सहरसा में रसोई गैस की किल्लत अब शैक्षणिक संस्थानों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को भी प्रभावित कर रही है। खासकर स्कूलों के हॉस्टलों में भोजन व्यवस्था पर इसका सीधा असर पड़ रहा है। साउथ पॉइंट स्कूल के हॉस्टल में गैस सिलेंडर खत्म होने के बाद रसोई व्यवस्था संकट में आ गई है। वही बाजार के व्यवसायों पर भी सीधा असर है। पिछले कुछ दिनों से गैस आपूर्ति बाधित स्कूल के निदेशक राजीव कुमार ने बताया कि पिछले कुछ दिनों से गैस आपूर्ति बाधित है। इसी बीच हॉस्टल में मौजूद सिलेंडर पूरी तरह समाप्त हो गए। ऐसी स्थिति में प्रबंधन के सामने हॉस्टल को अस्थायी रूप से बंद करने या वैकल्पिक व्यवस्था के जरिए भोजन तैयार करने का विकल्प था। छात्रों की पढ़ाई और दिनचर्या को ध्यान में रखते हुए प्रबंधन ने हॉस्टल चालू रखने का निर्णय लिया। अब हॉस्टल की रसोई में पारंपरिक तरीके से लकड़ी और कोयले के चूल्हे पर खाना बनाया जा रहा है। यह व्यवस्था पहले की तुलना में अधिक समय लेने वाली और श्रमसाध्य साबित हो रही है। रसोई कर्मचारियों को अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ रही है, वहीं धुएं और तेज गर्मी के कारण उन्हें असुविधाओं का सामना भी करना पड़ रहा है। इसके बावजूद कर्मचारी पूरी जिम्मेदारी के साथ छात्रों के लिए समय पर भोजन तैयार कर रहे हैं। प्रबंधन का कहना है कि इस संकट के बावजूद छात्रों को किसी प्रकार की परेशानी नहीं होने दी जा रही है। भोजन की गुणवत्ता और समय का विशेष ध्यान रखा जा रहा है, ताकि उनकी पढ़ाई प्रभावित न हो। इधर, गैस की किल्लत से व्यवसायियों को भी कमर्शियल गैस नहीं मिल पा रही है, ऐसे में वे लकड़ियों का स्टॉक करके अपने कारोबार को जीवित रखने की कोशिश कर रहे हैं। स्कूल के निदेशक ने उम्मीद जताई है कि जल्द ही गैस आपूर्ति सामान्य हो जाएगी। जैसे ही स्थिति सुधरेगी, हॉस्टल की रसोई व्यवस्था फिर से पहले की तरह सुचारू रूप से संचालित होने लगेगी। फिलहाल, गैस संकट ने वैकल्पिक व्यवस्था की आवश्यकता को स्पष्ट कर दिया है। सहरसा में रसोई गैस की किल्लत अब शैक्षणिक संस्थानों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को भी प्रभावित कर रही है। खासकर स्कूलों के हॉस्टलों में भोजन व्यवस्था पर इसका सीधा असर पड़ रहा है। साउथ पॉइंट स्कूल के हॉस्टल में गैस सिलेंडर खत्म होने के बाद रसोई व्यवस्था संकट में आ गई है। वही बाजार के व्यवसायों पर भी सीधा असर है। पिछले कुछ दिनों से गैस आपूर्ति बाधित स्कूल के निदेशक राजीव कुमार ने बताया कि पिछले कुछ दिनों से गैस आपूर्ति बाधित है। इसी बीच हॉस्टल में मौजूद सिलेंडर पूरी तरह समाप्त हो गए। ऐसी स्थिति में प्रबंधन के सामने हॉस्टल को अस्थायी रूप से बंद करने या वैकल्पिक व्यवस्था के जरिए भोजन तैयार करने का विकल्प था। छात्रों की पढ़ाई और दिनचर्या को ध्यान में रखते हुए प्रबंधन ने हॉस्टल चालू रखने का निर्णय लिया। अब हॉस्टल की रसोई में पारंपरिक तरीके से लकड़ी और कोयले के चूल्हे पर खाना बनाया जा रहा है। यह व्यवस्था पहले की तुलना में अधिक समय लेने वाली और श्रमसाध्य साबित हो रही है। रसोई कर्मचारियों को अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ रही है, वहीं धुएं और तेज गर्मी के कारण उन्हें असुविधाओं का सामना भी करना पड़ रहा है। इसके बावजूद कर्मचारी पूरी जिम्मेदारी के साथ छात्रों के लिए समय पर भोजन तैयार कर रहे हैं। प्रबंधन का कहना है कि इस संकट के बावजूद छात्रों को किसी प्रकार की परेशानी नहीं होने दी जा रही है। भोजन की गुणवत्ता और समय का विशेष ध्यान रखा जा रहा है, ताकि उनकी पढ़ाई प्रभावित न हो। इधर, गैस की किल्लत से व्यवसायियों को भी कमर्शियल गैस नहीं मिल पा रही है, ऐसे में वे लकड़ियों का स्टॉक करके अपने कारोबार को जीवित रखने की कोशिश कर रहे हैं। स्कूल के निदेशक ने उम्मीद जताई है कि जल्द ही गैस आपूर्ति सामान्य हो जाएगी। जैसे ही स्थिति सुधरेगी, हॉस्टल की रसोई व्यवस्था फिर से पहले की तरह सुचारू रूप से संचालित होने लगेगी। फिलहाल, गैस संकट ने वैकल्पिक व्यवस्था की आवश्यकता को स्पष्ट कर दिया है।


