ऐतिहासिक नगरी नालंदा में आयोजित ‘नालंदा इंटरनेशनल लिटरेचर फेस्टिवल’ के अलग-अलग सत्रों में भारतीय ज्ञान परंपरा, कलात्मक अभिव्यक्ति और मानवीय संवेदनाओं का अनूठा संगम देखने को मिला। आयोजन के दौरान जहां विशेषज्ञों ने प्राचीन भारत के बौद्धिक गौरव पर मंथन किया, वहीं कलाकारों ने कैनवास पर इतिहास को जीवंत किया। भारतीय ज्ञान परंपरा, शास्त्रों से भविष्य की ओर प्रथम सत्र में ‘प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा’ पर गहन चर्चा हुई। वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र ने कहा कि हमारी परंपरा शास्त्रार्थ, तर्क और स्याद्वाद जैसे सिद्धांतों से विकसित हुई है, जिसे गुरुकुलों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित किया गया। पूर्व प्रेस सचिव अजय सिंह ने जोर देकर कहा कि अतीत के गौरव में डूबे रहना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि नालंदा की मूल भावना को वर्तमान में पुनर्जीवित करना अनिवार्य है, ताकि भारत ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था में अग्रणी भूमिका निभा सके। डॉ. कविता शर्मा ने महाभारत के प्रसंगों के जरिए जीवन के नैतिक मूल्यों और सही निर्णय लेने की कला पर प्रकाश डाला। चिंतक मनुदास ने निष्कर्ष दिया कि यह विरासत केवल ग्रंथों तक सीमित नहीं, बल्कि हमारे आचरण और जीवन-मूल्यों में रची-बसी है। लाइव पेंटिंग, कैनवास पर उतरीं महान विभूतियां दूसरा सत्र पूरी तरह लाइव पेंटिंग को समर्पित रहा, जिसका उद्घाटन ट्रांसजेंडर समुदाय की डॉ. भारती और सलमा चौधरी ने किया। सलमा चौधरी के प्रयासों से ही देश में पहली बार साझा शौचालयों का निर्माण संभव हुआ है। परिधि आर्ट ग्रुप के सहयोग से आयोजित इस सत्र में पटना कॉलेज ऑफ आर्ट्स के छात्रों—अमन अयाज, प्रियांशु कुमार, सुमित कुमार, ज्योति चौरसिया और टीना यादव ने अपनी कूची से आर्यभट्ट और आचार्य चाणक्य जैसे महापुरुषों को चित्रित कर नालंदा के वैश्विक योगदान को प्रदर्शित किया। पेनिंग ग्रीफ: दुःख को मिली रचनात्मक अभिव्यक्ति तीसरे सत्र में “पेनिंग ग्रीफ: अनुभव से अभिव्यक्ति तक” विषय पर संवेदनशील संवाद हुआ। प्रख्यात लेखिका डॉ. नीना वर्मा ने अपनी पुस्तकों का हवाला देते हुए कहा कि शोक केवल पीड़ा नहीं, बल्कि आत्मिक समझ की एक ‘पवित्र तीर्थयात्रा’ है। कवयित्री गगन गिल ने साझा किया कि बिछड़ने का गहरा दुख समय के साथ सहना आ जाता है और यही संवेदना साहित्य में रचनात्मक रूप ले लेती है। दोनों वक्ताओं ने इस बात पर सहमति जताई कि एक सच्चा लेखक अपने भीतर के निजी दुखों को शब्दों में ढालकर उसे व्यापक मानवीय संवेदना में बदल देता है।
यह उत्सव न केवल संवाद का माध्यम बना, बल्कि इसने भारतीय ज्ञान की समृद्ध विरासत को नए संदर्भों में समझने का अवसर भी प्रदान किया। ऐतिहासिक नगरी नालंदा में आयोजित ‘नालंदा इंटरनेशनल लिटरेचर फेस्टिवल’ के अलग-अलग सत्रों में भारतीय ज्ञान परंपरा, कलात्मक अभिव्यक्ति और मानवीय संवेदनाओं का अनूठा संगम देखने को मिला। आयोजन के दौरान जहां विशेषज्ञों ने प्राचीन भारत के बौद्धिक गौरव पर मंथन किया, वहीं कलाकारों ने कैनवास पर इतिहास को जीवंत किया। भारतीय ज्ञान परंपरा, शास्त्रों से भविष्य की ओर प्रथम सत्र में ‘प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा’ पर गहन चर्चा हुई। वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र ने कहा कि हमारी परंपरा शास्त्रार्थ, तर्क और स्याद्वाद जैसे सिद्धांतों से विकसित हुई है, जिसे गुरुकुलों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित किया गया। पूर्व प्रेस सचिव अजय सिंह ने जोर देकर कहा कि अतीत के गौरव में डूबे रहना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि नालंदा की मूल भावना को वर्तमान में पुनर्जीवित करना अनिवार्य है, ताकि भारत ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था में अग्रणी भूमिका निभा सके। डॉ. कविता शर्मा ने महाभारत के प्रसंगों के जरिए जीवन के नैतिक मूल्यों और सही निर्णय लेने की कला पर प्रकाश डाला। चिंतक मनुदास ने निष्कर्ष दिया कि यह विरासत केवल ग्रंथों तक सीमित नहीं, बल्कि हमारे आचरण और जीवन-मूल्यों में रची-बसी है। लाइव पेंटिंग, कैनवास पर उतरीं महान विभूतियां दूसरा सत्र पूरी तरह लाइव पेंटिंग को समर्पित रहा, जिसका उद्घाटन ट्रांसजेंडर समुदाय की डॉ. भारती और सलमा चौधरी ने किया। सलमा चौधरी के प्रयासों से ही देश में पहली बार साझा शौचालयों का निर्माण संभव हुआ है। परिधि आर्ट ग्रुप के सहयोग से आयोजित इस सत्र में पटना कॉलेज ऑफ आर्ट्स के छात्रों—अमन अयाज, प्रियांशु कुमार, सुमित कुमार, ज्योति चौरसिया और टीना यादव ने अपनी कूची से आर्यभट्ट और आचार्य चाणक्य जैसे महापुरुषों को चित्रित कर नालंदा के वैश्विक योगदान को प्रदर्शित किया। पेनिंग ग्रीफ: दुःख को मिली रचनात्मक अभिव्यक्ति तीसरे सत्र में “पेनिंग ग्रीफ: अनुभव से अभिव्यक्ति तक” विषय पर संवेदनशील संवाद हुआ। प्रख्यात लेखिका डॉ. नीना वर्मा ने अपनी पुस्तकों का हवाला देते हुए कहा कि शोक केवल पीड़ा नहीं, बल्कि आत्मिक समझ की एक ‘पवित्र तीर्थयात्रा’ है। कवयित्री गगन गिल ने साझा किया कि बिछड़ने का गहरा दुख समय के साथ सहना आ जाता है और यही संवेदना साहित्य में रचनात्मक रूप ले लेती है। दोनों वक्ताओं ने इस बात पर सहमति जताई कि एक सच्चा लेखक अपने भीतर के निजी दुखों को शब्दों में ढालकर उसे व्यापक मानवीय संवेदना में बदल देता है।
यह उत्सव न केवल संवाद का माध्यम बना, बल्कि इसने भारतीय ज्ञान की समृद्ध विरासत को नए संदर्भों में समझने का अवसर भी प्रदान किया।


