जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने मंगलवार को प्रस्तावित यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) को लेकर केंद्र सरकार के रवैये की कड़ी आलोचना की। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि राष्ट्रीय महत्व वाले किसी भी कानून पर संसद में बहस होनी चाहिए और उसे वहीं पास किया जाना चाहिए, न कि अलग-अलग राज्यों के ज़रिए चुनिंदा तौर पर लागू किया जाना चाहिए। यहाँ पत्रकारों से बात करते हुए अब्दुल्ला ने कहा कि अगर BJP के नेतृत्व वाली सरकार के पास UCC पास करने के लिए सच में ज़रूरी संख्या बल है, तो उसे BJP-शासित राज्यों में “प्रयोग” करने के बजाय संसद के सामने इसका ड्राफ़्ट पेश करना चाहिए। उन्होंने तर्क दिया कि पूरे देश में एक समान रूप से लागू होने वाले कानून को टुकड़ों-टुकड़ों में पेश नहीं किया जा सकता।
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अब्दुल्ला के मुताबिक, सरकार की रणनीति से यह सवाल उठता है कि क्या NDA में उसके सहयोगी दल भी इस कदम का पूरी तरह समर्थन करते हैं। उन्होंने कहा कि अगर उनके अपने ही लोग इसके लिए तैयार नहीं हैं, तो वे कैसे कह सकते हैं कि इसे पूरे देश में लागू किया जाना चाहिए?” उन्होंने आगे कहा कि जो कानून सिर्फ़ BJP-शासित राज्यों में लागू हो, उसे “एकसमान” नहीं कहा जा सकता, क्योंकि कई राज्य और केंद्र-शासित प्रदेश ऐसे हैं जहाँ BJP की सरकार नहीं है। अब्दुल्ला ने फिर कहा कि सिर्फ़ संसद ही पूरे देश का प्रतिनिधित्व करती है और इसलिए, यूसीसी पर अंतिम फ़ैसला उसे ही लेना चाहिए। उनके ये बयान उत्तराखंड के UCC का अपना वर्शन पास और नोटिफ़ाई करने वाला पहला राज्य बनने के एक दिन बाद आए।
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उन्होंने कहा कि राज्य ऐसे कानून बना सकते हैं, लेकिन ऐसे फ़ैसले तब तक अस्थायी रहते हैं जब तक संसद कोई राष्ट्रीय ढांचा तैयार न कर ले। उन्होंने कहा, “जब तक देश के लिए कोई कानून नहीं बन जाता, तब तक उन्हें जो करना है करने दें। आख़िरकार, संसद ही इस पर फ़ैसला करेगी, न कि अलग-अलग केंद्र शासित प्रदेश या राज्य। उन्होंने झारखंड में हो रही गतिविधियों का भी संक्षेप में ज़िक्र किया, जहाँ राज्य सरकार ने हाल ही में घोषणा की है कि वह UCC के असर का अध्ययन करेगी और कोई भी रुख अपनाने से पहले कानूनी विशेषज्ञों से सलाह लेगी। यह कदम राजनीतिक तनाव के बीच उठाया गया है, जिसमें विपक्षी पार्टियाँ केंद्र पर UCC बहस का इस्तेमाल गैर-बीजेपी राज्यों पर दबाव बनाने के लिए करने का आरोप लगा रही हैं। अब्दुल्ला ने कहा कि राज्यों में इस तरह की उलझन से उनकी यह बात और पुख्ता होती है कि इस मामले को अलग-अलग राज्यों के फैसलों के बजाय राष्ट्रीय स्तर पर सुलझाया जाना चाहिए।

