वाल्मीकि टाइगर रिजर्व (वीटीआर) से भटककर एक सफेद उल्लू बगहा के अनुमंडलीय अस्पताल परिसर में पहुंच गया। अस्पताल के मुख्य गेट के पास एक बरगद के पेड़ पर बैठे इस उल्लू को देखने के लिए लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी। होली के दिन सफेद उल्लू के दिखने को कुछ लोगों ने धार्मिक दृष्टि से शुभ संकेत माना। कई लोगों ने बताया कि उन्होंने पहली बार इस रंग का उल्लू देखा है, जिससे उनमें कौतूहल था। यह एक शुभ संकेत है। उल्लू के अस्पताल परिसर में होने की सूचना पर आसपास के लोग उसे देखने जुट गए। भीड़ बढ़ने से पक्षी के असहज होने की आशंका जताई गई। कुछ जागरूक नागरिकों ने उसकी सुरक्षा के मद्देनजर वन विभाग से संपर्क करने का प्रयास किया, ताकि उसका सुरक्षित रेस्क्यू किया जा सके। हालांकि, खबर लिखे जाने तक वन विभाग से संपर्क नहीं हो पाया और उनका आधिकारिक पक्ष भी प्राप्त नहीं हुआ। जानकारी के अनुसार, यह उल्लू बार्न आउल प्रजाति का है। इसकी पहचान दिल के आकार के चेहरे और सफेद रंग से होती है। इसे आम बोलचाल में ‘हवेली उल्लू’ भी कहा जाता है। वाल्मीकि टाइगर रिजर्व अपनी समृद्ध जैव विविधता के लिए जाना जाता है, जहां लगभग 300 प्रजातियों के पक्षी पाए जाते हैं। बार्न आउल भी इसी क्षेत्र में पाए जाते हैं और कभी-कभी भटककर रिहायशी इलाकों में आ जाते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, यह प्रजाति मुख्य रूप से चूहे और अन्य कृन्तकों का शिकार करती है, जिससे किसानों को लाभ होता है। इनके पंखों की संरचना ऐसी होती है कि वे कम आवाज में उड़ान भरते हैं और पानी से भी जल्दी नहीं भीगते। स्थानीय लोगों ने प्रशासन से इस उल्लू के सुरक्षित संरक्षण की मांग की है। वाल्मीकि टाइगर रिजर्व (वीटीआर) से भटककर एक सफेद उल्लू बगहा के अनुमंडलीय अस्पताल परिसर में पहुंच गया। अस्पताल के मुख्य गेट के पास एक बरगद के पेड़ पर बैठे इस उल्लू को देखने के लिए लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी। होली के दिन सफेद उल्लू के दिखने को कुछ लोगों ने धार्मिक दृष्टि से शुभ संकेत माना। कई लोगों ने बताया कि उन्होंने पहली बार इस रंग का उल्लू देखा है, जिससे उनमें कौतूहल था। यह एक शुभ संकेत है। उल्लू के अस्पताल परिसर में होने की सूचना पर आसपास के लोग उसे देखने जुट गए। भीड़ बढ़ने से पक्षी के असहज होने की आशंका जताई गई। कुछ जागरूक नागरिकों ने उसकी सुरक्षा के मद्देनजर वन विभाग से संपर्क करने का प्रयास किया, ताकि उसका सुरक्षित रेस्क्यू किया जा सके। हालांकि, खबर लिखे जाने तक वन विभाग से संपर्क नहीं हो पाया और उनका आधिकारिक पक्ष भी प्राप्त नहीं हुआ। जानकारी के अनुसार, यह उल्लू बार्न आउल प्रजाति का है। इसकी पहचान दिल के आकार के चेहरे और सफेद रंग से होती है। इसे आम बोलचाल में ‘हवेली उल्लू’ भी कहा जाता है। वाल्मीकि टाइगर रिजर्व अपनी समृद्ध जैव विविधता के लिए जाना जाता है, जहां लगभग 300 प्रजातियों के पक्षी पाए जाते हैं। बार्न आउल भी इसी क्षेत्र में पाए जाते हैं और कभी-कभी भटककर रिहायशी इलाकों में आ जाते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, यह प्रजाति मुख्य रूप से चूहे और अन्य कृन्तकों का शिकार करती है, जिससे किसानों को लाभ होता है। इनके पंखों की संरचना ऐसी होती है कि वे कम आवाज में उड़ान भरते हैं और पानी से भी जल्दी नहीं भीगते। स्थानीय लोगों ने प्रशासन से इस उल्लू के सुरक्षित संरक्षण की मांग की है।


