सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक फैसला सुनाते हुए कहा कि सेशंस कोर्ट हत्या के दोषी को पूरी जिंदगी जेल में रखने का आदेश नहीं दे सकते। उम्रकैद का मतलब दोषी की बाकी जिंदगी जेल हो सकता है, लेकिन सेशंस कोर्ट वैधानिक माफी और सजा कम करने के अधिकार खत्म नहीं कर सकता। यह फैसला पंजाब के लुधियाना में दिसंबर 2009 में एक महिला और उसकी दो नाबालिग बेटियों की हत्या के मामले में आया। मामला जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच में था। सुप्रीम कोर्ट ने दोषसिद्धि बरकरार रखते हुए दोनों दोषियों की सजा बदलकर 25 साल की कैद कर दी है। मामला नवल किशोर और एक और दोषी की अपील से जुड़ा था। दोनों पर लुधियाना में एक महिला पिंकी, उसकी 8 साल की बेटी दिव्या और 5 साल की बेटी पूजा की हत्या का आरोप था। मुख्य सवाल यह था कि क्या ट्रायल कोर्ट IPC की धारा 302 के तहत उम्रकैद देते समय दोषी को आखिरी सांस तक जेल में रखने का आदेश दे सकता है। ऐसा आदेश मिलने पर वैधानिक माफी और सजा में कमी का लाभ नहीं मिलता। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी बेंच ने पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि उम्रकैद दोषी की बाकी जिंदगी तक जेल हो सकती है। लेकिन वैधानिक माफी और सजा कम करने की शक्तियों को सेशंस कोर्ट सीमित नहीं कर सकता। कोर्ट ने कहा कि बिना माफी वाली उम्रकैद की विशेष श्रेणी की सजा देने का अधिकार संवैधानिक अदालतों के पास है। यह अधिकार सेशंस कोर्ट के पास नहीं है। बेंच ने यह भी कहा कि CrPC के तहत माफी देने और सजा कम करने की शक्ति को सेशंस कोर्ट खत्म नहीं कर सकता। सेशंस कोर्ट का यह निर्देश कि दोषी की उम्रकैद प्राकृतिक जीवन के अंत तक जारी रहेगी, वैधानिक व्यवस्था के खिलाफ है। ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट का फैसला ट्रायल कोर्ट ने 2014 के फैसले में दोनों आरोपियों को दोषी ठहराया था। उन्हें उम्रकैद की कठोर सजा दी गई थी। ट्रायल कोर्ट ने दोनों को पूरी जिंदगी जेल में रहने का आदेश दिया था। इसके अलावा, दोनों पर 2,500 रुपए का जुर्माना भी लगाया गया था। पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने 12 दिसंबर 2022 को उनकी अपील खारिज कर दी थी। हाईकोर्ट ने दोषसिद्धि और सजा, दोनों को बरकरार रखा था। सुप्रीम कोर्ट ने भी IPC की धारा 302 के तहत दोनों अपीलकर्ताओं की दोषसिद्धि बरकरार रखी। हालांकि, कोर्ट ने उनकी सजा में बदलाव किया। 25 साल की कठोर कैद, वैधानिक माफी नहीं सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट IPC की धारा 302 और धारा 34 के तहत उम्रकैद देने में सक्षम था। लेकिन वह दोनों दोषियों को पूरी जिंदगी जेल में रखने की विशेष श्रेणी की सजा नहीं दे सकता था। कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें दोनों को जीवनभर जेल में रखने का निर्देश दिया गया था। इसके बदले दोनों दोषियों को 25 साल की कठोर कैद की सजा दी गई। इस अवधि में किसी भी वैधानिक माफी का लाभ नहीं मिलेगा। कोर्ट के सामने अंतिम मुख्य सवाल यही था कि क्या ट्रायल कोर्ट IPC की धारा 302 के तहत उम्रकैद के साथ दोषियों को प्राकृतिक जीवन के अंत तक जेल में रखने का आदेश दे सकता है।
सुप्रीम कोर्ट बोला- निचली अदालतें उम्रकैद को बदल नहीं सकती:हत्या के केस में 25 साल की सजा तय की, वैधानिक रियायत नहीं मिलेगी

