बाड़मेर। सीमांत जिले बाड़मेर के जालिपा गांव की बहू दीपूकंवर ने अपने संघर्ष, संकल्प और मेहनत के बल पर न्यायिक सेवा में स्थान प्राप्त कर पूरे क्षेत्र का नाम रोशन किया है। उनका चयन गुजरात न्यायिक सेवा में न्यायिक अधिकारी के पद पर हुआ है। इस उपलब्धि से परिवार सहित पूरे इलाके में गर्व का माहौल है।
दीपूकंवर गुजरात के चारड़ा (थराद) निवासी किशनसिंह की पुत्री हैं और सात वर्ष पूर्व उनकी शादी जालिपा निवासी लोकेंद्रसिंह के साथ हुई थी। विवाह के बाद भी उन्होंने अपने सपनों को जीवित रखा और पढ़ाई जारी रखते हुए न्यायिक सेवा तक का सफर तय किया। उनकी एक पुत्री है।
दीपूकंवर का न्यायिक सेवा में तीसरे प्रयास में चयन हुआ है। उन्होंने वर्ष 2021 से न्यायालय में अधिवक्ता के रूप में अभ्यास शुरू किया था। वर्ष 2022 में पहली बार परीक्षा दी, जिसमें प्रारंभिक और मुख्य परीक्षा उत्तीर्ण कर ली, लेकिन साक्षात्कार में चयन नहीं हो पाया। वर्ष 2023 में वे मुख्य परीक्षा में रह गईं। अंतत: वर्ष 2025 में 79वीं वरीयता के साथ उनका चयन हो गया।
सास-ससुर ने हर समय प्रेरित किया
दीपूकंवर बताती हैं कि विवाह के बाद ससुराल में उन्हें पढ़ाई के लिए पूरा सहयोग मिला। सास समद कंवर और ससुर थानसिंह हमेशा उन्हें पढ़ाई के लिए प्रेरित करते रहे। यदि वे घर का काम करने लगतीं तो ससुर स्वयं टोक देते और कहते कि पहले कुछ बनकर दिखाओ, जिम्मेदारियां बाद में निभाना।
इसी प्रेरणा के चलते वे ससुराल में एक कमरे को छात्रावास की तरह बनाकर नियमित अध्ययन करती रहीं। विवाह के समय दीपू एलएलबी द्वितीय वर्ष की छात्रा थीं। वे अपने साथ मायके से कानून की किताबें और न्यायिक अधिकारी बनने का सपना लेकर ससुराल आई थीं। शादी के केवल आठ दिन बाद ही परीक्षा होने के कारण वे वापस मायके जाकर परीक्षा में शामिल हुईं।
परिणाम का पल बेहद भावुक था
दीपूकंवर बताती हैं कि उनके पति लोकेंद्रसिंह ने भी पढ़ाई और न्यायालय में अभ्यास के दौरान हमेशा उनका मार्गदर्शन किया। सगाई के समय वे वाणिज्य विषय से स्नातक कर रही थीं, उसी दौरान पति ने उन्हें कानून की पढ़ाई के लिए प्रेरित किया। इसके बाद उन्होंने केपी शाह लॉ कॉलेज, जामनगर से कानून की पढ़ाई पूरी कर वहीं से न्यायालय में अभ्यास शुरू किया।
फाइनल परिणाम आने का पल भी उनके लिए बेहद भावुक था। 10 मार्च की शाम जब परिणाम जारी हुआ, तब वे जामनगर में मायके पर थीं। परिणाम देखने से पहले मंदिर जाकर भगवान से प्रार्थना की। जब सूची में अपना नाम देखा तो उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ। दोबारा देखने के बाद यकीन हुआ कि उनका चयन हो गया है। सबसे पहले उन्होंने अपने पिता को यह खुशखबरी दी।
घूंघट दबाव नहीं, यह संस्कारों का हिस्सा
दीपूकंवर का कहना है कि परंपराएं और संस्कार जीवन की शक्ति होते हैं। वे ससुराल में पारंपरिक वेशभूषा पहनती हैं और घूंघट निकालना उन्हें अपने संस्कार का हिस्सा लगता है। उनका मानना है कि संस्कार और शिक्षा साथ-साथ चल सकते हैं और सफलता के रास्ते में कोई बाधा नहीं बनते।


