल पुरुष या महिला ही शामिल किए जाते थे। ‘थर्ड जेंडर’ का कोई प्रावधान नहीं था। लेकिन कोयंबटूर डिस्ट्रिक्ट क्रिकेट एसोसिएशन (CDCA) ने उनके 300 से ज्यादा मैचों के अनुभव को देखा और फैसला किया कि इतना बड़ा रिकॉर्ड किसी को भी बाहर नहीं रख सकता। उन्होंने बिना किसी हिचक के रिथिका को शामिल कर लिया।

पहले मैच से पहले रिथिका का पैर फ्रैक्चर हो गया था, फिर भी उन्होंने फ्रेंडली मैचों में खड़े होकर अन्य अंपायरों और खिलाड़ियों का विश्वास जीता। उन्होंने पुरुष अंपायरों और खिलाड़ियों के साथ आइस-ब्रेकिंग सेशन्स भी किए।

कोयंबटूर का हादसा और बदलाव

कोयंबटूर में गेट वाली घटना के बाद CDCA ने तुरंत एक्शन लिया। उन्होंने क्लब मालिकों, अंपायरों, खिलाड़ियों और वेन्यू ओनर्स के लिए जेंडर सेंसिटिविटी सेशन कराए। जिस संस्थान ने उन्हें रोकने की कोशिश की थी, अब वहां उनके मैच नहीं कराए जाते। अब हर लीग मैच से पहले CDCA की ओर से वेन्यू को स्पष्ट संदेश भेजा जाता है, “रिथिका श्री अंपायरिंग करने आ रही हैं। उनकी सुरक्षा और सम्मान का पूरा ध्यान रखा जाए।”

रिथिका कहती हैं, “उस घटना के बाद CDCA को समझ आ गया कि यह समस्या कहीं और भी दोहराई जा सकती है। उन्होंने टीम ऑफिशियल्स और खिलाड़ियों के साथ अलग-अलग बैठकें कीं और साफ कहा कि रिथिका को बिल्कुल बराबरी का दर्जा मिलना चाहिए।”

मैदान पर मिला सम्मान

मैदान पर रिस्पॉन्स उनकी उम्मीद से कहीं बेहतर रहा। वे बताती हैं, “आप यकीन नहीं करेंगे, किसी ने मेरे पीछे एक भी बुरा शब्द नहीं कहा। खिलाड़ी मुझे ‘मैडम’ कहकर बुलाते हैं। मुझे लगता है कि मैदान पर सही और निष्पक्ष फैसले लेने की वजह से मुझे यह सम्मान मिला है। वे मुझे ट्रांसजेंडर के रूप में नहीं, बल्कि एक अच्छे अंपायर के रूप में देखते हैं। अब तो जान-पहचान बढ़ने के साथ बातचीत भी काफी होने लगी है। टीम में 15-20 खिलाड़ियों में से शायद एक-दो हाथ न मिलाएं, लेकिन वो भी ठीक है।”

अब अगला कदम

अगले महीने रिथिका तमिलनाडु क्रिकेट एसोसिएशन (TNCA) का अंपायर एग्जाम देने जा रही हैं। जब फॉर्म आया तो उसमें थर्ड जेंडर का विकल्प नहीं था। CDCA के आर. चंद्रमौली ने रिथिका के समर्थन में TNCA से बात की। शुरुआत में कहा गया कि वे फीमेल कैटेगरी में एग्जाम दे सकती हैं, लेकिन जब बात उठाई गई तो TNCA ने फॉर्म बदल दिया और थर्ड जेंडर का ऑप्शन भी जोड़ दिया। रिथिका के लिए यह एक बड़ी जीत थी। वे कहती हैं, “यह पहला ऐसा मौका है और मुझे गर्व है कि मैंने इतिहास रचा।”

गौरतलब है कि वर्ष 2008 में तमिलनाडु देश का पहला राज्य था जिसने थर्ड जेंडर को वेलफेयर स्कीम्स के लिए औपचारिक मान्यता दी थी। अब TNCA भी CDCA के नक्शेकदम पर चलते हुए क्रिकेट क्षेत्र में यही प्रयास कर रहा है, भले ही BCCI की अभी कोई आधिकारिक नीति न हो। TNCA के सेक्रेटरी भगवंदास राव ने कहा, “BCCI की कोई पॉलिसी न होने के बावजूद TNCA रिथिका को पूरा समर्थन दे सकता है। अगर वे एग्जाम क्लियर कर लेती हैं, तो बाकी अंपायरों की तरह उन्हें भी हर तरह का सहयोग मिलेगा।”

रिथिका का कहना है, “मोहाली में जो सपना शुरू हुआ था, वह अब धीरे-धीरे हकीकत बन रहा है। अगले महीने होने वाला एग्जाम मेरे लिए सिर्फ एक परीक्षा नहीं, बल्कि एक और बड़ा कदम है।”

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