चन्द्र प्रकाश जोशी
अजमेर (Ajmer news). कुछ लोग ऐसे होते हैं जो खुद के लिए कम, औरों के लिए जीते हैं। खुद से ज्यादा औरों की फिक्र। खुद पर आई विपदा को दूसरों के लिए ताकत बना लेते हैं। खुद के सुख को भूलकर दूसरों के दु:खों को दूर करने की जिद उन्हें अंदरुनी ताकत दे देती है। और अरसा बीतने के बाद महसूस होता है कि उन्होंने जो सोचा वह साकार हो रहा है, तो सुकून भी मिलता है… आमजन को राहत मिल रही है।
अजमेर में सेवा के पर्याय हैं पारवानी
ऐसे सकारात्मक विचारों के धनी और थैलेसीमिया पीडि़त बच्चों को समर्पित ईश्वर पारवानी अजमेर में सेवा के पर्याय हैं। वर्ष 1989 में उनकी बेटी जयश्री को जब चिकित्सकों ने थैलेसिमिया पीडि़त बताया तो वे घबरा गए। सप्ताह, पखवाड़े में हर बार जब बेटी को रक्त की जरूरत पड़ती तो उन्होंने रक्तदान किया। फिर परिचितों, मित्रों से बेटी के लिए रक्तदान का आग्रह करते। यही नहीं उस समय दिल्ली के सर गंगाराम हॉस्पिटल में ब्लड चढ़वाने एवं इलाज को जाते। हालांकि वे बेटी को नहीं बचा पाए।
दर्द को अपनी ताकत बनाया
उन्होंने इस दर्द को अपनी ताकत बना लिया। जब अजमेर में एक और थैलेसीमिया पीडि़त सामने आया, शनै: शनै: और मरीज चिह्नित होते गए तो उन पर उन बच्चों को रक्तदान, परामर्श, इलाज, की जिम्मेदारी भी बढ़ने लगी। वे अजमेर के जवाहर लाल नेहरू अस्पताल के ब्लड बैंक में थैलेसिमिया पीडित बच्चों की सुविधा के लिए सरकारों तक चिट्ठियां पहुंचवाई। शिशु वार्ड में थैलेसीमिया पीडि़तों के लिए अलग से वार्ड, वयस्क किशोरों के लिए अलग से वार्ड, थैलेसीमिक बच्चों के लिए अलग से रक्त की व्यवस्था में पीछे नहीं रहे।
108 बार चुके हैं रक्तदान
करीब 33 सालों से लगातार वे थैलेसीमिया पीडि़त बच्चों की सेवा कर रहे हैं। अजमेर रीजनल थैलेसीमिया वेलफेयर सोसायटी के गठन से लेकर अब तक स्वयं 108 बार रक्तदान कर चुके हैं। 66 साल की उम्र तक वे 101 ब्लड डोनेशन कैंप लगवा चुके हैं। वे सिर्फ थैलेसीमिया पीडि़त बच्चों के लिए रक्त का संग्रहण करवाते हैं। पारवानी अब तक करीब 200 कॉलेज, स्कूलों में संगोष्ठियों के माध्यम से रक्तदान की अलख जगा चुके हैं।
अजमेर में 273 थैलेसीमिया पीडि़त बच्चे पंजीकृत
सोसायटी में अकेले अजमेर में 273 थैलेसीमिया पीडि़त बच्चे पंजीकृत हैं, जबकि संभाग भर में करीब 800 से अधिक मरीज हैं। पारवानी बताते हैं कि जेएलएन अस्पताल के ब्लड बैंक में कंपोनेंट सेपरेशन मशीन स्थापित करवाने में जनप्रतिनिधियों, सरकार तक बार-बार आग्रह किया। आज भी थैलेसामिया पीडि़त बच्चों के परामर्श, उपचार एवं दवाइयों की चिंता हमेशा रहती है।
सेवा में अपनी बीमारी को भी हावी नहीं होने देते
सरकार तक आवाज पहुंचाने में कोई कमी नहीं रखी। खुद पैदल चलकर सेवा कार्य करते हैं। थैलेसीमिया पीडि़तों की सेवा में अपनी बीमारी को भी हावी नहीं होने देते। ईश्वर पारवानी बताते हैं कि उनके परिवार में पिताजी, पत्नी, भाइयों का हमेशा सहयोग मिला। वे सेवा कार्य को हमेशा प्रोत्साहित करते रहे। हां, समाज में और भी ऐसे बिरले हैं जो अपनी धुन में काम में जुटे हैं। ऐसी शख्तियत समाज के लिए प्रेरणा बन रही हैं।


