शिवसेना किसकी? उद्धव की एक ‘चूक’ पड़ सकती है भारी, शिंदे के वकील के दावे से मामले में नया मोड़

शिवसेना किसकी? उद्धव की एक ‘चूक’ पड़ सकती है भारी, शिंदे के वकील के दावे से मामले में नया मोड़

Uddhav Thackeray Vs Eknath Shinde: शिवसेना के नाम और चुनाव चिन्ह को लेकर चल रहा कानूनी विवाद एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। मामले में अब शिवसेना के शिंदे गुट की ओर से वरिष्ठ वकील कौल ने अपना पक्ष रखना शुरू किया है। सुनवाई के दौरान उन्होंने 2018 में शिवसेना के संगठनात्मक ढांचे और पार्टी संविधान में हुए बदलावों को लेकर ठाकरे गुट पर कई सवाल उठाए।

शिंदे गुट के वकील ने दावा किया कि 2018 में पार्टी संगठन में जिन लोगों की नियुक्तियां की गई थीं, उनमें से कई लोग चुनाव के जरिए निर्वाचित होकर नहीं आए थे। उन्होंने पार्टी के संविधान में उस दौरान किए गए बदलावों पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि इस मामले में कई महत्वपूर्ण दस्तावेज अदालत के सामने रखे जाने हैं।

‘पार्टी में एकाधिकारशाही थी, इसलिए आवाज नहीं उठा सकते थे’

सुप्रीम कोर्ट में दलील के दौरान कौल ने ठाकरे गुट के वकील कपिल सिब्बल की दलीलों का भी उल्लेख किया। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर चुनाव में पैसों का इस्तेमाल होता है, तो क्या पार्टी के भीतर पद हासिल करने के लिए भी इसका इस्तेमाल नहीं हो सकता?

कौल ने दावा किया कि पार्टी में एकाधिकारशाही का माहौल था और इसी वजह से कई लोग अपनी आवाज नहीं उठा पा रहे थे। उन्होंने कहा कि इसी परिस्थिति में कई लोग एकजुट हुए।

चुनाव आयोग के फैसले का भी किया बचाव

शिंदे गुट के वकील ने शिवसेना के नाम और चुनाव चिन्ह को लेकर चुनाव आयोग के फैसले का बचाव करते हुए कहा कि आयोग ने किसी जल्दबाजी में एक रात में फैसला नहीं लिया था। उनके मुताबिक, फैसला लेने से पहले चुनाव आयोग ने बैठकें कीं और संबंधित पक्षों की दलीलें सुनीं।

उन्होंने कहा कि उस दौरान उद्धव ठाकरे भी अलग-अलग मौकों पर अदालत और चुनाव आयोग के सामने गए थे तथा शिंदे गुट की ओर से उठाए गए मुद्दों को भी सुना गया था।

कौल ने ठाकरे गुट की उस दलील पर भी सवाल उठाया, जिसमें चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र को चुनौती दी जा रही है। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग को इस मामले में फैसला लेने का अधिकार है और सुप्रीम कोर्ट भी पहले इस अधिकार को मान्यता दे चुका है।

2018 में पार्टी संविधान में बदलाव का मुद्दा

शिंदे गुट के वकील ने अदालत में कहा कि शिवसेना की स्थापना 1966 में हुई थी और बाद में पार्टी को चुनाव चिन्ह मिला। उनके मुताबिक, किसी भी राजनीतिक दल का संविधान लोकतांत्रिक होना चाहिए।

उन्होंने आरोप लगाया कि 2018 में शिवसेना के पार्टी संविधान में अचानक बदलाव किए गए। अब सवाल यह है कि चुनाव आयोग इन बदलावों को किस आधार पर मान्यता देगा।

कौल ने अदालत को बताया कि शिंदे गुट कुछ दस्तावेज भी पेश करना चाहता है। इन दस्तावेजों के जरिए वह 2018 में पार्टी संगठन और संविधान में हुए बदलावों से जुड़े अपने दावों को अदालत के सामने रखना चाहता है।

क्या ठाकरे गुट की बढ़ेंगी मुश्किलें?

सुप्रीम कोर्ट में चल रही इस सुनवाई को शिवसेना के दोनों गुटों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। शिंदे गुट की ओर से 2018 के पार्टी संविधान और संगठनात्मक नियुक्तियों को लेकर उठाए गए सवाल अब मामले की सुनवाई में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

हालांकि, अंतिम फैसला सुप्रीम कोर्ट को करना है और फिलहाल अदालत में दोनों पक्षों की दलीलें सुनी जा रही हैं। इसलिए शिंदे गुट के दावों को अदालत द्वारा स्वीकार किया गया निष्कर्ष मानना जल्दबाजी होगी।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *