मेंटल हेल्थ– त्योहार आते ही बढ़ता डर और बेचैनी:बचपन का ट्रॉमा ट्रिगर हो जाता है, घर जाने का मन नहीं करता, खुशी कैसे महसूस करूं

मेंटल हेल्थ– त्योहार आते ही बढ़ता डर और बेचैनी:बचपन का ट्रॉमा ट्रिगर हो जाता है, घर जाने का मन नहीं करता, खुशी कैसे महसूस करूं

सवाल– मैं 28 साल का हूं और रांची में नौकरी करता हूं। बचपन में मेरे पिता शराब पीकर घर में झगड़ा करते थे। त्योहारों के समय यह सब और बढ़ जाता था। कभी मां रोती तो कभी रिश्तेदारों के सामने परिवार की बेइज्जती होती। अब मैं आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हूं और घर से दूर रहता हूं। इसके बावजूद दशहरा या दिवाली आते ही मेरी नींद खराब होने लगती है। ऑफिस में छुट्टी मंजूर होने के बाद भी घर जाने का मन नहीं करता। घर जाने की कल्पना से ही पुरानी घटनाएं याद आने लगती हैं। क्या बचपन के बुरे अनुभव कई साल बाद भी त्योहारों के दौरान बेचैनी पैदा कर सकते हैं? मैं इस स्थिति को कैसे संभालूं? एक्सपर्ट– डॉ. द्रोण शर्मा, कंसल्टेंट साइकेट्रिस्ट, आयरलैंड, यूके। यूके, आयरिश और जिब्राल्टर मेडिकल काउंसिल के मेंबर। सवाल पूछने के लिए शुक्रिया। यह बात सही है कि बचपन के बुरे अनुभवों का असर कई साल बाद भी दिखाई दे सकता है। आपके मामले में यह समझना जरूरी है कि त्योहारों के नजदीक आते ही आपकी बेचैनी क्यों बढ़ने लगती है। आपने बचपन में घर के भीतर झगड़े, मां का रोना और रिश्तेदारों के सामने अपमान जैसी परिस्थितियां देखी हैं। ऐसे अनुभव किसी बच्चे के मन में डर, असुरक्षा और बेबसी की भावना पैदा कर सकते हैं। बचपन में त्योहार आपके लिए खुशी के बजाय तनाव और अनिश्चितता का समय रहे होंगे। अब जब दशहरा या दिवाली आती है, तो घर जाने की तैयारी, छुट्टियां या पुरानी यादें अनजाने में वही डर जगा सकती हैं। भले ही आज आप आत्मनिर्भर हैं और अपनी जिंदगी के फैसले खुद ले सकते हैं, लेकिन पुरानी घटनाओं से जुड़ी भावनाएं फिर भी उभर सकती हैं। क्या ये PTSD है? आपको कई बार ऐसा महसूस हो सकता है कि कुछ बुरा होने वाला है, जबकि मौजूदा परिस्थितियां बचपन से बिल्कुल अलग हैं। यह आपके पुराने अनुभवों का असर हो सकता है। इसका मतलब यह नहीं कि आप कमजोर हैं या इतने साल बाद भी अतीत से बाहर नहीं निकल पाए हैं। आपके लक्षणों को देखते हुए पोस्ट ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (PTSD) या ट्रॉमा से जुड़ी किसी दूसरी परेशानी की संभावना पर विचार किया जा सकता है। लेकिन यहां ये समझना जरूरी है कि सिर्फ इन लक्षणों के आधार पर PTSD डायग्नोस नहीं किया जा सकता। इसके लिए यह समझना जरूरी है कि पुरानी घटनाएं आपको किस तरह प्रभावित कर रही हैं और आपकी नींद, कामकाज और रोजमर्रा की जिंदगी पर उसका कितना असर पड़ रहा है। PTSD सेल्फ एसेसमेंट टेस्ट खुद से पूछें ये 8 सवाल आप जिस मन:स्थिति से गुजर रहे हैं, वह PTSD है या नहीं, इसे समझने के लिए आप एक सेल्फ एसेसमेंट टेस्ट कर सकते हैं। अपने पिछले एक महीने के अनुभवों पर गौर करें और नीचे दिए सवालों का हां या ना में जवाब दें। यह देखने कि कोशिश करें कि खासकर त्योहारों के आसपास आपकी भावनाओं, नींद और व्यवहार में क्या बदलाव होते हैं। PTSD सेल्फ एसेसमेंट टेस्ट के सवाल 1. क्या बचपन की बुरी घटनाएं बार-बार याद आती हैं, जबकि आप उन्हें याद नहीं करना चाहते? क्या उनसे जुड़े बुरे सपने आते हैं? 2. क्या आप उन बातों, लोगों या जगहों से बचने लगते हैं, जो आपको पुराने अनुभव याद दिलाते हैं? 3. क्या घर जाने या त्योहार मनाने के बारे में सोचते ही घबराहट होती है, दिल की धड़कन बढ़ती है या शरीर में तनाव महसूस होता है? 4. क्या आप हमेशा सतर्क रहते हैं, जैसे कभी भी कुछ बुरा हो सकता है? 5. क्या आपकी नींद खराब रहती है या अचानक कोई आवाज सुनकर आप बहुत ज्यादा चौंक जाते हैं? 6. क्या परिवार या अपने अतीत के बारे में सोचकर गुस्सा, शर्म या खुद को दोष देने की भावना आती है? 7. क्या त्योहारों के नजदीक आते ही आपका मन उदास या बेचैन रहने लगता है? 8. क्या इन परेशानियों के कारण आप घर जाना टालते हैं, छुट्टियों के कार्यक्रम बदलते हैं या लोगों से मिलना-जुलना कम कर देते हैं? इन सवालों के जवाबों को कैसे समझें? पहले 5 सवालों के जवाब PTSD के संभावित लक्षणों को समझने में मदद करते हैं। PC-PTSD-5 एक मान्य स्क्रीनिंग टेस्ट है। इसका इस्तेमाल यह पता लगाने के लिए किया जाता है कि किसी व्यक्ति में PTSD की आशंका है या नहीं। ये स्क्रीनिंग टेस्ट बीमारी की पुष्टि नहीं करता। अगर आपके जवाबों से PTSD की आशंका लगती है, तो मनोचिकित्सक विस्तार से बात करके स्थिति का आकलन करते हैं। यहां पर तीन तरह के लक्षणों पर खास ध्यान देने की जरूरत है– इंट्रूजन (Intrusion): पुरानी दर्दनाक घटनाओं की यादें बार-बार आना, बुरे सपने आना या ऐसा महसूस होना, जैसे वह घटना फिर से हो रही है। अवॉइडेंस (Avoidance): उन लोगों, जगहों, बातचीत या परिस्थितियों से बचना, जो पुरानी घटनाओं की याद दिलाते हैं। हाइटेंड थ्रेट (Heightened threat): लगातार खतरा महसूस करना, जरूरत से ज्यादा सतर्क रहना या छोटी-छोटी आवाजों से भी चौंक जाना। सेल्फ हेल्प के टूल्स कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी से मदद आपके लिए कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी (CBT) मददगार हो सकती है। यह एक तरह का मनोवैज्ञानिक टूल है, जिसमें आप अपने विचारों, भावनाओं और व्यवहार के बीच संबंध को समझना सीखते हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि आपको पुरानी घटनाएं भूल जानी हैं या अपने डर को जबरन दबाना है। इसके बजाय, आप धीरे-धीरे यह समझना सीख सकते हैं कि अतीत में जो हुआ था और आज आपके सामने जो परिस्थितियां हैं, उनमें क्या फर्क है। इसके लिए आप ये कदम उठा सकते हैं– 1. अपने डर को समझें त्योहारों के बारे में सोचकर बेचैनी होने पर इन बातों पर ध्यान दें: क्या हुआ: दिवाली की छुट्टी मंजूर हुई और घर जाने का खयाल आया। मन में क्या विचार आया: घर गया तो फिर वही झगड़े होंगे। कैसा महसूस हुआ: डर, घबराहट या तनाव महसूस हुआ। आपने क्या किया: टिकट कराने या घर जाने की योजना बनाने से बचने लगे। अब खुद से दो सवाल पूछें: 2. अतीत और वर्तमान में फर्क करना सीखें जब घर जाने के बारे में सोचकर डर लगे, तो खुद को इन बातों की याद दिलाएं: तब और अब में फर्क है: बचपन में आप परिस्थितियों को बदल नहीं सकते थे, लेकिन आज अपने फैसले खुद ले सकते हैं। आपके पास विकल्प हैं: जरूरत पड़ने पर घर से वापस आ सकते हैं या कहीं और ठहर सकते हैं। मदद ले सकते हैं: किसी भरोसेमंद दोस्त या रिश्तेदार को अपनी परेशानी बता सकते हैं। अपनी सुविधा को प्राथमिकता दें: घर जाने, वहां रुकने की अवधि और वापस आने का फैसला अपनी जरूरत के अनुसार लें। खुद से कहें: “बचपन में मेरे पास विकल्प कम थे, लेकिन आज मैं अपनी सुरक्षा और सुविधा के अनुसार फैसले ले सकता हूं।” 3. डर से निपटने के लिए छोटे कदम उठाएं त्योहारों से जुड़ी चीजें परेशान करती हैं, तो एकदम से सबका सामना करने के बजाय धीरे-धीरे शुरुआत करें। पहला कदम: घर पर अपनी पसंद से त्योहार की सजावट करें या कोई पसंदीदा पकवान बनाएं। दूसरा कदम: परिवार से फोन पर बात करें और देखें कि आपको कैसा महसूस होता है। तीसरा कदम: सहज महसूस हो, तो परिवार से कुछ घंटों के लिए मिलने जाने पर विचार करें। हर कदम पर खुद को समय दें: अपनी भावनाओं पर ध्यान दें। बेचैनी बढ़े, तो थोड़ा रुकें और जरूरत के अनुसार आगे बढ़ें। 4. त्योहारों से जुड़ी नई यादें बनाएं हो सकता है कि बचपन में त्योहार आपके लिए तनाव का समय रहे हों। लेकिन अब आप अपनी पसंद से इन्हें मनाने के तरीके चुन सकते हैं, जैसेकि– 5. नींद और दिनचर्या का ध्यान रखें आपने बताया कि त्योहारों के नजदीक आते ही आपकी नींद खराब होने लगती है। इस बदलाव पर ध्यान देना जरूरी है। इसलिए– क्या त्योहार मनाने के लिए घर जाना जरूरी है? नहीं। आपको हर हाल में घर जाकर दिवाली मनाने की जरूरत नहीं है। असल बात यह है कि आप फैसला डर या अपराधबोध से नहीं, बल्कि अपनी इच्छा, पसंद और मौजूदा परिस्थितियों के अनुसार करें। सेल्फ हेल्प की ग्राउंडिंग टेक्नीक जब भी किसी बात से बहुत ज्यादा घबराहट हो तो ग्राउंडिंग टेक्नीक अपनाएं। इससे बेचैनी के समय अपने आसपास की चीजों पर ध्यान केंद्रित करने में मदद मिलती है। प्रोसेस नीचे ग्राफिक में देखें– प्रोफेशनल हेल्प कब जरूरी? अगर पुरानी घटनाओं की यादें बार-बार परेशान कर रही हैं, बुरे सपने आते हैं, घर जाने के खयाल से घबराहट होती है या नींद और मनोदशा लगातार खराब रहती है, तो विशेषज्ञ से सलाह लें। अंतिम बात आखिर में, मैं आपसे यही कहना चाहूंगा कि बचपन के अनुभवों का असर लंबे समय तक रह सकता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि आपको हमेशा उसी डर के साथ जीना होगा। सही उपचार और सहयोग से आप अपनी भावनाओं को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं और बेहतर महसूस कर सकते हैं। हमारा मकसद अतीत को मिटाना नहीं, बल्कि यह सीखना है कि आज की जिंदगी को उसके असर से कैसे मुक्त रखा जाए और कैसे बेहतर जिंदगी जी जाए। …………………. ग्राफिक- महेंद्र वर्मा ……………………. यह खबर भी पढ़ें…. मेंटल-हेल्थ- शादी के 1 साल बाद बेटी विधवा हो गई:उसके दुख में अब मैं करवा चौथ की खुशी कैसे मनाऊं, उसका दिल टूटेगा मैं आपकी पीड़ा समझ सकता हूं। बेटी के पति की अचानक मौत ने पूरे परिवार को गहरे दुख में डाल दिया है। ये एक बहुत बड़ा साइकोलॉजिकल शॉक है। एक मां होने के नाते आपका मन अपनी बेटी के दुख से जुड़ा हुआ है। पूरी खबर पढ़ें…

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