दुनिया के सबसे जरूरी खनिजों जैसे कि कॉपर, कोबाल्ट, लिथियम और रेयर अर्थ एलिमेंट्स पर अब अमेरिका और चीन के बीच खुली जंग छिड़ गई है। अफ्रीका इन खनिजों का बड़ा भंडार है।
चीन ने यहां पहले से ही मजबूत पकड़ बना रखी है। लेकिन अब अमेरिका पीछे नहीं रहना चाहता। ट्रंप प्रशासन अफ्रीका में सड़कें, रेलवे और बंदरगाह बनाने पर भारी निवेश कर रहा है ताकि चीन की दबदबे वाली सप्लाई चेन को तोड़ा जा सके।
चीन का अफ्रीका पर कब्जा
चीन ने अफ्रीका के खनिजों पर सिर्फ खदानें खोदकर ही नहीं, बल्कि पूरी चेन कंट्रोल कर ली है। खनन से लेकर प्रोसेसिंग, ट्रांसपोर्ट और एक्सपोर्ट तक सब कुछ चीनी कंपनियों के हाथ में है।
अफ्रीकी देशों की कच्ची खदानें चीन भेजी जाती हैं, जहां प्रोसेसिंग होकर बैटरी और इलेक्ट्रिक कारों के लिए तैयार माल बनता है। दुनिया भर में कोबाल्ट की रिफाइनिंग का 80 प्रतिशत हिस्सा चीन के पास है।
कॉपर स्मेल्टिंग में 40 प्रतिशत और लिथियम प्रोसेसिंग में 60 प्रतिशत हिस्सा भी चीन संभालता है। अफ्रीका से निकलने वाला कच्चा माल ज्यादातर चीन की फैक्टरियों में जाता है, जहां उसकी असली कीमत बनती है। खदान मालिकों को सिर्फ 5-10 प्रतिशत ही मिलता है, बाकी 40-60 प्रतिशत वैल्यू चीन में कैद हो जाती है।
अमेरिका की नई रणनीति
अमेरिका अब इस खेल को बदलने की कोशिश कर रहा है। वो अफ्रीका में इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स पर जोर दे रहा है। खासतौर पर ट्रांसपोर्टेशन कॉरिडोर बना रहा है ताकि अफ्रीकी खनिज सीधे अमेरिका या उसके दोस्त देशों तक पहुंच सकें, बिना चीन के रास्ते के।
सबसे बड़ा उदाहरण है लोबिटो कॉरिडोर। अंगोला के लोबिटो बंदरगाह से शुरू होकर डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो (DRC) और जाम्बिया के तांबे वाले इलाकों तक यह रेलवे और बंदरगाह का प्रोजेक्ट है।
इसका लक्ष्य सालाना 46 लाख टन माल ढोने की क्षमता है। इस प्रोजेक्ट से ट्रांसपोर्ट का समय 29 दिन कम हो जाएगा और खर्च भी 30 प्रतिशत तक घट जाएगा।
अमेरिका की डेवलपमेंट फाइनेंस कॉरपोरेशन (DFC) इस प्रोजेक्ट में लोन और गारंटी दे रही है। अमेरिका चाहता है कि अफ्रीकी देश अब चीन पर निर्भर न रहें और वैकल्पिक रास्ते चुनें। हाल ही में अमेरिका ने कई देशों के साथ क्रिटिकल मिनरल्स पर नए समझौते भी किए हैं।
अफ्रीका के लिए फायदा या नुकसान?
दोनों देश अफ्रीका के खनिजों के लिए होड़ कर रहे हैं, लेकिन अफ्रीकी देशों को असली फायदा तभी होगा जब वे अपनी जमीन पर ही प्रोसेसिंग यूनिट लगाएं। अभी तो ज्यादातर कच्चा माल बाहर जाता है। अमेरिका का कहना है कि उसका तरीका ज्यादा पारदर्शी और फेयर है, जबकि चीन की फंडिंग से देशों पर कर्ज का बोझ बढ़ जाता है।
ट्रेड वॉर के बाद यह दौड़ और तेज हो गई है। अमेरिका अब अफ्रीका को सिर्फ कच्चा माल सप्लायर नहीं, बल्कि स्ट्रैटेजिक पार्टनर बनाना चाहता है। लोबिटो कॉरिडोर जैसी परियोजनाएं इसी दिशा में पहला बड़ा कदम हैं।
अगर यह रणनीति सफल हुई तो अफ्रीका के खनिजों पर चीन का एकाधिकार टूट सकता है और दुनिया की बैटरी, इलेक्ट्रिक वाहन और टेक्नोलॉजी इंडस्ट्री में नई संभावनाएं खुलेंगी। लेकिन अफ्रीकी देशों को सावधानी बरतनी होगी ताकि वे किसी एक देश के जाल में न फंस जाएं।


