न्यूनतम वेतन दिलाओ उपवास आंदोलन 28 को:बीजेपी दफ्तर घेरने आएंगे 3 से 5 हजार पाने वाले चौकीदार, अस्थायी और ठेका कर्मचारी

न्यूनतम वेतन दिलाओ उपवास आंदोलन 28 को:बीजेपी दफ्तर घेरने आएंगे 3 से 5 हजार पाने वाले चौकीदार, अस्थायी और ठेका कर्मचारी

कर्मचारियों को न्यूनतम वेतन दिए जाने के दावे के बीच तीन हजार रुपए से आठ हजार रुपए पगार दिए जाने के विरोध में एक बार फिर अस्थायी, अंशकालीन, चौकीदार, ठेका श्रमिक का काम करने वाले कर्मचारी सरकार को घेरने की तैयारी में जुट गए हैं। इन कर्मचारियों द्वारा भोपाल में 28 सितम्बर से आंदोलन करने की तैयारी है। न्यूनतम वेतन दिलाओ उपवास आंदोलन के अंतर्गत ये कर्मचारी बीजेपी दफ्तर पहुंचकर इस दिन प्रदेश भाजपा अध्यक्ष को पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती द्वारा वर्ष 2003 में की गई घोषणा की याद दिलाएंगे। सरकार की ओर से घोषित न्यूनतम मजदूरी 12,425 से 16,769 रुपए प्रति माह है, लेकिन खुद सरकार ही अपने विभागों में 3 से 5 हजार में काम करा रही है। औद्योगिक क्षेत्रों में भी ठेका श्रमिकों को पूरी न्यूनतम मजदूरी नहीं मिलती, जिस कारण अस्थायी, ठेका श्रमिक कर्मचारियों में असंतोष है और अब आंदोलन की तैयारी है। इसलिए अब इन कर्मचारियों ने भाजपा कार्यालय के सामने आंदोलन की रणनीति बनाई है, जिसकी सूचना अस्थायी, आउटसोर्स कर्मचारी मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष वासुदेव शर्मा ने प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खण्डेलवालजी को पत्र के जरिए दे दी है। इन कर्मचारियों ने आंदोलन का नाम दिया है, न्यूनतम वेतन दिलाओ उपवास आंदोलन, जिसकी तैयारियां जिला स्तर पर चल रही है, इस आंदोलन में ग्राम पंचायतों के चौकीदार, पंप आपरेटर, भृत्य, सफाईकर्मी, लोकल यूथ सर्वेयर बड़ी संख्या में शामिल होंगे, जिन्हें 2 से 3 हजार रुपए ही मिलते हैं। शिक्षा विभाग एवं जनजातीय कार्य विभाग के स्कूलों एवं छात्रावासों में कार्यरत अंशकालीन, अस्थायी कर्मचारी आंदोलन में शामिल होंगे, जिनसे सरकार 4 से 5 हजार रुपए में 10-12 घंटे काम करा रही है। न्यूनतम से भी कम वेतन पर काम कर रहे ये कर्मचारी बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष को पत्र में यह लिखा वासुदेव शर्मा ने भाजपा अध्यक्ष को लिखे पत्र में कहा है कि प्रदेश की मेहनतकश जनता 2003 से निरंतर आपकी सरकार चुनती आ रही है, जिसने 23 सालों में चपरासी तक की नौकरी नहीं दी है। तृतीय एवं चतुर्थ श्रेणी की सरकारी नौकरियां पूरी तरह खत्म कर दी गई हैं, यह नौकरियां समाज के कमजोर, गरीब, मजदूर, दलित, आदिवासी, ओबीसी एवं मध्यमवर्ग के परिवारों के बच्चों की थीं, जिन्हें पूरी तरह अस्थाई, आउटसोर्स किया गया है, जिन नौकरियों में न स्थायित्व है और न ही जिंदा रहने लायक वेतन है। वर्ष 2003 से पहले प्रदेश में जो भी नौकरियां मिलती थीं, उनमें सुरक्षा हुआ करती थी।

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