नागौर: जयपुर में पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई और आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के नेटवर्क से जुड़ी महिला आतंकी की गिरफ्तारी के करीब 50 दिन बीत जाने के बाद भी सीमावर्ती क्षेत्रों और आसपास के जिलों में डिजिटल निगरानी तंत्र को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। जयपुर और पश्चिम बंगाल में सामने आए हालिया मामलों ने यह साफ कर दिया है कि विदेशी हैंडलर्स सोशल मीडिया और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स के जरिए महिलाओं को निशाना बनाकर देश विरोधी साजिश रच रहे हैं। इसके बावजूद नागौर जिले में साइबर और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर निगरानी का कोई प्रभावी और सक्रिय तंत्र नजर नहीं आ रहा है।
जयपुर से बंगाल तक फैला संदिग्ध नेटवर्क
राजस्थान एटीएस ने जयपुर से बबीता धाकड़ उर्फ ‘खदीजा’ को गिरफ्तार किया था। जांच में सामने आया कि बबीता सोशल मीडिया के माध्यम से पाकिस्तानी कट्टरपंथी हैंडलर्स के संपर्क में आई, जहां उसका धर्म परिवर्तन कराया गया। वह फिदायीन बनने की ऑनलाइन ट्रेनिंग ले रही थी और संवेदनशील व खुफिया जानकारियां सरहद पार भेज रही थी। एटीएस ने उस पर यूएपीए के तहत कार्रवाई कर न्यायिक हिरासत में भेजा है।

इसी कड़ी में पश्चिम बंगाल पुलिस की स्पेशल टास्क फोर्स ने झारखंड के साहिबगंज से अर्पिता सरकार नामक महिला को दबोचा। अर्पिता संदिग्ध आतंकी हमीम मंडल के संपर्क में थी और संगठित नेटवर्क के लिए ‘हनीट्रैप’ के जरिए प्रभावशाली लोगों को फंसाने का काम कर रही थी।
नागौर में क्यों बढ़ी चिंता?
जयपुर और बंगाल के इन मामलों में सबसे साझा और खतरनाक पहलू डिजिटल माध्यमों (सोशल मीडिया, मैसेजिंग एप्स) का इस्तेमाल है। आज हर आयु वर्ग का व्यक्ति सोशल मीडिया पर सक्रिय है। नागौर में भी विदेशी नंबरों या फर्जी पहचान वाले सोशल मीडिया खातों से स्थानीय महिलाओं और युवतियों से संपर्क साधे जाने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
इसके अलावा, ऑनलाइन गेमिंग एप्स भी सुरक्षा एजेंसियों के लिए नई चुनौती बनकर उभरे हैं। ‘याला’ जैसे लूडो और वॉइस-चैट गेमिंग प्लेटफॉर्म्स पर भारतीय और पाकिस्तानी नागरिक एक साथ जुड़ते हैं। हालांकि, गेम खेलना अपने आप में संदिग्ध नहीं है, लेकिन ऐसे अनरजिस्टर्ड और बिना सख्त मॉडरेशन वाले प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल युवाओं को बरगलाने और नेटवर्क विस्तार के लिए किए जाने की पूरी आशंका बनी रहती है।

नागौर में साइबर तंत्र सुस्त
नागौर में फिलहाल ऐसा कोई स्वचालित या एक्टिव सर्विलांस सिस्टम नहीं है, जो सोशल मीडिया पर चल रही संदिग्ध गतिविधियों या विदेशी संपर्कों की पहचान कर सके। जब तक कोई पीड़ित खुद शिकायत लेकर पुलिस तक नहीं पहुंचता, तब तक पुलिस या साइबर टीम के लिए ऐसी गतिविधियों को ट्रैक करना नामुमकिन जैसा है।
क्या कहना है अधिकारियों का
साइबर सेल के पास इस तरह की गतिविधियों पर स्वतः निगरानी रखने का कोई व्यापक तंत्र नहीं है। जब कोई पीड़ित शिकायत लेकर हमारे पास आता है, तो उसके आधार पर साइबर एक्सपर्ट्स जांच करते हैं और नियमानुसार कार्रवाई की जाती है।
-धर्मचंद पूनिया, पुलिस उपाधीक्षक, साइबर सेल, नागौर

सुरक्षा विशेषज्ञों की सलाह
विशेषज्ञों का मानना है कि बदलती सुरक्षा प्राथमिकताओं को देखते हुए जिला स्तर पर भी सोशल मीडिया मॉनिटरिंग सेल को मजबूत करना अनिवार्य है। जब तक फर्जी प्रोफाइल, संदिग्ध विदेशी नंबरों और ऑनलाइन गेमिंग के वॉइस-चैट रूम्स पर पुलिस की पैनी नजर नहीं होगी, तब तक स्लीपर सेल और हनीट्रैप के इस डिजिटल जाल को तोड़ना मुश्किल होगा।


