Rajasthan LPG Crisis : अमरीका व ईरान के बीच चल रहे अंतरराष्ट्रीय संघर्ष के बीच दुनियाभर में पेट्रोलियम पदार्थों का आयात-निर्यात प्रभावित होने से घाटोल उपखंड क्षेत्र में भी रसोई गैस की किल्लत है। घरेलू सिलेंडरों का होटल, ढाबों और अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में धड़ल्ले से अवैध इस्तेमाल दिक्कतें बढ़ा रहा है।
दरअसल, सप्लाई में कमी और कीमत बढ़ने के अंदेशे पर घरेलू उपभोक्ताओं में अतिरिक्त सिलेंडर सुरक्षित रखने की होड़ है। व्यावसायिक सिलेंडर महंगे और कम मात्रा में उपलब्ध होने से भी घरेलू सिलेंडर की कालाबाजारी बढ़ी है। घरों से ये सिलेंडर घूमाकर चाय की थड़ियों, मिठाई की दुकानों, रेस्तरां और वेल्डिंग यूनिट्स में मनमाने दामों में बेचे-खरीदे जा रहे हैं। इस हालात को लेकर पत्रिका ने शुक्रवार को घाटोल, खमेरा और नरवाली कस्बों की दुकानों की टोह ली, तो दस में से सात जगह घरेलू सिलेंडर प्रयुक्त होते पाए गए।
उल्लेखनीय यह भी कि गैस नहीं मिलने और दाम बढ़ने पर होटल व्यवसायियों ने नाश्ते और अन्य सामान की दरें बढ़ा ली है। दूसरी तरफ रसद विभाग के नियम धरे के धरे रह गए। जिससे घरेलू सिलेंडरों को व्यावसायिक उपयोग हो रहा है।
दर में बड़ा अंतर, सप्लाई चैन गड़बड़ाने मौकापरस्ती भी
व्यावसायिक सिलेंडर से 2166 रुपए कीमत में 19 किलो यानी 114 रुपए प्रति किलो गैस मिल रही है। जबकि 937 रुपए के घरेलू सिलेंडर से 14.2 किलो यानी 65.98 रुपए प्रति किलो भाव ही है। वैसे घाटोल में तीन अधिकृत एजेंसियां हैं, जिनसे बुकिंग के 25 दिन के अंतराल में घरेलू गैस सिलेंडर मिल रहे हैं, लेकिन मुख्यालय सहित जिले की जो एजेंसी तीन-चार हजार व्यावसायिक सिलेंडर नियमित सप्लाई करती है, उन्हे इन दिनों पचास-साठ ही मिल रहे हैं। इससे छोटे बड़े कारोबारी चोरी-छिपे घरेलू गैस सिलेंडर का जुगाड कर उपयोग धंधे में काम ले रहे हैं।
बढ़ रही दिक्कतें
सेनावासा से लेकर खमेरा तक हाइवे किनारे दो दर्जन से अधिक रेस्टोरेंट, होटल, नाश्ता सेंटर और चाय थड़ी पर घरेलू सिलेंडर का उपयोग खुलेआम है, लेकिन रसद विभाग और प्रशासन के अफसर तवज्जो नहीं दे रहे।
यह है कानूनी प्रावधान
घरेलू गैस की ब्लैक मैकेटिंग कर व्यावसायिक उपयोग पर प्रशासन और रसद विभाग की धरपकड़ उपरांत आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 के तहत कार्रवाई की जाती है। इसमें दोषी को सात साल की जेल या जुर्मान की सजा है।
‘उज्ज्वला’ से भी मुनाफाखोरी
सूत्र बताते हैं कि उज्ज्वला योजना में सब्सिडी पर मिल रहे सिलेंडर भी मुनाफाखोरी की भेंट चढ़ रहे हैं। वैसे इन उपभोक्ताओं को सिलेंडर तो सामान्य दर 9370 रुपए में ही मिल रहे हैं, लेकिन बिल कटते ही 308 रुपए की सब्सिडी लाभार्थी के अपने खाते में आते हैं। इसके बाद सिलेंडर दो सौ-तीन सौ रुपए ब्लैक में दुकानदारों को बेचे जा रहे हैं। दुकानदार भी कमर्शियल गैस के मुकाबले यह सस्ती पाकर हाथोंहाथ ले रहे हैं। इससे घरेलू सिलेंडर को आपूर्ति पर भी संकट बढ़ रहा है।


