ब्रज में रंगीली होली महोत्सव की तैयारियां चरम पर पहुँच चुकीं है। मंदिरों में प्राकृतिक वस्तुओं से रंग बनाया जा रहा है। बरसाना धाम में जहां टेसू के फूलों से गीला रंग तैयार किया जा रहा है वहीं वृंदावन स्थित बांके बिहारी मंदिर में कश्मीरी केसर,कन्नौजी इत्र,कर्नाटकी चंदन और हाथरसी गुलाल से होली खेलने की तैयारी की जा रही है। मंदिरों में पुजारी और सेवायत परिवार से जुड़े लोग होली के रसिया गाते हुए रंग तैयार कर रहे हैं। श्री जी मंदिर में बन रहा रंग ब्रज के मंदिरों में होली पर प्राकृतिक वस्तुओं से बने रंग से होली खेलने की प्रथा है। यही बजह है कि अधिकतर प्रमुख मंदिरों में गीला रंग टेसू के फूलों से तैयार किया जाता है। बरसाना स्थित श्री जी मंदिर में टेसू के फूलों से गीला रंग तैयार किया जा रहा है। मंदिर की छत पर पिछले 15 दिनों से सेवायत परिवार से जुड़े लोग टेसू के फूलों से रंग बना रहे हैं। यह रंग लट्ठमार होली से लेकर धूल होली तक प्रयोग किया जाएगा। ऐसे तैयार होता है रंग टेसू के फूलों से बनने वाले रंग के लिए सबसे जरूरी है टेसू के फूल। यह फूल मध्य प्रदेश के जंगलों से मंगाए जाते हैं। जिसके बाद इन फूलों को सुखाया जाता है। फूलों को सुखाने के बाद इनको गर्म पानी में डाला जाता है। इस दौरान निश्चित मात्रा में चुना भी डाला जाता है। जिससे रंग खिल सके। पूरे पूरे दिन रंग बनाने की प्रक्रिया चलती रहती है। जिसके बाद इसे ठंडा कर छान कर तैयार रंग को उपयोग के लिए लिया जाता है। इसमें खुशबू के लिए केशर और इत्र का भी प्रयोग करते हैं। काबुली मेवा से लगेगा भगवान को भोग विश्व विख्यात बाँके बिहारी मंदिर में सर्वाधिक जोरशोर से व्यवस्थाएं की जा रहीं हैं। पर्व पर जन जन के आराध्य ठाकुर बाँके बिहारी जी के होली खेलने हेतु तरह तरह के अति उत्तम पदार्थ मँगाए गए हैं। जिनमें खासतौर पर कश्मीरी केसर, कन्नौजिया इत्र, कर्नाटकी चंदन और हाथरस से प्राकृतिक अबीर – गुलाल है। महोत्सव के लिए काबुली मेवा भी मंगाई गई है । जिसका ठाकुरजी को भोग अर्पित किया जाएगा। 2 मार्च तक बांके बिहारी खेलेंगे होली बांके बिहारी मंदिर के सेवायत इतिहासकार आचार्य प्रहलाद बल्लभ गोस्वामी ने बताया बिहारीजी मंदिर में रंगोत्सव 27 फ़रवरी रंगभरी एकादशी से शुरू होगा, जो 2 मार्च चतुर्दशी की रात्रि तक लगातार चलेगा। इस रसीले महोत्सव में ठाकुरजी रंग – ग़ुलाल से होली खेलते हुए अद्भुत आनंद उठाएंगे। उत्सव में भक्तों पर बरसाने के लिए टेसू के फूलों से बना प्राकृतिक रंग तैयार किया जाएगा। मंदिर के परिक्रमा मार्ग स्थित प्राचीन होली कक्ष में इसके लिए विशेष भट्ठी बनाई जा रही हैं। यहां लोहे की बड़ी-बड़ी कढ़ाइयों में टेसू के फूल को उबालकर गुनगुना रंग तैयार किया जाएगा। ये रंग भक्तों को त्वचा संबंधित लाइलाज रोगों से छुटकारा दिलाता है। धुलहेड़ी पर लगेगा चाट,जलेबी का भोग प्रह्लाद बल्लभ गोस्वामी ने बताया कि 2 मार्च तक अनवरत रंगीली होली आयोजन के बाद 3 मार्च को मंदिर में डोलोत्सव (धुलैडी पर्व) मनाया जाएगा। उस दिन भगवान स्वयं होली नहीं खेलेंगे, सिर्फ़ भक्तों को धुलैडी मनाते हुए निहारेंगे। 3 मार्च को चंद्रग्रहण होने के कारण इस बार डोलोत्सव के दर्शन सीमित समय तक ही होंगे। होली महोत्सव के बीच ठाकुरजी को चाट, जलेबी व पकवानों का विशेष भोग लगाया जाएगा। सेवायत के मुताबिक इस चाट में दही बड़ा, दही पकौड़ी, सोंठबड़ा, सोंठ पकौड़ी, आटा – सूजी की टिकिया, पानी पूरी, समोसा, पकोड़े, गुजिया, पापड़ी, खाजा, ठोर, लठोर आदि व्यंजन प्रमुख रुप से शामिल होते हैं। इस मौके पर काजू, बादाम, पिस्ता, अखरोट, पोस्त, खरबूजा के बीज, किसमिस, मुनक्का, गुलकंद, दूध – मलाई युक्त ठंडाई और आलू एवं मैदा की स्वादिष्ट जलेबियां भी ठाकुरजी को अर्पित की जाएंगी। जगमोहन में चांदी के सिंहासन पर विराजमान होंगे बांके बिहारी इतिहासकार आचार्य प्रहलाद वल्लभ गोस्वामी बताते हैं कि पर्व के दौरान बांके बिहारी जी जगमोहन में भव्य सिंहासन पर विराजमान होकर दिव्य दर्शनसुख प्रदान करेंगे। पूर्व वर्षों की भाँति इस बार भी होली महोत्सव में कम से कम एक किलो से अधिक केसर, दो – तीन हजार किलो गुलाल और करीब 25 हजार लीटर पानी में बना टेसू के फूलों का रंग उपयोग किया जाएगा। सुबह 6:15 बजे से होंगे दर्शन 3 मार्च को पड़ने वाले चंद्रग्रहण के चलते भगवान बांके बिहारी जी के दर्शन हेतु निर्धारित मंदिर की समय सारिणी में परिवर्तन किया गया है। उस दिन मंदिर में श्रद्धालुओं को सुबह 6:15 बजे से ठाकुरजी के दर्शन होंगे। सेवायत 5:15 बजे में मंदिर में प्रवेश करेंगे और सुबह 6:25 बजे पर श्रृंगार आरती होगी। फिर 6:30 बजे राजभोग सेवा प्रारंभ होगी। राजभोग आरती 8:30 बजे होगी और 9 बजे मंदिर के पट बंद हो जाएंगे। सेवायत 9 बजे बाहर आ जाएंगे। फिर शाम 7 बजे से मंदिर खुलेगा और रात 10 बजे तक दर्शन हो सकेंगे।


