सहरसा के बनगांव नगर पंचायत में मनाई जाने वाली ‘घूमौर होली’ देशभर में अपनी विशिष्ट पहचान रखती है। ब्रज की तर्ज पर खेली जाने वाली यह होली सामान्य होली से एक दिन पहले मनाई जाती है। जब देश में होली की तैयारियां चल रही होती हैं, बनगांव रंगों से सराबोर हो चुका होता है। इस वर्ष भी होली से एक दिन पहले बनगांव में घूमौर होली का आयोजन किया गया। सैकड़ों लोगों ने एक-दूसरे के कंधों पर सवार होकर रंग खेले। फाग के गीत और ढोल-मंजीरे की थाप पर पूरा गांव उत्सव में लीन रहा। यह आयोजन ब्रज की होली के समान प्रतीत होता है। बनगांव की होली से जुड़ी तस्वीरें… परंपरा की शुरुआत संत लक्ष्मीनाथ गोसाईं ने की थी
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, इस परंपरा की शुरुआत 18वीं सदी में संत लक्ष्मीनाथ गोसाईं ने की थी। बताया जाता है कि लगभग 200 वर्ष पूर्व उन्होंने इस विशेष होली की नींव रखी थी। कुछ ग्रामीण इसे भगवान श्रीकृष्ण के काल से जुड़ी परंपरा भी मानते हैं। बनगांव की यह होली सामाजिक समरसता का प्रतीक मानी जाती है। यहां सभी जाति और धर्म के लोग बिना किसी भेदभाव के एक साथ होली खेलते हैं। रोजगार या शिक्षा के लिए देश-विदेश में रहने वाले ग्रामीण भी इस विशेष पर्व पर घर लौटना सुनिश्चित करते हैं। यहां रंग खेले बिना होली अधूरी रहती
घूमौर होली का जुलूस गांव की गलियों से होते हुए अंत में ‘भगवती स्थान’ पहुंचता है। मान्यता है कि यहां रंग खेले बिना होली अधूरी रहती है। ग्रामीणों का मानना है कि पिछले 200 वर्षों में इस आयोजन के दौरान कभी कोई अप्रिय घटना नहीं हुई है। सहरसा के बनगांव नगर पंचायत में मनाई जाने वाली ‘घूमौर होली’ देशभर में अपनी विशिष्ट पहचान रखती है। ब्रज की तर्ज पर खेली जाने वाली यह होली सामान्य होली से एक दिन पहले मनाई जाती है। जब देश में होली की तैयारियां चल रही होती हैं, बनगांव रंगों से सराबोर हो चुका होता है। इस वर्ष भी होली से एक दिन पहले बनगांव में घूमौर होली का आयोजन किया गया। सैकड़ों लोगों ने एक-दूसरे के कंधों पर सवार होकर रंग खेले। फाग के गीत और ढोल-मंजीरे की थाप पर पूरा गांव उत्सव में लीन रहा। यह आयोजन ब्रज की होली के समान प्रतीत होता है। बनगांव की होली से जुड़ी तस्वीरें… परंपरा की शुरुआत संत लक्ष्मीनाथ गोसाईं ने की थी
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, इस परंपरा की शुरुआत 18वीं सदी में संत लक्ष्मीनाथ गोसाईं ने की थी। बताया जाता है कि लगभग 200 वर्ष पूर्व उन्होंने इस विशेष होली की नींव रखी थी। कुछ ग्रामीण इसे भगवान श्रीकृष्ण के काल से जुड़ी परंपरा भी मानते हैं। बनगांव की यह होली सामाजिक समरसता का प्रतीक मानी जाती है। यहां सभी जाति और धर्म के लोग बिना किसी भेदभाव के एक साथ होली खेलते हैं। रोजगार या शिक्षा के लिए देश-विदेश में रहने वाले ग्रामीण भी इस विशेष पर्व पर घर लौटना सुनिश्चित करते हैं। यहां रंग खेले बिना होली अधूरी रहती
घूमौर होली का जुलूस गांव की गलियों से होते हुए अंत में ‘भगवती स्थान’ पहुंचता है। मान्यता है कि यहां रंग खेले बिना होली अधूरी रहती है। ग्रामीणों का मानना है कि पिछले 200 वर्षों में इस आयोजन के दौरान कभी कोई अप्रिय घटना नहीं हुई है।


