सलूम्बर में होलिका दहन का पर्व इस बार विशेष संयोग में मनाया गया। भद्रा और ग्रहण के प्रभाव के बावजूद, शास्त्रसम्मत मुहूर्त के अनुसार शाम से होलिका दहन की शुरुआत हुई। शहर के विभिन्न मोहल्लों और कॉलोनियों में विधि-विधान के साथ होलिका जलाई गई, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए। शहर के प्रमुख स्थानों पर होलिका दहन किया गया। इनमें होली चौक, पुलिस चौकी के पास, द्वारिका मंदिर के सामने, गांधी चौक, भोई वाड़ा, खटीक वाड़ा मोहल्ला और रावली पोल स्थित चारभुजा मंदिर के सामने जैसे कई स्थल शामिल थे। सभी जगह पंडितों के मंत्रोच्चार और पूजा-अर्चना के साथ होलिका जलाई गई। सुथार वाड़ी में 30 फीट ऊंची होलिका
इस वर्ष सुथार वाड़ी में लगभग 30 फीट ऊंची होलिका बनाई गई, जो शहर में आकर्षण का मुख्य केंद्र रही। बड़ी संख्या में लोग इस विशाल होलिका को देखने पहुंचे। भक्त प्रह्लाद की प्रतिमा स्थापित की
द्वारिका मंदिर के सामने भी एक विशेष स्वरूप की होलिका सजाई गई थी। यहां भक्त प्रह्लाद की छोटी प्रतिमा स्थापित की गई, जो श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र बनी। होलिका दहन के साथ शहर में पारंपरिक ‘ढूंढ’ रस्म भी निभाई गई। इस परंपरा के तहत, जिस परिवार में नवजात शिशु का जन्म होता है, उसके मामा द्वारा बच्चे को होलिका की परिक्रमा करवाई जाती है। परिजनों ने यह रस्म उत्साह और श्रद्धा के साथ पूरी की। रावली पोल स्थित चारभुजा मंदिर के सामने होलिका दहन के बाद, उसकी अग्नि को पुरोहित वाड़ी मोहल्ले के निवासी अपने क्षेत्र में ले गए और वहां एक दूसरी होलिका प्रज्वलित की। यह वर्षों पुरानी परंपरा श्रद्धा और आस्था के साथ निभाई जाती है।


