बिहार का मुजफ्फरपुर, जो अपनी ‘शाही लीची’ के लिए देश-विदेश में प्रसिद्ध है, अब दूसरे राज्यों के किसानों के लिए भी सीखने का केंद्र बनता जा रहा है। खेती में अग्रणी माने जाने वाले पंजाब से किसान मुजफ्फरपुर पहुंच रहे हैं। पठानकोट से 22 किसानों का दल इन दिनों मुजफ्फरपुर पहुंचा है। इन किसानों का उद्देश्य यहां की लीची उत्पादन तकनीक को समझना और अपने राज्य में इसे अपनाकर उत्पादन बढ़ाना है। किसानों का यह दल राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र में वैज्ञानिकों से प्रशिक्षण ले रहा है। यहां उन्हें लीची की उन्नत किस्म, पौध प्रबंधन, रोग नियंत्रण, सिंचाई तकनीक और उत्पादन बढ़ाने के आधुनिक तरीकों की जानकारी दी जा रही है। इसके अलावा किसानों ने मुजफ्फरपुर के झपहां स्थित प्रगतिशील किसान भोलानाथ झा के फार्म का भी दौरा किया, जहां उन्होंने हाई डेंसिटी प्लांटेशन को करीब से देखा। पंजाब के किसान बोले- यहां से सीखकर लाखों कमा रहे पंजाब से आए किसान यशपाल सिंह, अजीत सिंह, हड़पाल सिंह और भूपेंद्र सिंह ने बताया कि पहले भी मुजफ्फरपुर की तकनीक अपनाकर अच्छा मुनाफा कमा चुके हैं, लेकिन यहां आकर उन्हें और नई चीजें सीखने को मिल रही हैं। यहां 10×15 फीट की दूरी पर लगाए गए लीची के पेड़ों में कम ऊंचाई पर ही काफी फल लग रहा है। यह हमारे लिए नया और बेहद उपयोगी मॉडल है। इससे कम जगह में ज्यादा उत्पादन संभव है। पंजाब में शाही लीची बन जाता है देहरादूनी लीची किसानों ने यह भी बताया कि पंजाब में मुजफ्फरपुर की शाही लीची को ‘देहरादून लीची’ के नाम से बेचा जाता है और वहां इसकी मांग काफी अधिक है। सीमित उत्पादन के कारण बाजार में इसकी कीमत भी अच्छी मिलती है, जिससे उन्हें बेहतर मुनाफा होता है। उन्होंने कहा कि अगर मुजफ्फरपुर की तकनीक को पूरी तरह अपनाया जाए, तो पंजाब में भी लीची उत्पादन को बड़े स्तर पर बढ़ाया जा सकता है। कृषि वैज्ञानिकों ने कहा- यहां की तकनीक अपनाना बेहद जरूरी पंजाब कृषि विश्वविद्यालय कृषि विज्ञान केंद्र, पठानकोट से इस प्रशिक्षण में शामिल फल वैज्ञानिक डॉ. मनु त्यागी ने कहा कि मुजफ्फरपुर की लीची विश्व स्तर पर अपनी अलग पहचान रखती है। बिहार, खासकर मुजफ्फरपुर, लीची उत्पादन में नंबर वन है। पंजाब में इसकी खेती बाद में शुरू हुई है, इसलिए यहां की उन्नत तकनीकों को अपनाना बेहद जरूरी है। वहीं, पौध संरक्षण वैज्ञानिक डॉ. विनय पठानिया ने बताया कि किसानों को यहां आकर व्यावहारिक और वैज्ञानिक दोनों तरह की जानकारी मिल रही है। इससे वे अपने क्षेत्र में बेहतर उत्पादन के साथ-साथ रोग नियंत्रण और पौध प्रबंधन भी सही तरीके से कर पाएंगे। उन्होंने कहा कि यह कार्यक्रम राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) द्वारा स्पॉंर्स्ड है। मुजफ्फरपुर के किसान ने बताया कैसे बढ़ाए पैदावार स्थानीय किसान भोलानाथ झा ने अपनी सफलता का राज साझा करते हुए बताया कि हाई डेंसिटी प्लांटेशन ने उनकी खेती को पूरी तरह बदल दिया है। पौधों से पौधों की दूरी 10 फीट और कतार से कतार की दूरी 15 फीट रखते हैं। साथ ही साल में दो बार छंटाई करने से पेड़ छोटे रहते हैं, लेकिन फल ज्यादा देते हैं। पहले पारंपरिक तरीके से 40-50 फीट की दूरी पर पेड़ लगाए जाते थे, जिससे उत्पादन सीमित रहता था। लेकिन नई तकनीक से कम जगह में ज्यादा उत्पादन संभव हो रहा है और किसानों की आय में भी वृद्धि हो रही है। पंजाब जैसे उन्नत कृषि राज्य के किसान उनके खेत पर आकर लीची की खेती सीख रहे हैं। यह मुजफ्फरपुर और बिहार के लिए गर्व की बात है कि यहां की तकनीक अब देशभर में अपनाई जा रही है। बिहार का मुजफ्फरपुर, जो अपनी ‘शाही लीची’ के लिए देश-विदेश में प्रसिद्ध है, अब दूसरे राज्यों के किसानों के लिए भी सीखने का केंद्र बनता जा रहा है। खेती में अग्रणी माने जाने वाले पंजाब से किसान मुजफ्फरपुर पहुंच रहे हैं। पठानकोट से 22 किसानों का दल इन दिनों मुजफ्फरपुर पहुंचा है। इन किसानों का उद्देश्य यहां की लीची उत्पादन तकनीक को समझना और अपने राज्य में इसे अपनाकर उत्पादन बढ़ाना है। किसानों का यह दल राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र में वैज्ञानिकों से प्रशिक्षण ले रहा है। यहां उन्हें लीची की उन्नत किस्म, पौध प्रबंधन, रोग नियंत्रण, सिंचाई तकनीक और उत्पादन बढ़ाने के आधुनिक तरीकों की जानकारी दी जा रही है। इसके अलावा किसानों ने मुजफ्फरपुर के झपहां स्थित प्रगतिशील किसान भोलानाथ झा के फार्म का भी दौरा किया, जहां उन्होंने हाई डेंसिटी प्लांटेशन को करीब से देखा। पंजाब के किसान बोले- यहां से सीखकर लाखों कमा रहे पंजाब से आए किसान यशपाल सिंह, अजीत सिंह, हड़पाल सिंह और भूपेंद्र सिंह ने बताया कि पहले भी मुजफ्फरपुर की तकनीक अपनाकर अच्छा मुनाफा कमा चुके हैं, लेकिन यहां आकर उन्हें और नई चीजें सीखने को मिल रही हैं। यहां 10×15 फीट की दूरी पर लगाए गए लीची के पेड़ों में कम ऊंचाई पर ही काफी फल लग रहा है। यह हमारे लिए नया और बेहद उपयोगी मॉडल है। इससे कम जगह में ज्यादा उत्पादन संभव है। पंजाब में शाही लीची बन जाता है देहरादूनी लीची किसानों ने यह भी बताया कि पंजाब में मुजफ्फरपुर की शाही लीची को ‘देहरादून लीची’ के नाम से बेचा जाता है और वहां इसकी मांग काफी अधिक है। सीमित उत्पादन के कारण बाजार में इसकी कीमत भी अच्छी मिलती है, जिससे उन्हें बेहतर मुनाफा होता है। उन्होंने कहा कि अगर मुजफ्फरपुर की तकनीक को पूरी तरह अपनाया जाए, तो पंजाब में भी लीची उत्पादन को बड़े स्तर पर बढ़ाया जा सकता है। कृषि वैज्ञानिकों ने कहा- यहां की तकनीक अपनाना बेहद जरूरी पंजाब कृषि विश्वविद्यालय कृषि विज्ञान केंद्र, पठानकोट से इस प्रशिक्षण में शामिल फल वैज्ञानिक डॉ. मनु त्यागी ने कहा कि मुजफ्फरपुर की लीची विश्व स्तर पर अपनी अलग पहचान रखती है। बिहार, खासकर मुजफ्फरपुर, लीची उत्पादन में नंबर वन है। पंजाब में इसकी खेती बाद में शुरू हुई है, इसलिए यहां की उन्नत तकनीकों को अपनाना बेहद जरूरी है। वहीं, पौध संरक्षण वैज्ञानिक डॉ. विनय पठानिया ने बताया कि किसानों को यहां आकर व्यावहारिक और वैज्ञानिक दोनों तरह की जानकारी मिल रही है। इससे वे अपने क्षेत्र में बेहतर उत्पादन के साथ-साथ रोग नियंत्रण और पौध प्रबंधन भी सही तरीके से कर पाएंगे। उन्होंने कहा कि यह कार्यक्रम राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) द्वारा स्पॉंर्स्ड है। मुजफ्फरपुर के किसान ने बताया कैसे बढ़ाए पैदावार स्थानीय किसान भोलानाथ झा ने अपनी सफलता का राज साझा करते हुए बताया कि हाई डेंसिटी प्लांटेशन ने उनकी खेती को पूरी तरह बदल दिया है। पौधों से पौधों की दूरी 10 फीट और कतार से कतार की दूरी 15 फीट रखते हैं। साथ ही साल में दो बार छंटाई करने से पेड़ छोटे रहते हैं, लेकिन फल ज्यादा देते हैं। पहले पारंपरिक तरीके से 40-50 फीट की दूरी पर पेड़ लगाए जाते थे, जिससे उत्पादन सीमित रहता था। लेकिन नई तकनीक से कम जगह में ज्यादा उत्पादन संभव हो रहा है और किसानों की आय में भी वृद्धि हो रही है। पंजाब जैसे उन्नत कृषि राज्य के किसान उनके खेत पर आकर लीची की खेती सीख रहे हैं। यह मुजफ्फरपुर और बिहार के लिए गर्व की बात है कि यहां की तकनीक अब देशभर में अपनाई जा रही है।


