सविता श्री भास्कर चेस की दुनिया की उभरती सितारा है। सविता के करियर के लिए उनके पिता ने विदेश की नौकरी छोड़ दी थी।
भाई को चेस खेलते देखकर इस खेल से जुड़ी सविता श्री भास्कर (Savitha Shri Baskar) भारत (India) की महिला टीम का हिस्सा बनकर सितंबर में समरकंद पहुंचेंगी। चेन्नई की सविता की सफलता के पीछे उनकी प्रतिभा तो है ही साथ ही उनके परिवार का सपनों और ज़रूरतों के बीच एक बड़ा फैसला भी है। उनके सपने को आगे बढ़ाने के लिए पिता भास्कर कृष्णन (Bhaskar Krishnan) ने सिंगापुर की अपनी नौकरी तक छोड़ दी। वह सिंगापुर में इलेक्ट्रीशियन के रूप में काम करते थे। बेटी के चेस करियर को पूरा समय देने और उसके साथ प्रतियोगिताओं में जाने के लिए उन्होंने सिंगापुर की नौकरी छोडकऱ भारत लौटने का निर्णय लिया।
गहने रखे गिरवी
चेस में सविता को आगे बढ़ाने के लिए उनके परिवार के सामने आर्थिक मुश्किलें इतनी बढ़ीं कि एक राष्ट्रीय प्रतियोगिता की फीस जुटाने के लिए परिवार को सोने के गहने गिरवी रखने पड़े। अब सविता शतरंज ओलंपियाड में चुनौती पेश करने वाली भारतीय महिला टीम की सबसे युवा सदस्य बन गई हैं।
शुरुआत से ही परिवार ने दिया साथ
सविता के परिवार में चेस की शुरुआत उनके बड़े भाई मुगेष (Mugesh) से हुई थी। सविता से पांच साल बड़े मुगेष चेस खेलते थे। पिता चाहते थे कि उनका बेटा चेस में करियर बनाए। सविता भी भाई के खेल को करीब से देखने लगीं। धीरे-धीरे उनकी रुचि इतनी बढ़ी कि उन्होंने खुद चेस खेलने की इच्छा जताई। इसके बाद दोनों बच्चों ने ट्रेनिंग लेनी शुरू किया। चेस में लगातार ट्रेनिंग, प्रतियोगिताओं में भागीदारी और दूसरे शहरों और देशों की यात्राओं का खर्च मध्यमवर्गीय परिवार के लिए बड़ी चुनौती था। इसके बावजूद परिवार ने हमेशा ही उनका साथ दिया। भास्कर के लिए एक साथ दो बच्चों के प्रतिस्पर्धी चेस करियर का खर्च उठाना संभव नहीं था। उन्होंने सविता के खेल में बेहतर संभावनाएं देखीं और उन्हें आगे बढ़ाने का फैसला किया। मुगेष ने आठवीं कक्षा के बाद प्रतिस्पर्धी चेस से दूरी बना ली। यह फैसला सविता के करियर के लिए निर्णायक साबित हुआ।
स्कूल ने जुटाए 3 लाख रुपए
सविता के करियर में सबसे अहम मौकों में से एक 2022-23 के दौरान आया। उन्होंने कजाकिस्तान में आयोजित वर्ल्ड रैपिड चेस चैंपियनशिप के लिए क्वालिफाई किया। वहाँ जाने के लिए परिवार को करीब तीन लाख रुपए की जरूरत थी। इतनी बड़ी रकम जुटाना उनके लिए संभव नहीं था। तब सविता के स्कूल वेलाम्मल ने उनकी यात्रा का खर्च उठाया। सविता ने भी स्कूल के भरोसे को शानदार प्रदर्शन से सही साबित किया। उन्होंने प्रतियोगिता में कांस्य पदक जीता और कम उम्र में पदक जीतने वाली खिलाडिय़ों में अपना नाम दर्ज कराया।
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