Durga Puja 2026: कभी कपड़े और बांस से बने पारंपरिक मंडपों तक सीमित रहने वाली पश्चिम बंगाल की दुर्गापूजा आज दुनिया के सबसे बड़े सार्वजनिक कला उत्सवों में छा गई है। पिछले कुछ वर्षों तक जहां पंडालों में बुर्ज खलीफा, डिज्नीलैंड, वेटिकन, अंतरिक्ष अभियान और अत्याधुनिक तकनीक की झलक दिखाई देती थी, वहीं इस बार कोलकाता अपनी सांस्कृतिक जड़ों, ऐतिहासिक स्मृतियों और भारतीय विरासत की छटा बिखर रही है। जानकारों का मानना है कि यह बदलाव न केवल सजावट के साथ साथ सोच का परिवर्तन है। बल्कि पंडाल की नई थीम से दर्शकों को इतिहास, समाज, संस्कृति और पहचान से जोड़ने का प्रयास है। ज्ञात है कि कोलकाता की दुर्गापूजा को दुनिया के सबसे बड़े सार्वजनिक कला आयोजनों में गिना जाता है और यूनेस्को भी इसे मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत के रूप में मान्यता दे चुका है। इस बार यहां भविष्य से अधिक अतीत, चमक-दमक से अधिक संस्कृति और वैश्विक प्रतीकों से अधिक भारतीय विरासत की गूंज सुनाई दे रही है।
1990 के दशक में शुरू हुआ चलन
पश्चिम बंगाल में थीम आधारित दुर्गापूजा का चलन 1990 के दशक में शुरू हुआ था। उस समय कुछ पूजा समितियों ने पंडाल को केवल पूजा स्थल की बजाय कला और विचार की अभिव्यक्ति का माध्यम बनाना शुरू किया। धीरे-धीरे यह प्रयोग इतना लोकप्रिय हुआ कि आज थीम ही किसी बड़े पंडाल की पहचान बन चुकी है। पिछले कुछ सालों में थीम पूजा का स्वरूप तेजी से बदला है। प्रारंभिक दौर में ऐतिहासिक स्मारकों और मंदिरों की प्रतिकृतियां प्रमुख थीं। इसके बाद सामाजिक संदेशों का दौर आया। पर्यावरण संरक्षण, महिला सशक्तिकरण, ग्रामीण जीवन, लोककला, जलवायु परिवर्तन, प्रवासी मजदूरों की पीड़ा और तकनीक से जुड़ी विषयवस्तु पंडालों में दिखाई देने लगी। लेकिन प्रदेश में सत्ता परिर्वतन के बाद इस साल दुर्गा पूजा की थीम में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। अधिकांश प्रमुख पूजा समितियों के पंडालों में विरासत, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक स्मृतियों को संजो लिया है। पंडालों में राष्ट्रवाद और सनातन संस्कृति की झलक भी साफ दिखाई दे रही है।
हवामहल और वंदे मातरम् छोड़ रहे छाप
इस वर्ष सबसे अधिक चर्चा श्रीभूमि स्पोर्टिंग क्लब की है। पिछले वर्षों में बुर्ज खलीफा, डिज्नीलैंड और अक्षरधाम जैसी चर्चित प्रतिकृतियां बनाने वाली यह पूजा समिति ने इस बार राजस्थान के प्रसिद्ध हवामहल की थीम को साकार रूप दिया है। हवामहल की विशिष्ट स्थापत्य शैली और उसके सैकड़ों झरोखे इस पंडाल का मुख्य आकर्षण है। दक्षिण कोलकाता की प्रतिष्ठित एकडालिया एवरग्रीन पूजा समिति ने गुजरात के प्रसिद्ध सोमनाथ मंदिर को अपनी थीम बनाया है। अपनी पारंपरिक प्रतिमा शैली के लिए प्रसिद्ध यह पूजा हर वर्ष किसी ऐतिहासिक या धार्मिक स्थापत्य को नए रूप में प्रस्तुत करती है। शहर के संतोष मित्र स्क्वायर पर इस बार ‘सनातनी चेतनाय वंदे मातरम्’ थीम दर्शकों पर गहरी छाप छो़ड़ रही है। वंदे मातरम् के 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर स्वतंत्रता आंदोलन और राष्ट्रीय चेतना को प्रकाश, ध्वनि तथा कलात्मक इंस्टॉलेशन के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है। अलीपुर सार्वजनीन दुर्गोत्सव समिति ने रामायण को अपनी थीम बनाया है। पूरी कथा को कलात्मक चित्रांकन और स्थापत्य के माध्यम से दर्शाया है।
दशावतार से ‘अंतर्लीन’ तक, दिखेगी अनूठी कला
अगरपाड़ा तारापुकुर आदि सार्वजनिन दुर्गोत्सव की 2026 की थीम ‘दशम अवतार’ है। यहां भगवान विष्णु के दस अवतारों को पंडाल की कला और सज्जा के जरिए प्रस्तुत किया गया है। मीन, कूर्म, वराह, नरसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध और कल्कि अवतारों से जुड़ी पौराणिक कथाओं और कलात्मक रूपों को मंडप में उकेरा गया है। पंडाल के समीप जलाशय के पानी पर प्रकाश-चित्रों के माध्यम से विष्णु के दस अवतारों के दृश्य दिखाने की भी व्यवस्था की गई है। दक्षिण कोलकाता के बैष्णवघाटा पाटुली उपनगरी सार्वजनिन दुर्गोत्सव की इस वर्ष की थीम ‘अंतर्लीन’ है। कलाकार पार्थ ज्वारदार की परिकल्पना में तैयार इस पंडाल में मिट्टी की परतों के भीतर दबे एक विस्मृत सभ्यता के इतिहास को कलात्मक रूप दिया गया है। सभ्यता के जन्म, विकास और समय के साथ उसके विलुप्त होने की कहानी को माटी की परतों, टूटे स्थापत्य और विभिन्न कलारूपों के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है। पंडाल का अनुभव किसी पुरातात्विक उत्खनन स्थल जैसा बनाया गया है। इसी कलात्मक यात्रा के केंद्र में देवी दुर्गा को सृजन, पुनर्जन्म और नवजागरण के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

