मां-भाई का शव नहीं मिला तो लिपटकर रोए:किसी ने पायल से पहचाना तो कोई कंकाल देखता रहा; नोएडा में जिंदा जले 9 लोग

मां-भाई का शव नहीं मिला तो लिपटकर रोए:किसी ने पायल से पहचाना तो कोई कंकाल देखता रहा; नोएडा में जिंदा जले 9 लोग

कोई जली लाश के जेवर देखकर अपनों की पहचान कर रहा था, तो कोई कंकाल के ढांचे से। गुरुवार (24 सितंबर) को पूरा दिन नोएडा के जिला अस्पताल स्थित पोस्टमॉर्टम हाउस की यही हाल रहा। रोते-बिलखते लोग अपने घरवालों के बारे में जानने के लिए इधर से उधर भटकते रहे। दरअसल, नोएडा में बुधवार रात यमुना एक्सप्रेस-वे पर चलती स्लीपर AC बस में आग लगने से 9 यात्री जिंदा जल गए थे। जैसे ही इसकी खबर बस में सवार लोगों के घरवालों को मिली, वो तुरंत नोएडा के लिए निकल पड़े। जो घरवाले रात 10 बजे अपनों को बस में बैठाकर घर में सो रहे थे, वही सुबह होते-होते उनकी सलामती की दुआ करने लगे। इन्हीं लोगों में से थे शिवम और नैंसी। दोनों अपनी मां सरोज गुप्ता और भाई मयंक को बस में बैठाकर घर लौट गए थे। सुबह दोनों भाई-बहन मां और भाई की तलाश में घंटों भटकते रहे। शव इतनी बुरी तरह जल चुके थे कि पहचान ही नहीं कर पा रहे थे। इसके बाद शिवम और नैंसी एक-दूसरे से लिपटकर काफी देर तक रोते रहे। पोस्टमॉर्टम हाउस के बाहर ऐसे ही दर्दनाक मंजर दिखे। कई परिवारों की दर्दनाक तस्वीरें सामने आईं। 3 केस जानिए, जो अपनों को ढूंढते रहे… 1- रात 10 बजे मां और भाई को बस में बैठाया, सुबह ढूंढते रहे शिवम और नैंसी सुबह करीब 10 बजे पोस्टमॉर्टम हाउस पहुंचे। दोनों अपनी मां सरोज गुप्ता और भाई मयंक को तलाश रहे थे। दोनों को शुरुआत में अंदर जाने की इजाजत ही नहीं मिली। बताया गया कि अधिकारी आने के बाद कागजी प्रक्रिया पूरी होगी। फिर शवों की पहचान कराई जाएगी। बाहर खड़े दोनों भाई-बहन रोते रहे। जो भी पुलिसवाला सामने आता, उससे मां और भाई के बारे में पूछते। हर बार उन्हें इंतजार करने को कहा जाता। करीब दोपहर 2 बजे अधिकारी पहुंचे। इसके बाद दोनों को अंदर ले जाया गया। करीब एक घंटे तक शवों की पहचान की कोशिश होती रही। लेकिन, शव इतने बुरी तरह जल चुके थे कि पहचान करना आसान नहीं था। शिवम-नैंसी के लिए यह तय करना भी मुश्किल था कि किस शव में मां के होने की उम्मीद करें? किससे पहचान शुरू करें? देर रात सरोज और मयंक के शव की पहचान हो सकी। 2- बेटे ने मां को दी थी पायल, उसी से शव को पहचाना ऊषा देवी की तलाश में उनकी नातिन आयुषी भी पोस्टमॉर्टम हाउस पहुंची थी। परिवार के लिए सबसे मुश्किल पल तब आया, जब ऊषा देवी की पहचान उनकी पायल से हुई। बताया कि यह पायल बेटे ने ही अपनी मां को लाकर दी थी। वही पायल हादसे के बाद मां के शव की पहचान का जरिया बनी। पहचान होते ही परिवार का सब्र टूट गया। आयुषी पोस्टमॉर्टम हाउस के बाहर रोती रही। हादसे में कई शव बुरी तरह जल गए थे। ऐसे में घरवालों के लिए अपनों की पहचान करना भी किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं रहा। 3- दादी की मौत पर निकले थे, मां अस्पताल और पिता मोर्चरी में सर्वज्ञ सुबह से अपने पिता देवेंद्र भारद्वाज की तलाश कर रहे थे। वह बताते हैं- पिता देवेंद्र और मां रेखा को दिल्ली के कश्मीरी गेट से बस में रात में बैठाया था। महोबा में मेरी दादी की मौत हो गई थी। माता-पिता अंतिम संस्कार में शामिल होने जा रहे थे। देवेंद्र हिसार की एक यूनिवर्सिटी में टीचर थे और वहीं से रिटायर हुए थे। हादसे के बाद रेखा घायल हालत में अस्पताल पहुंच गईं, लेकिन देवेंद्र का पता नहीं था। परिवार उनकी तलाश में पोस्टमॉर्टम हाउस पहुंचा। बाद में देवेंद्र के शव की पहचान हो गई। एक तरफ मां अस्पताल में भर्ती थी, दूसरी तरफ पिता का शव मोर्चरी में था। सर्वज्ञ की आंखों के आंसू रुक नहीं रहे थे। उन्होंने सिस्टम पर सवाल उठाते हुए कहा कि अंतिम संस्कार तक नहीं करने दिया गया। अब सवाल जिम्मेदारी का, कौन अफसर कितना जिम्मेदार इतने चालान के बाद भी सड़क पर कैसे दौड़ती रही बस? 9 मौतों के बाद सवाल सिर्फ आग लगने की वजह का नहीं है। सवाल यह भी है कि जिस बस के 19 चालान पहले से बताए जा रहे थे और करीब 1.75 लाख रुपए का जुर्माना बकाया था, वह सड़क पर लगातार कैसे दौड़ती रही? बस की फिटनेस और परमिट सही पाए जाने की बात अधिकारियों की ओर से कही गई है। इसके बावजूद बस पर इतने चालान होने से प्रवर्तन व्यवस्था की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं। जिम्मेदारी- एआरटीओ (सहायक संभागीय परिवहन अधिकारी) प्रवर्तन का मुख्य काम सड़कों पर मोटर व्हीकल एक्ट के नियमों का पालन कराना और यातायात नियमों का उल्लंघन करने वाले वाहनों पर कार्रवाई करना है। लापरवाही- जिस बस में आग लगी, उस पर यातायात नियमों के उल्लंघन के 19 चालान हैं। इन चालानों की कुल रकम करीब 1.75 लाख रुपए है। इतने चालान के बाद भी बस चल रही थी। जिम्मेदारी- प्रवर्तन का मुख्य काम सड़कों पर मोटर व्हीकल एक्ट के नियमों का पालन कराना और यातायात नियमों का उल्लंघन करने वाले वाहनों पर कार्रवाई करना है। लापरवाही- इनके मुताबिक, बस की फिटनेस और परमिट सही पाए गए। सवाल है कि जब बस पर इतने चालान थे, तो अब तक इसे अनदेखा क्यों किया गया? जिम्मेदारी- शहर में ट्रैफिक नियमों का पालन करवाना और ट्रैफिक इंस्पेक्टर को दिशा निर्देश देना। लापरवाही- ये बस रोजाना इसी रूट से गुजरती है। बावजूद किसी भी ट्रैफिक इंस्पेक्टर ने बस को रोका नहीं। न ही बस की जांच की। इतने चालान के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं हुई। जिम्मेदारी- ओवरलोडिंग, निर्धारित क्षमता से अधिक यात्री, अनधिकृत रूट या स्टॉपेज जैसी अनियमितताओं तो नहीं हो रहीं, इसे देखना। लापरवाही- ये बस 35 सीटर थी। अफसरों ने बताया कि कुछ यात्री चले गए। आशंका है कि ज्यादा यात्री सवार थे। ऐसे में इस बस की जांच रास्ते में कहीं नहीं की गई। CFO बोले- 2 ड्राइवर और एक कंडक्टर गिरफ्तार किए ————————– ये खबर भी पढ़िए- नोएडा बस अग्निकांड- 2 घंटे तक लाशें जलती रहीं, चमड़ी जलकर सीटों से चिपकीं, महिला की शिनाख्त नातिन ने पायल से की नोएडा में बुधवार आधी रात महोबा जा रही स्लीपर AC बस में आग लग गई। बस में सवार 9 यात्री जिंदा जल गए। इनमें 8 पुरुष और एक महिला ऊषा देवी थीं। ऊषा की पहचान उनकी पायल से हुई। पोस्टमॉर्टम हाउस पर आयुषी अपनी नानी की पायल देख बिलख पड़ीं। पढ़ें पूरी खबर…

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