मायावती की अस्थियों को भी खुद से दूर नहीं रखे जाने की वसीयत लिख गए हैं कांशी राम

मायावती की अस्थियों को भी खुद से दूर नहीं रखे जाने की वसीयत लिख गए हैं कांशी राम

राजनीतिक भागीदारी सुनिश्चित करने के उद्देश्य से बसपा ने अस्तित्व में आते ही चुनावी लड़ाई में हाथ आजमाना शुरू कर दिया था। जिस साल (1984) पार्टी बनी, उसी साल मायावती और कांशी राम ने लोक सभा चुनाव में अपनी उम्मीदवारी रख दी थी। उस चुनाव में पार्टी को देश भर से 10.05 लाख वोट मिले थे। मायवाती कैराना (जिला मुजफ्फरनगर, पश्चिमी उत्तर प्रदेश) और कांशी राम जांजगीर (तब मध्य प्रदेश, अब छत्तीसगढ़ में) से उम्मीदवार थे। उस समय बसपा को चुनाव आयोग से मान्यता नहीं मिली थी। लिहाजा दोनों ने पार्टी के समर्थन से निर्दलीय चुनाव लड़ा था। मायावती 44,445 वोट लाकर तीसरे नंबर पर (कांग्रेस और लोक दल के बाद) रही थीं और कांशी राम ने भी नौ फीसदी वोट लाकर अच्छी दस्तक दी थी। फिर 1985 में बसपा ने पंजाब में विधान सभा चुनाव लड़ा। वैसे इस चुनाव में भी पार्टी जीत नहीं सकी, लेकिन इसने कांग्रेस के करीब 24 फीसदी वोट काट लिए। पार्टी 30 सीटों पर लड़ी थी। इनमें से नौ पर उसकी जीत हुई थी।

1987 में जब पहली बार हाथी के चुनाव चिह्न पर मायावती ने हरिद्वार से उपचुनाव लड़ा तो रामविलास पासवान की जमानत जब्त करवा दी। इसी चुनाव के बाद पासवान ने यूपी से कभी चुनाव नहीं लड़ने का फैसला कर लिया था। यहां से बीएसपी के लिए चुनावी कामयाबी की शुरुआत हो गई थी। 1988, 1989 और 1990 इस लिहाज से पार्टी के लिए अहम साल रहे।

1989 में जब अमिताभ बच्चन ने इस्तीफा दिया तो इलाहाबाद (अब प्रयागराज) लोक सभा सीट पर उचुनाव कराया गया। यह उपचुनाव बड़ा चर्चित था। विश्वनाथ प्रताप (वीपी) सिंह बतौर निर्दलीय लड़ रहे थे। कांग्रेस से सुनील शास्त्री उम्मीदवार थे। बसपा से कांशीराम मैदान में उतरे। वीपी सिंह मोटरसाइकल से, जबकि सुनील शास्त्री कारों के काफिले के साथ प्रचार करते थे। उधर, कांशी राम के समर्थक साइकल से चुनाव क्षेत्र की खाक छाना करते थे। चुनाव में अंततः वीपी सिंह की जीत हुई थी। कांशी राम को महज 68,836 वोट मिल पाए थे। वह इससे पहले 1989 में अमेठी में राजीव गांधी के खिलाफ भी चुनाव लड़ चुके थे। कांशी राम भले ही चुनाव दर चुनाव हार रहे थे, लेकिन बसपा की चर्चा और पैठ बढ़ती जा रही थी।

भाई ने पैर छुए, कांशी राम ने पहचाना ही नहीं

कांशी राम घर-बार छोड़ कर अपनी मुहिम में जुट गए थे। 1960 के दशक में उन्होंने पूना में अपनी नौकरी भी छोड़ दी थी। उन्होंने अपने परिवार से कभी मिलने की कोशिश तक नहीं की। उनके परिवार वालों को भी उनकी कोई खोज-खबर नहीं थी। मीडिया के जरिये जब वह चर्चा में रहने लगे, तभी उन्हें उनके बारे में पता चला। लेकिन, कांशी राम परिवार से इतने कटे थे कि चंडीगढ़ में एक मीटिंग के दौरान उनके छोटे भाई दलबारा सिंह ने उनके पांव छू लिए, पर कांशी राम पहचान नहीं पाए कि पांव छूने वाला 24 साल का नौजवान उनका छोटा भाई है। जब दलबारा सिंह ने अपना परिचय दिया तो कांशी राम के आंसू थम नहीं रहे थे।

बहन सबरन कौर की भी कांशी राम से मुलाक़ात कुछ ऐसे ही हुई। सालों बाद एक कॉमन फ्रेंड के घर कांशी राम ने बहन को देखा, पर वह उन्हें पहचान नहीं सके। पूना की नौकरी छोड़ने के 18 साल बाद कांशी राम की मुलाक़ात मां बिशन कौर से हुई। इस बीच मां को बेटे के बारे में कुछ पता नहीं था। 18 साल बाद बिशन कौर को पता चला कि उनका बेटा नागपुर में एक कॉन्फ्रेंस आयोजित कर रहा है। तब वह कांशी राम से मिलने नागपुर पहुंच गईं। 18 साल बाद हुई इस मुलाक़ात में मां ने कोशिश की कि बेटा घर लौट चले, लेकिन कांशी राम ने मां की एक न सुनी। वह पिता हरि सिंह के अंतिम संस्कार तक में नहीं गए। हालांकि, वह ‘भोग’ कार्यक्रम में शरीक होने गए थे।

कांशी राम बीमार हुए तो मायावती को बनवाया सीएम

कांशी राम की जिंदगी में सबसे करीब कोई व्यक्ति था तो वह थीं मायावती। यही कारण रहा कि 1995 में जब कांशी राम ने यूपी में बसपा-भाजपा सरकार बनवाने की योजना बनाई तो उन्होंने मुख्यमंत्री भी मायावती को ही बनवाया। उस समय कांशी राम अचानक बीमार पड़ गए। उनके हाथ में भाजपा का समर्थन पत्र था, लेकिन स्वास्थ्य साथ नहीं दे रहा था। वह मुख्यमंत्री बनने की स्थिति में नहीं थे। इंतजार करने का वक्त भी नहीं था, क्योंकि भनक लगी कि मुलायम सिंह यादव बसपा को तोड़ने की साजिश रच रहे हैं। कांशी राम ने फौरन मायावती को बुलवाया और राज्यपाल के पास जाकर सरकार बनाने का दावा पेश करने के लिए कहा। इस तरह 3 जून, 1995 को मायावती को उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री के रूप में शपथ दिलाई गई। कांशी राम ठीक हुए तो भी उन्हें सीएम पद पर लौटने की जरा भी चिंता नहीं थी। उन्होंने बतौर बसपा अध्यक्ष पार्टी संभाली और मायावती सत्ता संभालती रहीं। आगे भी यही सिलसिला चलता रहा। अपनी गिरती सेहत को देखते हुए 2001 में कांशी राम ने मायावती को औपचारिक रूप से अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था।

2003 में 14 सितंबर को कांशी राम को हैदराबाद में जबर्दस्त स्ट्रोक आया। उन्हें अपोलो अस्पताल ले जाया गया। अगले दिन एयर अंबुलेंस से उन्हें दिल्ली लाकर बत्रा हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया। 29 अप्रैल, 2004 को उन्हें अस्पताल से छुट्टी दी गई, लेकिन उसी दिन फिर से भर्ती करना पड़ा। इस बार 1 जुलाई, 2004 को उन्हें डिस्चार्ज किया गया।

कांशी राम के अंतिम साल और सेहत का बुरा हाल

ब्लड प्रेशर बहुत बढ़ जाने के चलते ब्रेन हैमरेज की वजह से उन्हें दोनों बार अस्पताल में भर्ती करना पड़ा था। उनके शरीर का दाहिना हिस्सा लकवाग्रस्त हो गया था। वह बोल भी नहीं पा रहे थे। उनकी सोचने-समझने की शक्ति भी जा चुकी थी। उन्हें वक्त और जगह का भी ज्ञान नहीं रहता था। 30 अप्रैल, 2004 को उनकी स्थिति और बिगड़ गई। 1 मई को एमआरआई स्कैन से और भी जटिलताओं का पता चला। डॉक्टर्स ने कहा कि कांशी राम को सितंबर 2003 (जब उन्हें ब्रेन स्ट्रोक आया था) से पहले जैसे माहौल में रखा जाए। 1 जुलाई, 2004 को अस्पताल से डिस्चार्ज होने पर मायावती कांशी राम को नई दिल्ली में हुमायूं रोड स्थित अपने बंगले पर ले गईं। फिर अक्तूबर, 2006 में मौत तक मायावती की निगरानी में उन्हें वहीं रखा गया।

इस बीच कांशी राम के परिवार वाले उन्हें पंजाब में अपने पैतृक गांव ले जाने की कोशिश करते रहे। लेकिन, मायावती को यह मंजूर नहीं था। उनके रोकने पर दलबारा सिंह ने कोर्ट से भी गुहार लगाई, लेकिन सुप्रीम कोर्ट तक भी बात नहीं बनी। इसके बाद दलबारा सिंह ने एक पार्टी बना कर कांशी राम को मायावती के चंगुल से आजाद कराने की मुहिम चलाई। इस मुहिम में बसपा से अलग हुए कई कार्यकर्ता भी साथ थे। लेकिन, इस मुहिम का कोई असर होता, इससे पहले कांशी राम दुनिया छोड़ गए।

9 अक्तूबर, 2006 को कांशीराम की मौत के बाद भी उनके परिवार वालों का मायावती से विवाद जारी रहा। अब विवाद अंतिम संस्कार को लेकर था। परिवार वाले पैतृक गांव में अंतिम संस्कार करना चाहते थे, लेकिन मायावती इसके लिए तैयार नहीं थीं। एक बार फिर मामला कोर्ट गया। वहां मायवती की जीत हुई और दिल्ली के निगम बोध घाट पर मायावती ने ही कांशी राम की मृत देह को मुखाग्नि दी।

कांशी राम ने इच्छा जताई थी कि उनकी अस्थियां गंगा-यमुना में न प्रवाहित की जाएं, बल्कि बहुजन समाज प्रेरणा केंद्र में रखी जाएं। यही नहीं, वह मायावती के लिए भी यही ख्वाहिश जता गए हैं। उन्होंने ख्वाहिश जताई है कि मृत्यु के बाद कुमारी मायावती की अस्थियों को भी बसपा के दफ्तरों में उनकी अस्थियों के पास ही रखा जाए।

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