प्लॉट की सफाई की तो मिले 400 साल पुराने चांदी के 4 सिक्के

प्लॉट की सफाई की तो मिले 400 साल पुराने चांदी के 4 सिक्के

भास्कर संवाददाता। दतिया लक्ष्मण ताल के पास एक प्लॉट में सफाई हो रही थी। मजदूर मिट्टी हटा रहे थे, अचानक कुछ चमकता हुआ दिखाई दिया। प्लॉट मालिक प्रीतम रजक और उनकी पत्नी अंजू ने इस सिक्कों को देखा। उर्दू लिपि में लिखे इन सिक्कों को वह लेकर सीधा कलेक्ट्रेट पहुंचा। कलेक्टर स्वप्निल वानखड़े को उसने यह सिक्के सौंपे। उन्होंने पुरातत्व विभाग को सिक्कों की तस्वीरें भेजीं, रिपोर्ट में इनके मुगलकालीन होने की पुष्टि हुई। पुराविद् वसीम खान की रिपोर्ट के मुताबिक, यह सिक्के करीब 450 से अधिक साल पुराने हैं। यह सिक्के अकबर के समय के बताए गए हैं। उस समय के हैं जब मुगल शासक अकबर ने धार्मिक विचारों में बदलाव करते हुए दीन-ए-इलाही की शुरूआत की थी। बता दें कि, कलेक्टर कार्यालय ने सिक्कों पर लिखी भाषा, लेख और उनके शासनकाल की जानकारी मांगी थी। इसके बाद पुरातत्व विशेषज्ञ डॉ. वसीम खान ने सिक्कों का अध्ययन कर रिपोर्ट तैयार की। वहीं, दतिया कलेक्टर स्वप्निल वानखड़े ने बताया कि प्रीतम रजक के द्वारा हमें जो सिक्के उपलब्ध कराए गए हैं, वह मुगलकालीन हैं। रिपोर्ट में इस बात की पुष्टि हुई है। सिक्के पुरातत्व विभाग को दिए गए हैं। वसीम खान की रिपोर्ट के मुताबिक, सिक्कों के एक तरफ अल्लाह-हु-अकबर, जल्ले जलालहू लिखा है। दूसरी तरफ फारसी में इलाही संवत के महीने और सिक्का ढालने वाली टकसाल का नाम दर्ज है। पहले सिक्के पर आजार इलाही, जरब अहमदाबाद, दूसरे पर अमरदाद इलाही, जरब आगरा, तीसरे पर बहमन इलाही, जरब अहमदाबाद और चौथे पर तीर इलाही, जरब लाहौर अंकित है। यानी चारों सिक्के अलग-अलग समय और स्थान की मुगल टकसालों से जारी हुए थे। पुराविद् खान ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि, अकबर ने 1584 ईस्वी में तारीख-ए-इलाही यानी इलाही संवत शुरू किया था। इसमें साल की गणना सौर चक्र और 12 राशियों से जुड़े महीनों के आधार पर की जाती थी। सिक्कों पर भी इन्हीं महीनों के नाम दर्ज किए गए। इनमें फरवर्दिन, अर्दिबिहिश्त, खुर्दाद, तीर, अमरदाद, शहरीवार, मिहर, आबान, आजर, दई, बहमन और इस्फंदारमज शामिल थे। अकबर का शासन 1556 से 1605 तक रहा। 1560 में बैरम खान से अलग होने के बाद उसने शासन की पूरी बागडोर संभाली और साम्राज्य का विस्तार किया। इसी दौर में उसने धार्मिक सहिष्णुता और विभिन्न धर्मों के विचारों को साथ लाने की कोशिश की। 1582 में दीन-ए-इलाही की शुरुआत इसी क्रम से जुड़ी थी। इसके अनुयायियों की संख्या भी बहुत सीमित रही। दरबार में राजा बीरबल इसके प्रमुख हिंदू अनुयायी माने जाते हैं। कलेक्टर को सिक्के सौंपता युवक।

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