Imposter Syndrome: क्या आपके भी मन में ऐसा ख्याल आता है कि “मैं यहां डिजर्व नहीं करती। यह भावना सिर्फ पूजा की नहीं है। पूजा एक मल्टीनेशनल कंपनी में सीनियर पोजिशन पर काम करती है, अनुभव भी है और काम की समझ भी। बाहर से वह पूरी तरह आत्मविश्वासी और सफल नजर आती है, लेकिन अंदर ही अंदर वह खुद पर शक करती रहती है। यही मानसिक स्थिति आगे चलकर मेंटल हेल्थ पर गहरा असर डाल सकती है।
इम्पोस्टर सिंड्रोम क्या है?
इस तरह की सोच को साइकोलॉजी में इम्पोस्टर सिंड्रोम कहा जाता है। यह कोई मानसिक बीमारी नहीं है, बल्कि एक मानसिक अवस्था है जिसमें व्यक्ति अपनी सफलता को स्वीकार नहीं कर पाता। उसे लगता है कि उसकी कामयाबी उसकी काबिलियत की वजह से नहीं, बल्कि किस्मत या हालात का नतीजा है। ऐसे लोग हमेशा डर में रहते हैं कि एक दिन सबको “सच” पता चल जाएगा और वे एक्सपोज हो जाएंगे।
इम्पोस्टर सिंड्रोम सेहत के लिए क्यों खतरनाक है?
लगातार खुद पर शक करना सिर्फ दिमाग तक सीमित नहीं रहता। यह तनाव, एंग्जायटी, नींद की कमी और बर्नआउट जैसी समस्याओं को जन्म देता है। व्यक्ति जरूरत से ज्यादा काम करने लगता है, छुट्टी लेने से डरता है और आराम को कमजोरी मानने लगता है। लंबे समय तक ऐसा चलने पर डिप्रेशन, हाई ब्लड प्रेशर और इम्यून सिस्टम कमजोर होने जैसी दिक्कतें भी हो सकती हैं।
इसके आम लक्षण क्या हैं?
- अच्छा काम करने के बाद भी खुद को क्रेडिट न देना
- बार-बार फेल होने का डर
- खुद की तुलना दूसरों से करना
- परफेक्ट बनने का दबाव
- लगातार ओवरवर्क करना
- अपनी सफलता को नकारना और खुद को कम आंकना
किन लोगों में यह ज्यादा देखा जाता है?
इम्पोस्टर सिंड्रोम किसी को भी हो सकता है, लेकिन यह स्टूडेंट्स, प्रोफेशनल्स, वर्किंग वुमन और हाई-अचीवर्स में ज्यादा देखने को मिलता है। जिन लोगों का बचपन बहुत सख्त माहौल में बीता हो या जिन्हें हर वक्त परफॉर्म करने का दबाव रहा हो, उनमें इसका खतरा ज्यादा होता है।
इससे बाहर निकलना क्यों जरूरी है?
अगर समय रहते इस मानसिक स्थिति को नहीं संभाला गया, तो यह व्यक्ति के आत्मविश्वास, काम और रिश्तों तीनों को नुकसान पहुंचा सकती है। लगातार स्ट्रेस शरीर को अंदर से खोखला कर देता है और लाइफस्टाइल से जुड़ी कई बीमारियों का खतरा बढ़ा देता है।
इम्पोस्टर सिंड्रोम से बाहर आने के हेल्दी तरीके
अपने विचारों को पहचानें: जब भी खुद पर शक हो, खुद से पूछें क्या इसके पीछे कोई ठोस सबूत है?
सेल्फ-टॉक अपनाएं: खुद से पॉजिटिव बात करना मानसिक सेहत के लिए जरूरी है।
सफलताओं की लिस्ट बनाएं: अपनी छोटी-बड़ी उपलब्धियां लिखें और उन्हें दोहराएं।
परफेक्शन छोड़ें: गलतियां सीखने का हिस्सा हैं, न कि नाकामी का सबूत।
तुलना से दूरी बनाएं: सोशल मीडिया और ऑफिस की तुलना तनाव बढ़ाती है।
थेरेपी का सहारा लें: CBT जैसी थेरेपी इस स्थिति में काफी असरदार मानी जाती है।
कब एक्सपर्ट की मदद लें?
अगर यह भावना लंबे समय तक बनी रहे, नींद, काम और आत्मविश्वास पर असर डालने लगे, तो इसे नजरअंदाज न करें। किसी साइकोलॉजिस्ट या काउंसलर से बात करना आपकी मानसिक सेहत के लिए एक जरूरी और हेल्दी कदम हो सकता है।


