विश्व धरोहर दिवस पर आज बोधगया स्थित महाबोधि मंदिर एक बार फिर दुनिया के सामने आस्था, विरासत और आध्यात्म का मजबूत प्रतीक बनकर उभरा है। 18 अप्रैल को मनाए जा रहे इस खास दिन पर मंदिर परिसर में देश-विदेश से आए श्रद्धालुओं की मौजूदगी ने इसकी वैश्विक पहचान को और भी पुख्ता कर दिया। साल 2002 में यूनेस्को की ओर से विश्व धरोहर का दर्जा मिलने के बाद महाबोधि मंदिर की अहमियत और बढ़ गई। यही वह पवित्र स्थान है, जहां करीब 2500 साल पहले गौतम बुद्ध ने बोधि वृक्ष के नीचे ज्ञान हासिल किया था। आज भी यह स्थल न सिर्फ बौद्ध धर्मावलंबियों, बल्कि हर वर्ग और देश के लोगों के लिए आस्था का केंद्र बना हुआ है। मंदिर की वास्तुकला भी कम आकर्षक नहीं है। ऊंचा पिरामिडनुमा शिखर और दीवारों पर उकेरी गई बारीक नक्काशी पुराने भारतीय ईंट निर्माण कला की बेहतरीन झलक पेश करती है। यही वजह है कि इतिहास और स्थापत्य में रुचि रखने वाले लोग भी यहां खींचे चले आते हैं। धार्मिक नजरिए से देखें तो महाबोधि मंदिर आज भी एक जीवंत आध्यात्मिक केंद्र है। यहां रोजाना ध्यान, साधना और पूजा का सिलसिला चलता है। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से आने वाले श्रद्धालु शांति और आत्मिक संतुलन की तलाश में यहां पहुंचते हैं। हमारी सांस्कृतिक धरोहरों को बचाना सभी की जिम्मेदारी बीटीएमसी की सचिव डॉ महाश्वेता महारथी ने कहा कि विश्व धरोहर दिवस के मौके पर यह स्थल एक बार फिर यह याद दिलाता है कि हमारी सांस्कृतिक धरोहरों को बचाना और सहेजना हम सभी की जिम्मेदारी है। महाबोधि मंदिर सिर्फ अतीत की निशानी नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए भी प्रेरणा का स्रोत है। उन्होंने कहा कि विरासत किसी एक नहीं होती है बल्कि सांझी होती है। लिहाजा इसकी पवित्रता, भव्यता और आध्यत्मिकता को बनाए रखने की जिम्मेदारी सभी की है। स्थानीय प्रशासन और मंदिर प्रबंधन ने भी इस दिन को खास बनाने के लिए साफ-सफाई और सुरक्षा के इंतजाम पुख्ता किए हैं। विश्व धरोहर दिवस पर आज बोधगया स्थित महाबोधि मंदिर एक बार फिर दुनिया के सामने आस्था, विरासत और आध्यात्म का मजबूत प्रतीक बनकर उभरा है। 18 अप्रैल को मनाए जा रहे इस खास दिन पर मंदिर परिसर में देश-विदेश से आए श्रद्धालुओं की मौजूदगी ने इसकी वैश्विक पहचान को और भी पुख्ता कर दिया। साल 2002 में यूनेस्को की ओर से विश्व धरोहर का दर्जा मिलने के बाद महाबोधि मंदिर की अहमियत और बढ़ गई। यही वह पवित्र स्थान है, जहां करीब 2500 साल पहले गौतम बुद्ध ने बोधि वृक्ष के नीचे ज्ञान हासिल किया था। आज भी यह स्थल न सिर्फ बौद्ध धर्मावलंबियों, बल्कि हर वर्ग और देश के लोगों के लिए आस्था का केंद्र बना हुआ है। मंदिर की वास्तुकला भी कम आकर्षक नहीं है। ऊंचा पिरामिडनुमा शिखर और दीवारों पर उकेरी गई बारीक नक्काशी पुराने भारतीय ईंट निर्माण कला की बेहतरीन झलक पेश करती है। यही वजह है कि इतिहास और स्थापत्य में रुचि रखने वाले लोग भी यहां खींचे चले आते हैं। धार्मिक नजरिए से देखें तो महाबोधि मंदिर आज भी एक जीवंत आध्यात्मिक केंद्र है। यहां रोजाना ध्यान, साधना और पूजा का सिलसिला चलता है। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से आने वाले श्रद्धालु शांति और आत्मिक संतुलन की तलाश में यहां पहुंचते हैं। हमारी सांस्कृतिक धरोहरों को बचाना सभी की जिम्मेदारी बीटीएमसी की सचिव डॉ महाश्वेता महारथी ने कहा कि विश्व धरोहर दिवस के मौके पर यह स्थल एक बार फिर यह याद दिलाता है कि हमारी सांस्कृतिक धरोहरों को बचाना और सहेजना हम सभी की जिम्मेदारी है। महाबोधि मंदिर सिर्फ अतीत की निशानी नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए भी प्रेरणा का स्रोत है। उन्होंने कहा कि विरासत किसी एक नहीं होती है बल्कि सांझी होती है। लिहाजा इसकी पवित्रता, भव्यता और आध्यत्मिकता को बनाए रखने की जिम्मेदारी सभी की है। स्थानीय प्रशासन और मंदिर प्रबंधन ने भी इस दिन को खास बनाने के लिए साफ-सफाई और सुरक्षा के इंतजाम पुख्ता किए हैं।


