Vanakkam Poorvottar: Himanta Vs Gogoi की राजनीतिक जंग का है पुराना इतिहास, समझिये वार पलटवार के सियासी मायने

Vanakkam Poorvottar: Himanta Vs Gogoi की राजनीतिक जंग का है पुराना इतिहास, समझिये वार पलटवार के सियासी मायने
असम की राजनीति इस समय सीधे टकराव के मोड में खड़ी है। 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा ने जब यह कहा कि पाकिस्तान का भारत में कोई एसेट नहीं होना चाहिए और कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई को सीधे पाकिस्तान से जुड़ा बताया, तो यह महज बयानबाजी नहीं थी। यह एक सोची समझी राजनीतिक चाल थी, जिसमें राष्ट्रवाद का तीखा तड़का लगाकर विपक्ष को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश की गई। चुनावी मौसम में किया गया यह वार साफ संकेत देता है कि आने वाले महीनों में असम की सियासत बेहद आक्रामक और व्यक्तिगत होने वाली है।
सवाल यह है कि क्या यह हमला केवल चुनावी रणनीति है या पुराने हिसाब चुकता करने की कोशिश। असम की सियासत समझने वाले जानते हैं कि यह टकराव आज का नहीं है। इसकी जड़ें उस दौर में हैं जब सरमा कांग्रेस में थे और स्वर्गीय तरुण गोगोई के नेतृत्व वाली सरकार में ताकतवर मंत्री माने जाते थे। बाद में नेतृत्व को लेकर उठा विवाद, कथित उपेक्षा और हाई कमान की राजनीति ने उन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया। 2015 में उनका भाजपा में जाना और उसके बाद 2016 में सत्ता परिवर्तन ने असम की राजनीति का नक्शा बदल दिया। तब से यह संघर्ष वैचारिक कम, व्यक्तिगत अधिक हो गया।

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अब सरमा ने 2013 की उस पाकिस्तान यात्रा को मुद्दा बनाकर आग में घी डाला है, जिसमें गौरव गोगोई अपनी पत्नी के साथ वहां गए थे। लाहौर, इस्लामाबाद और कराची की यात्रा को लेकर जो सवाल उठाए गए, वह सीधे राष्ट्रद्रोह जैसे गंभीर आरोपों तक पहुंच गए। मुख्यमंत्री का कहना है कि लोकसभा में रक्षा, परमाणु संयंत्र और कश्मीर से जुड़े प्रश्न उस यात्रा से जुड़े हो सकते हैं। उन्होंने विशेष जांच दल की रिपोर्ट केंद्र को सौंप दी और केंद्रीय एजेंसियों से जांच की मांग की।
यहां दो बातें साफ दिखती हैं। पहली यह कि राष्ट्र सुरक्षा का सवाल जितना गंभीर होता है, उसका राजनीतिक इस्तेमाल उतना ही खतरनाक। दूसरी यह कि यदि आरोप इतने ठोस हैं तो जांच और ज्यादा पारदर्शी होनी चाहिए थी। वहीं गौरव गोगोई ने आरोपों को निराधार और हास्यास्पद बताया है। उन्होंने पलटवार करते हुए मुख्यमंत्री के परिवार की कथित जमीन संपत्ति पर सवाल उठाए और कहा कि सत्ता में आने पर वह जमीन गरीबों में बांट दी जायेगी। इस तरह मुद्दा राष्ट्रीय सुरक्षा से हटकर संपत्ति और परिवार तक पहुंच गया।
राजनीतिक विमर्श का स्तर तब और गिरा जब पुरानी घटनाएं फिर उछाली गईं। 2017 का वह प्रसंग, जब राहुल गांधी के कुत्ते को बिस्कुट खिलाने वाली तस्वीर पर सरमा ने तंज कसा था, फिर चर्चा में आ गया। बाद में एक वीडियो को लेकर भाजपा नेताओं ने आरोप लगाया कि राहुल ने असम के नेताओं का अपमान किया था। सरमा ने खुद को गौरवपूर्ण असमी और भारतीय बताते हुए कहा कि वह किसी का बिस्कुट खाने वाले नहीं। इस बयान का संदेश साफ था कि वह अब दिल्ली के दरबार की राजनीति से मुक्त हैं और असम की अस्मिता के रक्षक हैं।
दूसरी ओर, गोगोई ने भी पलटवार में कोई कसर नहीं छोड़ी। उन्होंने मुख्यमंत्री की पत्नी पर सरकारी योजनाओं में लाभ लेने के आरोप लगाए। जवाब में मानहानि का मुकदमा हुआ। अब सरमा ने गोगोई की पत्नी पर पाकिस्तान स्थित संगठन से जुड़े होने का आरोप लगाया है। उनकी विदेशी नागरिकता, वीजा नियम और कथित धन लेनदेन को लेकर सवाल खड़े किए गए। गोगोई ने इसे व्यक्तिगत प्रतिशोध बताया और चुनौती दी कि यदि आरोप सिद्ध न हों तो मुख्यमंत्री इस्तीफा दें।
यह पूरा घटनाक्रम बताता है कि 2026 का चुनाव केवल विकास, रोजगार या बाढ़ प्रबंधन पर नहीं लड़ा जाएगा। यह चुनाव अस्मिता, राष्ट्रवाद और निजी विश्वसनीयता के सवालों पर टिकेगा। सरमा जानते हैं कि राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा भाजपा के लिए मजबूत हथियार है। वह यह भी जानते हैं कि कांग्रेस को रक्षात्मक मुद्रा में लाने का यह असरदार तरीका है। वहीं गोगोई समझते हैं कि यदि वह इस हमले को राजनीतिक बदले की कार्रवाई साबित कर दें तो सहानुभूति हासिल कर सकते हैं।
बहरहाल, असम का मतदाता सब कुछ देख रहा है। एक तरफ वह नेता है जिसने कांग्रेस से विद्रोह कर भाजपा को असम में स्थापित किया। दूसरी तरफ वह चेहरा है जो अपने पिता की विरासत और कांग्रेस की जमीन बचाने की कोशिश में है। 2026 का चुनाव तय करेगा कि असम की जनता किस कहानी पर भरोसा करती है राष्ट्र सुरक्षा की चेतावनी पर या राजनीतिक प्रतिशोध के आरोप पर। इतना तय है कि यह जंग अभी लंबी चलेगी।

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