Afghanistan Pakistan Tension: पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच अब सैन्य संघर्ष युद्ध में तब्दील होता दिख रहा है। गुरुवार देर रात से पाकिस्तान अफगानिस्तान सीमा (डूरंड लाइन) पर दोनों ओर से भीषण हमले किए जा रहे हैं। अफगान रक्षा मंत्रालय का दावा है कि 55 पाकिस्तानी सैनिक मारे गए है। तालिबानी फोर्सेज ने पाकिस्तान के 2 सैन्य ठिकाने और 19 चेक पोस्ट को अपने कब्जे में ले लिया है, जबकि पाकिस्तान का दावा है कि उसने 100 से अधिक तालिबान लड़ाकों को मौत के घाट उतार दिए हैं। पाकिस्तानी रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने कहा कि हमारा धैर्य खत्म हो गया। अब यह खुला युद्ध है। दोनों ओर से भारी नुकसान के दावे किए जा रहे हैं।
दोनों देशों के बीच जारी यह तनाव
दरअसल, यह तनाव नया नहीं है। इसकी जड़ 1893 में ब्रिटिश भारत के विदेश सचिव सर मॉर्टिमर डूरंड और अफगान अमीर अब्दुर रहमान खान के बीच हुए समझौते में है। उस समय ब्रिटेन ने ब्रिटिश ऑपनिवेशनिक भारत को रूस से अलग रखने के लिए अफगानिस्तान को बफर जोन बनाया। साथ ही, अविभाजित भारत (पाकिस्तान) और अफगानिस्तान के बीच 2,611 किलोमीटर लंबी सीमा खींच दी। जिसे बाद में डूरंड लाइन कहा गया। यह लाइन पश्तून कबीलों के इलाके को दो हिस्सों में बांटती है। पाकिस्तान इसे अपनी अंतरराष्ट्रीय सीमा मानता है, लेकिन अफगानिस्तान ने कभी औपचारिक रूप से स्वीकार नहीं किया।
डूरंड लाइन का नक्शा
पश्तून क्षेत्र को विभाजित करने वाली विवादित सीमा स्वतंत्रता के बाद अफगानिस्तान ने ‘पश्तूनिस्तान’ की मांग की, यानी पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान को मिलाकर एक अलग पश्तून राज्य। 1947 में पाकिस्तान बनने के बाद काबुल ने कहा कि डूरंड लाइन ब्रिटिश औपनिवेशिक समझौता था, जो अब लागू नहीं होता। पाकिस्तान ने इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सीमा बताया। समस्या सिर्फ नक्शे की नहीं, बल्कि जमीन और लोगों की है। डूरंड लाइन पश्तून परिवारों, कबीलों और व्यापार मार्गों को काटती है। दोनों तरफ रहने वाले पश्तून एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। अफगानिस्तान इसे अपनी संप्रभुता का उल्लंघन मानता है। पाकिस्तान इसे सुरक्षा की रेखा कहता है।
डूरंड लाइन की औपचारिक मान्यता के बिना स्थाई शांति असंभव
विशेषज्ञों का कहना है कि बिना डूरंड लाइन की औपचारिक मान्यता या समझौते के शांति असंभव है। 1970-80 के दशक में भी कई बार बातचीत हुई, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला।वर्तमान में दोनों देशों के बीच कोई राजनयिक संबंध नहीं बचे हैं। सीमा पार के 70 से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं। अगर तनाव बढ़ा तो पूरा दक्षिण एशिया अस्थिर हो सकता है। कतर, तुर्की और सऊदी अरब फिर मध्यस्थता की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन सफलता संदिग्ध है।डूरंड लाइन सिर्फ एक लकीर नहीं, बल्कि 133 साल पुराना घाव है जो आज भी खून बहा रहा है। दोनों देशों को समझना होगा कि इस घाव को भूलकर आगे बढ़ना ही एकमात्र रास्ता है।
बीबीसी से बात करते हुए साउथ एशियन यूनिवर्सिटी में एसोसिएट प्रोफ़ेसर धनंजय त्रिपाठी ने कहा कि अगर यह युद्ध जारी रहता है तो इससे भारतीय उपमाहद्वीप में अस्थिरता का माहौल कायम हो सकता है। इससे बड़े देशों को इलाके में घुसपैठ की अनुमति मिल जाएगी। उन्होंने कहा कि अगर पाकिस्तान दूसरी ओर सीमा पर परेशान रहता है तो यह भारत के लिए फायदेमंद स्थिति है। हालांकि, इस संघर्ष का फायदा उठाकर कोई ऐसा संगठन उभरता है जो पाकिस्तान के ज्यादा करीब हो, तो यह भारत के लिए नुकसानदायक हो सकता है।
विदेश मामलों के जानकार कमर आगा ने X पर लिखा कि भारत के लिए न तो अफगानिस्तान में शासन कर रहा तालिबान और न ही पाकिस्तान मित्र है, इसलिए अगर यह संघर्ष जारी रहा तो भारत को इससे फायदा ही है। उन्होंने कहा कि भारत यह चाहेगा कि उसका शत्रु एक मोर्चे पर उलझा रहे।


