ब्रांडेड की बजाय वाटर प्लांट्स में लगा दिए लोकल सेंसर:₹12,000 करोड़ की अमृत योजना में फर्जीवाड़ा कबूला; जांच का जिम्मा कमेटी को सौंपा

ब्रांडेड की बजाय वाटर प्लांट्स में लगा दिए लोकल सेंसर:₹12,000 करोड़ की अमृत योजना में फर्जीवाड़ा कबूला; जांच का जिम्मा कमेटी को सौंपा

दैनिक भास्कर के इन्वेस्टिगेशन का असर हुआ है। भास्कर ने खुलासा किया था कि मध्य प्रदेश में ₹12,000 करोड़ की ‘अमृत 2.0 योजना’ के तहत वाटर ट्रीटमेंट प्लांट्स में ब्रांडेड की जगह लोकल इक्वीपमेंट लगाए गए हैं। नगरीय विकास एवं आवास विभाग ने माना है कि कई नगरीय निकायों में स्वीकृत डिजाइन और ड्राइंग में तय मेक-ओईएम से अलग कंपनियों के उपकरण लगाए गए हैं। विभाग ने जांच के लिए विशेष समिति गठित करने के निर्देश दिए हैं। हालांकि, फिलहाल जांच उन्हीं 7 निकायों तक सीमित है, जिनका खुलासा भास्कर ने किया था। इन 7 निकायों में सामने आया मामला; सभी में एक ही सिस्टम इंटीग्रेटर विभाग ने लिखित में बताया है कि ओंकारेश्वर, गुढ़, गाडरवारा, मोहगांव, बुआ-बिछिया, बुढ़ार और ब्योहारी के 7 निकायों में स्वीकृत डिजाइन और ड्राइंग में दर्ज मेक-ओईएम (ओरिजिनल इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरर) से अलग कंपनियों के SCADA उपकरण मिले हैं। इन सभी निकायों में SCADA सिस्टम की आपूर्ति करने वाला सिस्टम इंटीग्रेटर एक ही है-मेसर्स आर्बिट इंजीनियरिंग सॉल्यूशंस। 60 से 80% कीमत का अंतर: ब्रांडेड और लोकल सेंसर में बड़ा फर्क अमृत 2.0 योजना के तहत मध्यप्रदेश को ₹12,000 करोड़ का फंड मिला है। इसमें 294 नगरीय निकायों में करीब ₹6,200 करोड़ की जलप्रदाय परियोजनाएं चल रही हैं। पानी की ऑनलाइन निगरानी के लिए इनमें SCADA सिस्टम लगाए जा रहे हैं, जिसकी लागत विभाग के अनुसार कुल प्रोजेक्ट की करीब 1% होती है। भास्कर की पड़ताल में आरोप सामने आया था कि ब्रांडेड कंपनियों के नाम पर सस्ते लोकल सेंसर लगाए गए। इन उपकरणों और ब्रांडेड उपकरणों की कीमत में 60 से 80% तक का अंतर है। ठेकेदार का पक्ष: “सप्लाई नहीं मिल रही थी” भास्कर ने इन्वेस्टिगेशन के दौरान ‘आर्बिट इंजीनियरिंग सॉल्यूशंस’ के मालिक विजय कुमार तिवारी का पक्ष लिया था। तिवारी ने कहा था कि तय कंपनियों से समय पर सप्लाई नहीं मिलने के कारण दूसरी कंपनियों के उपकरण लगाए गए। अब नगरीय प्रशासन विभाग ने भी बताया है कि एजेंसी ने बाजार में उपकरणों की अनुपलब्धता और सप्लाई चेन की दिक्कतों का हवाला दिया है। विभाग ने स्पष्ट किया है कि इस तर्क को अंतिम रूप से सही नहीं माना गया है और इसकी जांच की जा रही है। जांच का दायरा 7 निकायों तक ही क्यों? विभाग ने तकनीकी निरीक्षण, दस्तावेजों की जांच और ब्रांड-मेक के लेबल (स्टीकर) में छेड़छाड़ की जांच के लिए कमेटी गठित करने के निर्देश दिए हैं। यह कमेटी बैतूल में पहले से स्थापित SCADA सिस्टम के संचालन की भी जांच करेगी। सवाल यह है कि प्रदेश के 294 निकायों में ₹6,200 करोड़ की जलप्रदाय परियोजनाएं चल रही हैं, तो जांच 7 निकायों तक ही क्यों सीमित है? क्या अन्य वाटर प्लांट्स की भी जांच होगी? इसके अलावा, समिति में कौन-कौन शामिल हैं और रिपोर्ट कब तक आएगी, इसकी जानकारी विभाग ने अभी नहीं दी है। 25 सितंबर को पब्लिश्ड भास्कर की खबर फर्जीवाड़ा का अमृत…₹12,000 करोड़ के प्रोजेक्ट में घोटाला:MP में ब्रांडेड की जगह लगाए लोकल सेंसर; वाटर प्लांट्स में स्टीकर हटाया तो खुली पोल
मध्य प्रदेश में घर-घर साफ पानी पहुंचाने के लिए अमृत 2.0 योजना के तहत 622 वाटर ट्रीटमेंट प्लांट बनाए जा रहे हैं। दैनिक भास्कर के इन्वेस्टिगेशन में इन प्लांट्स में SCADA सिस्टम के लिए अप्रूव्ड ब्रांड की जगह सस्ते लोकल सेंसर और उपकरण लगाए जाने का मामला सामने आया है। पढ़ें पूरी खबर….

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