दिसंबर 2025 में फूड एंड सेफ्टी डिपार्टमेंट ने राजस्थान में ईट राइट ड्राइव चलाया। इसमें केक, पेस्ट्री, चिप्स, चॉकलेट, नूडल्स और स्ट्रीट फूड सहित 670 सैंपल की जांच की गई। इनमें 11.19% फूड प्रोडक्ट तय मानकों पर खरे नहीं उतरे। रिपोर्ट में पाया गया कि केक-आइसक्रीम जैसे कई प्रोडक्ट्स में सिंथेटिक रंगों का इस्तेमाल तय सीमा से बहुत ज्यादा था, जो बच्चे की मेंटल और फिजिकल हेल्थ बिगाड़ सकता है। पढ़िए पूरी रिपोर्ट… प्रदेश के फूड सेफ्टी एंड ड्रग कंट्रोलर कमिश्नरेट की ओर से 1 से 31 दिसंबर तक अभियान चलाया गया। इसका मकसद ये जांचना था कि बच्चों को परोसा जा रहा खाना सुरक्षित है या नहीं? तय मानकों के अनुसार और सही जानकारी के साथ बेचा जा रहा है या नहीं? अलग-अलग टीमों ने प्रदेशभर से 670 सैंपल लिए। इसमें बिस्किट, केक, कोल्ड ड्रिंक्स, समोसे-कचौरी जैसे स्ट्रीट फूड, आइसक्रीम, कॉटन कैंडी और मिठाइयां शामिल थीं। इन सैंपल की अजमेर, अलवर, बांसवाड़ा, भरतपुर, बीकानेर, जयपुर, जोधपुर, कोटा और उदयपुर की लैब्स में जांच कराई गई। 670 में से 75 सैंपल (11.19%) में कमियां पाई गईं। कमियों को 3 कैटेगिरी में बांटा सबसे ज्यादा रिस्क किस खाने में? दिमाग को नुकसान पहुंचाने वाले रंगों का इस्तेमाल राहत की बात…छोटे बच्चों को दिए जाने वाले प्रोडक्ट्स में किसी प्रकार की कमियां नहीं पाई गईं। जांच में ये साफ किया गया है कि शिशु आहार और न्यूट्रास्यूटिकल्स के सैंपल सुरक्षित पाए गए। भरतपुर में सबसे ज्यादा 29% सैंपल फेल
इस स्टडी के नतीजों में प्रदेश के अलग-अलग जिलों के बीच काफी अंतर देखने को मिला। भरतपुर में सबसे ज्यादा 29.41% सैंपल फेल हुए। उदयपुर, जोधपुर और जालोर में भी औसत से ज्यादा सैंपल मानकों पर खरे नहीं उतरे। इसके अलावा बांसवाड़ा, अलवर और अजमेर में भी कुछ सैंपल फेल हुए हैं। कोटा के सैंपल सबसे सुरक्षित पाए गए। फूड सेफ्टी डिपार्टमेंट की कमिश्नर डॉ. टी शुभमंगला ने बताया कि प्रमुख सचिव गायत्री राठौड़ के निर्देश पर ये स्टडी गई गई। जांच रिपोर्ट आने के बाद कार्रवाई भी की गई है। उन्होंने कहा- बच्चों को फ्रेश होम कुक्ड फूड ही दिया जाना चाहिए। इसके अलावा अगर कोई प्रोडक्ट खरीदा जाए तो उसमें कंटेंट देखने के साथ ही एक्सपायरी डेट भी देखनी चाहिए।


