गुजरात सरकार ने बनास बायो-सीएनजी प्लांट्स को बढ़ावा देने के लिए वर्ष 2024-25 के बजट में 60 करोड़ रुपए का प्रावधान किया है। बनासकांठा में स्थापित इस प्लांट्स से प्रतिवर्ष लगभग 12 करोड़ रुपए का राजस्व और 6,750 टन कार्बन उत्सर्जन में कमी का अनुमान है, जिससे राज्य के ग्रीन गुजरात मिशन को मजबूती मिलेगी।
अब 15 राज्यों में होगा लागू
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वेस्ट टू वेल्थ और हरित ऊर्जा के विजन के तहत गुजरात का बनास बायो-सीएनजी मॉडल अब राष्ट्रीय स्तर पर मिसाल बन रहा है। मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल के मार्गदर्शन में विकसित यह मॉडल अब केंद्र सरकार के सहयोग से देश के 15 राज्यों में लागू करने की दिशा में अग्रसर है। बनास डेयरी की ओर से संचालित यह परियोजना गोबर जैसे पारंपरिक अपशिष्ट को स्वच्छ ईंधन और जैविक उर्वरक में बदलकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नया आयाम दे रही है।
राज्य सरकार ने सहकारी दुग्ध उत्पादक संघों के माध्यम से नए बायो-सीएनजी प्लांट्स स्थापित करने के लिए बजट में विशेष प्रावधान किया है। योजना के तहत राज्य में लगभग 10 नए प्लांट्स चरणबद्ध तरीके से स्थापित किए जाएंगे। बनासकांठा में 40 मीट्रिक टन प्रतिदिन क्षमता वाला बायो-सीएनजी प्लांट पिछले 6 वर्षों से सफलतापूर्वक संचालित है। इसी सफलता को देखते हुए 5 और विशाल प्लांट्स पर काम जारी है, जिनमें से 2 प्रारंभ हो चुके हैं और तीसरा अंतिम चरण में है।
प्रत्येक प्लांट प्रतिदिन करता है करीब 100 मीट्रिक टन गोबर प्रोसेस
प्रत्येक प्लांट प्रतिदिन करीब 100 मीट्रिक टन गोबर प्रोसेस करता है। इससे प्रतिदिन लगभग 1,800 किलोग्राम कंप्रेस्ड बायोगैस, 25 मीट्रिक टन ठोस जैविक उर्वरक और 75 मीट्रिक टन तरल जैविक उर्वरक का उत्पादन होता है। इन उत्पादों की बिक्री से संयंत्र को प्रतिदिन करीब 3 लाख रुपए का राजस्व मिलता है।
इन प्लांट्स से 20-25 गांवों के लगभग 400-450 पशुपालक परिवारों को गोबर की आपूर्ति के बदले अतिरिक्त आय मिल रही है। किसानों को एक रुपए प्रति किलोग्राम की दर से भुगतान किया जाता है, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिल रहा है।


