सुल्तानपुर के खैराबाद मोहल्ले में मंगलवार रात हजरत अली की शहादत के अवसर पर एक जुलूस निकाला गया। यह जुलूस इमामबाड़ा बेगम हुसैन से शुरू हुआ। अंजुमन जीनतुल अजा और अंजुमन गुंचए मजलूमिया ने नौहा-मातम कर हजरत अली को श्रद्धांजलि दी। जुलूस की मजलिस को मौलाना बबर अली खां ने संबोधित किया। उन्होंने हजरत अली को दुनिया का ऐसा शासक बताया, जिनके चार साल के शासनकाल में कोई गरीब भूखा नहीं रहा। मौलाना बबर अली खां ने बताया कि 19 रमजान 40 हिजरी को इराक के कूफा शहर की मस्जिद में नमाज पढ़ते समय हजरत अली पर तलवार से हमला किया गया था। उन्होंने इस घटना को इस्लाम के इतिहास और दुनिया का मस्जिद में पहला आतंकी हमला करार दिया। मौलाना के अनुसार, यह हमला इब्ने मुल्जिम ने किया था, जिसके पीछे तत्कालीन शाम (दमिश्क) की हुकूमत का हाथ था। उन्होंने यह भी बताया कि इसी शासक के बेटे ने बाद में कर्बला में इमाम हुसैन का कत्ल कराया था। मौलाना बबर अली खां ने अपने संबोधन में कहा कि हर दौर में बेगुनाह मारे गए, लेकिन उनकी विचारधारा खत्म नहीं हुई। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि आज हजरत अली के वंशज हर जगह मौजूद हैं, जबकि शाम की हुकूमत से जुड़ा कोई यह दावा नहीं कर सकता कि वे उनके वंशज हैं।
मौलाना ने हजरत अली के कथन ‘बोलो ताकि पहचाने जाओ’ का उल्लेख करते हुए कहा कि मुसलमानों के लिए ज्ञान (इल्म) हासिल करना आवश्यक है, ताकि उनकी अपनी एक पहचान बन सके। जुलूस के दौरान ‘अली अली हाय अली’ की सदा गूंजती रही। यह जुलूस शिया मस्जिद मीर बंदे हसन से होते हुए दोबारा इमामबाड़े पर आकर समाप्त हुआ। सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने के लिए नगर कोतवाली पुलिस बल मौके पर तैनात रहा। इस अवसर पर एमएच खान एडवोकेट, जाहिद अकबर, शोहरत अली, शाहिद अकबर, आसिम सज्जाद, हाजी मुजाहिद अकबर, नसीम हुसैन और अजादार हुसैन सहित सैकड़ों की संख्या में लोग उपस्थित थे।


