अंतर्राष्ट्रीय आध्यात्मिक नगरी बोधगया में बौद्ध परंपरा का अनूठा और भव्य नजारा देखने को मिला। वर्षावास समापन के बाद महाबोधि महाविहार परिसर में भव्य ‘महाकठिन चीवरदान’ महाउत्सव का आयोजन किया गया। इस धार्मिक अनुष्ठान में थाईलैंड, म्यांमार, श्रीलंका, वियतनाम, बांग्लादेश और भूटान सहित कई देशों के लगभग 60 विदेशी बौद्ध भिक्षुओं और डेलीगेट्स ने पूरी आस्था के साथ हिस्सा लिया। देश-विदेश से पहुंचे बौद्ध श्रद्धालु रविवार को सुबह-सुबह महाबोधि मंदिर परिसर का माहौल पूरी तरह से बुद्धमय नजर आया। महाबोधि वृक्ष के नीचे हजारों की संख्या में देश-विदेश से पहुंचे बौद्ध श्रद्धालुओं और भिक्षुओं का तांता लगा हुआ था। केसरिया और पीले चीवर वस्त्रों में सजे विदेशी भिक्षुओं का अनुशासित तरीके से मंदिर परिसर में पहुंचना और महापरिवर्तन (प्रवचन) सुनना एक अलौकिक आध्यात्मिक ऊर्जा का अहसास करा रहा था। क्या है कठिन चीवरदान की परंपरा आयोजकों और जानकारों के अनुसार, वर्षावास (चार महीने तक एक स्थान पर रहकर साधना) पूरा करने वाले बौद्ध भिक्षुओं के लिए यह परंपरा भगवान बुद्ध के समय से चली आ रही है। वर्षावास के दौरान भिक्षुओं की कठिन साधना के बाद उपासक और श्रद्धालु पूरी निष्ठा व कठिन परिश्रम से चीवर (वस्त्र) बुनकर भिक्षु संघ को दान करते हैं। इस बार के अनुष्ठान में करीब 550 भिक्षु रोब (चीवर) और लगभग 400 लामाओं को वस्त्र, चीवर और दैनिक उपयोग की सामग्रियां भेंट की गईं। विदेशियों में दिखा गजब का उत्साह
जापान से आए जेन मास्टर ‘केन’ समेत थाईलैंड, बर्मा और अन्य देशों से पहुंचे बौद्ध गुरुओं-उपासकों ने इस आयोजन को लेकर अपनी गहरी खुशी जाहिर की। उन्होंने कहा कि महाबोधि वृक्ष के नीचे इस पवित्र धरा पर आकर चीवरदान में शामिल होना उनके जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य है। बीटीएमसी (बोधगया टेम्पल मैनेजमेंट कमेटी) के पदाधिकारियों और स्थानीय बुद्धिजीवियों के सहयोग से संपन्न हुए इस भव्य आयोजन ने एक बार फिर बोधगया की वैश्विक आध्यात्मिक महक को पूरी दुनिया में और प्रगाढ़ कर दिया है। अंतर्राष्ट्रीय आध्यात्मिक नगरी बोधगया में बौद्ध परंपरा का अनूठा और भव्य नजारा देखने को मिला। वर्षावास समापन के बाद महाबोधि महाविहार परिसर में भव्य ‘महाकठिन चीवरदान’ महाउत्सव का आयोजन किया गया। इस धार्मिक अनुष्ठान में थाईलैंड, म्यांमार, श्रीलंका, वियतनाम, बांग्लादेश और भूटान सहित कई देशों के लगभग 60 विदेशी बौद्ध भिक्षुओं और डेलीगेट्स ने पूरी आस्था के साथ हिस्सा लिया। देश-विदेश से पहुंचे बौद्ध श्रद्धालु रविवार को सुबह-सुबह महाबोधि मंदिर परिसर का माहौल पूरी तरह से बुद्धमय नजर आया। महाबोधि वृक्ष के नीचे हजारों की संख्या में देश-विदेश से पहुंचे बौद्ध श्रद्धालुओं और भिक्षुओं का तांता लगा हुआ था। केसरिया और पीले चीवर वस्त्रों में सजे विदेशी भिक्षुओं का अनुशासित तरीके से मंदिर परिसर में पहुंचना और महापरिवर्तन (प्रवचन) सुनना एक अलौकिक आध्यात्मिक ऊर्जा का अहसास करा रहा था। क्या है कठिन चीवरदान की परंपरा आयोजकों और जानकारों के अनुसार, वर्षावास (चार महीने तक एक स्थान पर रहकर साधना) पूरा करने वाले बौद्ध भिक्षुओं के लिए यह परंपरा भगवान बुद्ध के समय से चली आ रही है। वर्षावास के दौरान भिक्षुओं की कठिन साधना के बाद उपासक और श्रद्धालु पूरी निष्ठा व कठिन परिश्रम से चीवर (वस्त्र) बुनकर भिक्षु संघ को दान करते हैं। इस बार के अनुष्ठान में करीब 550 भिक्षु रोब (चीवर) और लगभग 400 लामाओं को वस्त्र, चीवर और दैनिक उपयोग की सामग्रियां भेंट की गईं। विदेशियों में दिखा गजब का उत्साह
जापान से आए जेन मास्टर ‘केन’ समेत थाईलैंड, बर्मा और अन्य देशों से पहुंचे बौद्ध गुरुओं-उपासकों ने इस आयोजन को लेकर अपनी गहरी खुशी जाहिर की। उन्होंने कहा कि महाबोधि वृक्ष के नीचे इस पवित्र धरा पर आकर चीवरदान में शामिल होना उनके जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य है। बीटीएमसी (बोधगया टेम्पल मैनेजमेंट कमेटी) के पदाधिकारियों और स्थानीय बुद्धिजीवियों के सहयोग से संपन्न हुए इस भव्य आयोजन ने एक बार फिर बोधगया की वैश्विक आध्यात्मिक महक को पूरी दुनिया में और प्रगाढ़ कर दिया है।

